तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
१२२ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
विशेषणविशेष्यभावश्च सम्बन्ध एव न सम्भवति भिन्नोभयाश्रितै-
कत्वाभावात् । सम्बन्धो हि सम्बन्धिभ्यां भिन्नो भवत्युभयसम्बन्ध्याश्रित-
श्चैकश्च । यथा भेरीदण्डयोः संयोगः । स हि भेरीदण्डाभ्यां भिन्नस्तदु-
भयाश्रितश्चैकश्च । न च विशेषणविशेष्यभावस्तथा । तथाहिं दण्डपुरुष-
योर्विशेषणविशेष्यभावो न ताभ्यां भिद्यते । न हि दण्डस्य विशेषणत्व-
मर्थान्तरं, नापि पुरुषस्य विशेष्यत्वमर्थान्तरमपि तु स्वरूपमेव । अभाव-
स्यापि विशेषणत्वाद् विशेष्यत्वाच्च । न चाभावे कस्यचित् पदार्थस्य
द्रव्याद्यन्यतमस्य सम्भवः । तस्मादभावस्य स्वोपरक्तबुद्धिजनकत्वं
यत्स्वरूपं तदेव विशेषणत्वं, न तु पदार्थान्तरम् ।
एवं व्याप्यव्यापकत्वकारणत्वादयोऽप्यूह्याः । स्वप्रतिबद्धबुद्धिजन-
इसी का उपपादन ग्रन्थकार इस प्रकार करते हैं—
और विशेषण विशेष्य भाव [ सम्बन्धियों से ] भिन्न, उभयाश्रित और एक
न होने से सम्बन्ध ही नहीं हो सकता है । क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धियों से भिन्न
उभयाश्रित और एक होता है । जैसे भेरी और दण्ड का संयोग [सम्बन्ध है, तो]
वह भेरी और दण्ड [ दोनों सम्बन्धियों ] से भिन्न [ भेरी और दण्ड दोनों द्रव्य
हैं और संयोग गुण है इसलिए वह दोनों सम्बन्धियों से भिन्न है ] उभयाश्रित और
एक है । परन्तु विशेषण विशेष्यभाव वैसा [ अर्थात् सम्बन्धिभ्यां भिन्नः उभयाश्रितः
और एकश्च ] नहीं है । क्योंकि [ दण्डी पुरुषः इस विशिष्ट प्रतीति में क्रमशः ]
दण्ड और पुरुष का विशेषण विशेष्य भाव उन [ दण्ड और पुरुष के स्वरूप ]
से भिन्न नहीं है [ किन्तु उनका स्वरूप ही है ] । दण्ड का विशेषणत्व [ उसके
स्वरूप से भिन्न ] कोई दूसरा पदार्थ नहीं है और न तो पुरुष का विशेष्यत्व
[ उसके स्वरूप से भिन्न ] ही कोई अर्थान्तर है । किन्तु [ विशेषण और विशेष्य
भाव उन दोनों का ] स्वरूपभूत ही हैं । अभाव के भी विशेषण और विशेष्य
होने से । [ यदि विशेषण विशेष्य भाव को स्वरूप से भिन्न अलग अर्थान्तर
माना जाय तो संयोगादि के समान द्रव्यादि छः पदार्थों में ही उसका अन्तर्भाव
कहीं होगा । परन्तु ] द्रव्यादि [ छः पदार्थों से ] में से किसी एक भी पदार्थ
का अभाव में [ रहना ] सम्भव नहीं है । [ क्योंकि अभाव किसी का आश्रय
नहीं हो सकता है ] इसलिए स्व [ अर्थात् घटाभाव ] से उपरत बुद्धि [ घटा-
भावद् भूतलम् ] को उत्पन्न करना जो अभाव का स्वरूप है, वही [ स्वरूप-
भूत ] विशेषणत्व है । [ उस से भिन्न ] अर्थान्तर नहीं ।
इसी प्रकार व्याप्य व्यापक भाव और कार्य कारणत्व आदि भी [ सम्बन्धियों
से भिन्न नहीं अपितु सम्बन्धि स्वरूप ही ] समझने चाहिए । अग्नि आदि का
सम्बन्धत्वखण्डनम् ] अभावानिरूपणम् १२३
कत्वं स्वरूपमेव हि व्यापकत्वमग्न्यादीनाम् । कारणत्वमपि कार्यानुकृता-
न्वयव्यतिरेकि स्वरूपमेव हि तन्त्वादीनां, नत्वर्थान्तरमभावस्यापि
व्यापकत्वात्कारणत्वाच्च । नह्यभावे सामान्यादिसम्भवः ।
तदेवं विशेषणविशेष्यभावो न विशेषणविशेष्यस्वरूपाभ्यां भिन्नः ।
नाप्युभयाश्रितो, विशेषणे विशेषणभावमात्रस्य सत्त्वाद् विशेष्यभावस्या-
भावाद्, विशेष्ये च विशेष्यभावमात्रस्य सद्भावाद्, विशेषणभावस्याभा-
