तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ तर्कभाषा [ तेजोद्रव्यम्
मुद्भूतस्पर्शम् । ४ उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शञ्चेति ।
उद्भूतरूपस्पर्शं यथा सौरादितेजः पिण्डीभूतं तेजो वह्न्यादिकम् ।
४ उद्भूतरूप और अनुद्भूतस्पर्श [जैसे प्रदीपप्रभामण्डल । प्रदीप का प्रकाश
तो बहुत दूर से दिखाई देता है अतएव उसका भास्वर शुक्ल रूप तो उद्भूत है
परन्तु उष्ण स्पर्श अनुभव में न आने से अनुद्भूत है । ]
[ आगे ग्रन्थकार इन चारों भेदों के उदाहरण देते हैं । ]
१ उद्भूतरूपस्पर्श [ तेज का उदाहरण ] जैसे सूर्य आदि का तेज अथवा
पुञ्जीकृत अग्नि आदि । [ इनका भास्वरशुक्ल रूप और उष्ण स्पर्श दोनों उद्भूत
अर्थात् अनुभव योग्य हैं ]
सुवर्ण का तेजस्त्व—
तेज के विषय-रूप में 'सवितृसुवर्णवह्निविद्युदादिप्रभेदम्' कह कर तेज
या अग्नि के जो चार भेद दिखलाए हैं उनमें 'सुवर्ण' भी एक है । मीमांसक
लोग सुवर्ण को पृथिवी आदि नौ द्रव्यों से भिन्न अलग द्रव्य मानते हैं ।
आधुनिक वैज्ञानिक भी सुवर्ण को एक अलग तत्त्व स्वीकार करते हैं । परन्तु
न्याय और वैशेषिक में सुवर्ण को तेज के अन्तर्गत माना है । अर्थात् वह तेज
का विशेष भेद है । सुवर्ण को तैजस पदार्थ मानने में उनकी युक्ति यह है कि
शुद्ध सुवर्ण को किसी ताप मान तक गरम किया जाय वह जल आदि के समान
बाष्प आदि के रूप में उड़ेगा नहीं बना ही रहेगा । इसलिए वह तेजोरूप
अथवा तैजस पदार्थ है । उनका अनुमान वाक्य इस प्रकार बनता है । 'सुवर्णं
तैजसम् असति प्रतिबन्धके अत्यन्तानलसंयोगे सत्यप्यनुच्छिद्यमानजन्यद्र-
वत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा पृथिवी' । अर्थात् प्रतिबन्धक के अभाव में अत्यन्ता-
नल संयोग होने पर भी अनुच्छिद्यमानजन्य द्रवत्व युक्त होने से सुवर्ण तैजस
है । आयुर्वेद में सुवर्ण को भस्म करने की विधियां दी हैं परन्तु वह औषधादि
प्रतिबन्धक का योग होता ही है । द्रवत्व प्रतिबन्धक किसी औषधादि के प्रयोग
के बिना शुद्ध सुवर्ण का द्रवत्व किसी भी तापमान पर नष्ट नहीं होता ।
इसलिए सुवर्ण तैजस द्रव्य है । यह नैयायिकों का मत है ।
सुवर्ण का पञ्चम प्रकारत्व—
अब प्रश्न यह होता है कि सुवर्ण यदि तैजस द्रव्य है तो उसमें तेज का
भास्वर शुक्ल रूप और उष्णस्पर्श अनुभव क्यों नहीं होता ! सुवर्ण का रूप,
भास्वर शुक्ल के स्थान पर पीत, और उसका स्पर्श उष्णके स्थान पर अनुष्णाशीत
क्यों उपलब्ध होता है ? इसलिए नैयायिकों ने सुवर्ण को 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श'