तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीलुपाकः ] प्रमेयनिरूपणम् १७५
के अदृष्ट के द्वारा फिर उन रक्त परमाणुओं के संयोग से रक्त घट की उत्पत्ति
होती है। इसी का नाम 'पीलुपाक' अर्थात् परमाणुओं का पाक है। इस
सिद्धान्त में जो घड़े का नाश और उत्पत्ति मानी है उसका अर्थ केवल इतना
ही है कि जब घड़ा अग्नि में रखा जाता है तब उसके परमाणुओं के बीच किसी
प्रकार का अन्तर नहीं होता है, वह एक दूसरे से बिल्कुल संयुक्त होते हैं।
परन्तु जब उनके बीच अग्नि का प्रवेश होता है, तो उनमें कुछ थोड़ा सा
अन्तर हो जाता है जिसके कारण उनके बीच अग्नि को प्रवेश करने का अवसर
मिल जाता है। इसी अन्तर या विभाग को घट का नाश कहा जा सकता है।
और रक्त रूप उत्पन्न होने के बाद घड़े के ठण्डे होते समय जैसे जैसे अग्नि
उनके बीच से निकलता जाता है वह परमाणु फिर पूर्ववत् मिलते जाते हैं।
इसी पुनः संयोग के द्वारा घट का पुनर्निर्माण होता है। यही वैशेषिक दर्शन की
'पीलुपाक' की प्रक्रिया है। इस 'पीलुपाक' सिद्धान्त का उपपादन वैशेषिक
दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में इस प्रकार किया गया है—
पार्थिवपरमाणुरूपादीनां पाकजोत्पत्तिविधानम् । घटादेरामद्रव्यस्याग्निना
सम्बद्धस्याग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा तदारम्भकेष्वणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । तेभ्यो विभागाः,
विभागेभ्यः संयोगविनाशाः, संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन्
विनष्टे स्वतन्त्रेषु अग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः । पुनरन्यस्मा-
दग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् पाकजा जायन्ते । तदनन्तरं भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मा-
णूसंयोगात् पाकजेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगात् द्व्यणुकादिक्रमेण
कार्यद्रव्यमुत्पद्यते । तत्र च कारणगुणक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः ।
न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति, सर्वावयवेषु अन्त-
र्बहिश्च वर्तमानस्याग्निना व्याप्त्यभावात् । अनुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न
सम्भवति, कार्यद्रव्यविनाशादिति¹ ।
इन दोनों अनुच्छेदों में से पहिले अनुच्छेद में 'पीलुपाक' के अनुसार
पाकजोत्पत्ति की प्रक्रिया दिखाई है और दूसरे अनुच्छेद में न्याय दर्शन के
'पिठरपाकवाद' का खण्डन किया है। कार्यद्रव्य अर्थात् घट के पिण्ड में ही पाकज
रूप आदि गुणों का उत्पत्ति और विनाश सम्भव नहीं है। क्योंकि यदि घट का
पिण्ड अग्नि में ज्यों का त्यों बना रहे, तो उसके भीतर के अवयवों में अग्नि का
प्रवेश नहीं हो सकेगा इसलिए भीतर के अवयव रक्त नहीं होने चाहिए। परन्तु
घड़े के खप्पड़ को तोड़ने पर उसके भीतर के अवयव भी लाल दिखाई देते
१ वैशेषिक दर्शन, प्रशस्तपाद भाष्य पृ०-४६-४७ ।