वात् । नाप्येको, विशेषणं च विशेष्यं च तयोर्भाव इति द्वन्द्वात् परं श्रूय-
माणो भावशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा च विशेषणभावो विशेष्य-
भावश्चेत्युपपन्नम् । द्वावेतावेकश्च सम्बन्धः तस्माद् विशेषणविशेष्यभावो
स्वप्रतिबद्ध [ अपने से संबद्ध ] बुद्धि को उत्पन्न करना ही उनका व्यापकत्व है ।
[ इसी प्रकार ] कारणत्व भी तन्त्वादि का कार्यानुकृत अन्वय व्यतिरेकिस्वरूप ही
है, अर्थान्तर नहीं । अभाव के भी व्यापक तथा कारण होने से । [ यदि व्याप्य
व्यापक भाव अथवा कार्य कारण भाव को सम्बन्धियों से भिन्न मानेंगे तो जैसा
विशेष्य विशेषण भाव के विषय में दिखाया है व्याप्य व्यापक भाव तथा कारण
कार्य भाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से ही कोई पदार्थ मानना होगा । परन्तु ]
अभाव में सामान्यादि [ छहों पदार्थों में से किसी ] का सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार विशेषण विशेष्य भाव विशेषण और विशेष्य के स्वरूपों से भिन्न
नहीं है । और न उभयाश्रित ही है, विशेषण में विशेषण भाव मात्र के होने
और विशेष भाव के न होने से, और विशेष्य में विशेष्य भाव मात्र के होने से
विशेषण भाव के न होने से । [ उन दोनों में से कोई भी उभयाश्रित नहीं है ]
और न एक ही है । [ क्योंकि ] विशेषण और विशेष्य और उन दोनों का
भाव इस रूप में [ विशेषण विशेष्य भाव पद में 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं
प्रत्येकमभिसम्बध्यते,' इस नियम के अनुसार ] द्वन्द्व से परे श्रूयमाण भाव पद
[ विशेषण और विशेष्य दोनों पदों में से ] प्रत्येक के साथ सम्बद्ध होता है । इस
प्रकार विशेषणभाव और विशेष्यभाव यह [ अर्थ ] उपपन्न होता है । [ इससे
स्पष्ट है कि ] ये दो हैं और सम्बन्ध एक होता है [ इसलिए विशेषण-विशेष्य
भाव सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं ] इसी प्रकार व्याप्य-व्यापक-भावादि भी
[ सम्बन्ध नहीं हैं । इस प्रकार प्रबलतर युक्तियों से यह सिद्ध होता है कि
विशेषण विशेष्य भाव, व्याप्य व्यापक भाव, कार्य कारण भाव आदि कोई भी
सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं क्योंकि उनमें सम्बन्ध का लक्षण नहीं घटता है ।
इस प्रकार उनका सम्बन्धत्व सिद्ध न होने पर भी उनके लिए ] सम्बन्ध शब्द
का प्रयोग तो दो के द्वारा निरूपणीय होने से [ सम्बन्ध के साथ ] साधर्म्य वश
१२४ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
न सम्बन्धः । एवं व्याप्यव्यापकभावादयोऽपि। सम्बन्धशब्दप्रयोगस्तूभ-
यनिरूपणीयत्वसाधर्म्येणोपचारात् ।
तथा चासम्बद्धस्याभावस्येन्द्रियेण ग्रहणं न सम्भवति ।
सत्यम् । भावावच्छिन्नत्वाद् व्याप्तेर्भावं प्रकाशयदिन्द्रियं प्राप्तमेव
प्रकाशयति, नत्वभावमपि । अभावं प्रकाशयदिन्द्रियं विशेषणविशेष्यभा-
वमुखेनैवेति सिद्धान्तः ।
गौण रूप से होता है [ यह समझना चाहिए । अर्थात् जैसे संयोग समवाय आदि
सम्बन्ध किन्हीं दो पदार्थों में होते हैं। और उन दोनों का कथन कर के ही उस
सम्बन्ध को प्रदर्शित किया जा सकता है इसी प्रकार विशेषण विशेष्य भाव में
दो पदार्थों के कथन द्वारा ही उसका निरूपण होता है। इसलिए इस उभयनिरू-
पणीयत्व साधर्म्य से विशेषण विशेष्य भाव को भी गौण रूप से सम्बन्ध कहा
जाता है । वास्तव में वह सम्बन्ध नहीं है ]
