तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्व्यणुकाद्यवयवनियमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८५
द्व्यणुकादीनामवयवनियमः
द्व्यणुकं तु द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते। एकस्यानारम्भकत्वात्,
त्र्यादिकल्पनायां प्रमाणाभावात्। त्र्यणुकं तु त्रिभिरेव द्व्यणुकैरारभ्यते।
दो द्व्यणुकों अथवा चार द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति न मान कर तीन
ही द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति क्यों मानते हैं? इसका उत्तर यह है कि
एक परमाणु से कोई कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता है। और जब दो परमाणुओं
से द्व्यणुक बन सकता है तब तीन तक क्यों बढ़ा जाय। इसी प्रकार त्र्यणुककी
उत्पत्ति तीन द्व्यणुकोंसे मानी है। उसमें भी एक द्व्यणुक से कार्यकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती है। दो द्व्यणुकों से यदि त्र्यणुक की उत्पत्ति माने तो त्र्यणुक में पाया
जाने वाला 'महत्-परिमाण' उत्पन्न नहीं हो सकता है। क्योंकि 'महत्-परिमाण'
की उत्पत्ति के दो ही कारण हैं। एक 'कारण-महत्त्व', और दूसरा 'कारण-बहुत्व ।'
अर्थात् कार्य में जो 'महत्-परिमाण' उत्पन्न होता है वह या तो तब उत्पन्न हो
सकता है जब कि उसके कारण में 'महत्-परिमाण' हो। अथवा उसके कारण
में बहुत संख्या हो। इन दो के अतिरिक्त कार्य में 'महत्-परिमाण' की उत्पत्ति
का और कोई कारण नहीं है। त्र्यणुक का परिमाण 'महत्-परिमाण' है यह
'महत् परिमाण' तब ही उत्पन्न हो सकता है जब कि या तो त्र्यणुक के कारण
अर्थात् द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' हो अथवा उसमें बहुत्व संख्या हो।
सो त्र्यणुक के कारणभूत द्व्यणुक का परिमाण 'अणु-परिमाण' होने से उसमें
'महत्-परिमाण' तो रहता नहीं है। इसलिए त्र्यणुक के 'महत्-परिमाण' का
कारण, 'कारण-महत्त्व' तो बनता नहीं, इसलिए दूसरा कारण अर्थात् 'कारण-
बहुत्व' को ही द्व्यणुक के 'महत्-परिमाण' का कारण मानना चाहिए। और
बहुत संख्या कम से कम तीन की अपेक्षा रखती है। इसलिए दो द्व्यणुकों
से तो त्र्यणुक की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। अतएव बहुत्व संख्या वाले तीन
द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की उत्पत्ति माननी चाहिए। और जब बहुत्व संख्या
तीन में बन जाती है तब आगे चार या पांच द्व्यणुकों को त्र्यणुक का कारण
मानने की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिए तीन द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की
उत्पत्ति मानना उचित है। इसी बात को आगे कहते हैं।
द्व्यणुक तो दो परमाणुओं से ही बनता है। एक [ परमाणु ] के अनारम्भक
होने से और [ जब दो परमाणुओं से ही द्व्यणुक की उत्पत्ति बन जाती है तब ]
तीन आदि की कल्पना करने में कोई प्रमाण न होने से [ दो परमाणुओं से ही