इसलिए [ फलितार्थ यह हुआ कि ] सम्बन्ध के बिना अभाव का इन्द्रिय से
[ प्रत्यक्ष ] ग्रहण नहीं हो सकता है । [ अतः अभाव के ग्रहण के लिए अलग
प्रमाण मानना चाहिए । यह पूर्वपक्ष हुआ । ]
[ इसका उत्तर यह है कि ] ठीक है। [ किन्तु इन्द्रिय संबद्ध अर्थ को ही
ग्रहण करती है इस ] व्याप्ति के भाव [ पदार्थ ] तक परिमित होने से भाव को
प्रकाशित करनेवाली इन्द्रिय, संबद्ध [ भाव ] को ही प्रकाशित करती है। परन्तु
अभाव [ के विषय में ही यह नियम नहीं ] को तो नहीं। अभाव को प्रकाशित
करनेवाली इन्द्रिय तो विशेषण विशेष्य [ भाव ] द्वारा ही प्रकाशित करती है
यह सिद्धान्त [ पक्ष ] है ।
इस पर प्रश्न हो सकता है कि विशेषण विशेष्य भाव के सम्बन्धत्व का
खण्डन किया जा चुका है। ऐसी दशा में यदि इन्द्रिय से अभाव का ग्रहण
माना जायगा तो असम्बद्ध अभाव का ग्रहण माना जायगा । और उस दशा
में अति प्रसङ्ग दोष होगा । अर्थात् जब बिना सम्बन्ध के इन्द्रिय अभाव को
ग्रहण कर सकती है तब सभी पदार्थों को बिना सम्बन्ध के ग्रहण करती है
यह भी माना जा सकता है। इस शङ्का के होने पर नैयायिक का उत्तर यह है
कि हम तो विशेषण विशेष्य भाव को 'सम्बन्ध' मानते हैं इसलिए हमारे मत
में इन्द्रिय बिना सम्बन्ध के अभाव को ग्रहण नहीं करती इसलिए अतिप्रसङ्ग
का कोई अवसर नहीं है। फिर भी यदि आप उसे असंबद्ध ग्रहण ही कहते हैं
तो यह दोष आपके मत में भी आता है। क्योंकि अभाव प्रमाण के मान लेने
अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् १२५
असम्बद्धाभावग्रहेऽतिप्रसङ्गदोषस्तु विशेषणतयैव निरस्तः । समश्च
परमते ।
यत्रोभयोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥
पर भी उस प्रमाण का अभाव के साथ संयोग का समवाय कोई सम्बन्ध
नहीं बन सकेगा । इसलिए यह असंबद्धार्थ ग्राहकत्व दोष आप पर भी आता
है । और आप उसका जो समाधान करें वही समाधान हमारे पक्ष में भी
समझ लेना चाहिए ।
असम्बद्ध अभाव के ग्रहण में [ आने वाला ] अतिप्रसङ्गदोष तो विशे-
षणतया ही खण्डित हो जाता है । और दूसरे [ प्रतिवादी ] के मत में भी
समान है । [ इसलिए ]
जहाँ दोनों [ पक्षों ] में समान दोष हो और परिहार भी समान हो । ऐसे
अर्थ के विचार करते समय किसी एक पक्ष पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए ।
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने अर्थापत्ति तथा अभाव इन दो प्रमाणों का
अन्तर्भाव दिखाया है । इनमें से अर्थापत्ति का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में
अन्तर्भाव दिखाया है । और अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष से ही हो जाता है यह
न्याय सिद्धान्त स्थापित किया है । इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान,
उपमान और शब्द यह चार प्रमाण सिद्ध किए गए हैं । और शेष सबका अन्त-
र्भाव इन्हीं में किया गया है । परन्तु न्याय की अपेक्षा भी कम प्रमाण मानने
वाले सांख्य, योग, वैशेषिक आदि आस्तिक दर्शन भी हैं । सांख्य तथा योग,
में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द यह तीन प्रमाण माने गए हैं । उन्होंने
उपमान को अलग प्रमाण न मान कर इन्हीं तीनों प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव
मान लिया है ।
उपमान के विषय में सांख्यमत—
सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने उपमान प्रमाण के भिन्न भिन्न
तीन लक्षणों के अनुसार क्रमशः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द इन तीनों प्रमाणों
के भीतर उपमान का अन्तर्भाव दिखाते हुए लिखा है—
१ उपमानं तावत्, यथा गौस्तथा गवय इति वाक्यम् । तज्जनिता
धीरागम एव ।
२ योऽप्ययं गवयशब्दो गोसदृशस्य वाचक इति प्रत्ययः सोऽप्यनुमानमेव ।
यो हि शब्दः वृद्धैर्यत्र प्रयुज्यते सोऽसति वृत्त्यन्तरे तस्य वाचकः । यथा गो-
शब्दो गोत्वस्य । प्रयुज्यते चैष गवयशब्दो गोसदृशे इति तस्यैव वाचक इति
तज्ज्ञानमनुमानमेव ।
३ यत्तु गवयस्य चक्षुःसन्निकृष्टस्य गोसादृश्यज्ञानं तत्प्रत्यक्षमेव । अत एव
१२६ तर्कभाषा [ उपमाने सांख्यमतम् ]
स्मर्यमाणायां गवि गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षम् । न ह्यन्यद् गवि सादृश्यमन्यच्च
गवये । भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते ।
सामान्ययोगश्चैकः । स चेद् गवये प्रत्यक्षो गव्यपि तथेति नोपमानस्य प्रमेया-
न्तरमस्ति यत्र प्रमाणान्तरमुपमानं भवेदिति न प्रमाणान्तरमुपमानम्¹ ।
१ अर्थात् उपमान के तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं। उन तीनों के
अनुसार उपमान का इन तीन प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव हो सकता है। यदि
न्याय दर्शन के 'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्'² इस लक्षण के
अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को उपमान प्रमाण मानें तो
उससे उत्पन्न ज्ञान अर्थात् वाक्यार्थ ज्ञान ही उसका फल होगा। और वाक्य
से वाक्यार्थ का ज्ञान शब्द प्रमाण का विषय है इसलिए इस अवस्था में
उपमान का काम शब्द प्रमाण से निकल आता है । उसके लिए अलग उपमान
प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ।
२ इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन 'संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरुपमानार्थः'
यह लिखा है । इसके अनुसार । संज्ञा संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति को उपमान
प्रमाण का फल माना जाता है । इस पक्ष में वाचस्पति मिश्र उसका अन्तर्भाव
अनुमान में करते हैं । जो शब्द वृद्ध लोग जिस अर्थ में प्रयुक्त करते हैं यदि
लक्षणा आदि अन्य वृत्तियों का आश्रय न लिया जाय तो वह शब्द उस अर्थ
का वाचक होता है । वृद्ध लोग गवयशब्द को गोसदृश में प्रयुक्त करते हैं
इसलिए वह गोसदृश का वाचक होता है । इस प्रकार अनुमान प्रमाण से संज्ञा
संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति हो सकती है । अतः इस के लिए भी उपमान को
अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ।
३ मीमांसकों ने उपमान प्रमाण का प्रतिपादन अन्य प्रकार से किया है ।
उनके अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को सुनने के बाद जो व्यक्ति
जङ्गल में जाकर गो सदृश प्राणी को देखता है उसे पहिले यह ज्ञान होता है
कि इसके समान ही मेरी गौ है । यहां अप्रत्यक्ष गौ में जो इस गवय का
सादृश्य प्रतीत होता है वह उपमान प्रमाण से ही प्रतीत होता है यह मीमां-
सकों का मत है । परन्तु वाचस्पति मिश्र ने इस सादृश्य ज्ञान को प्रत्यक्ष
प्रमाण का विषय माना है । यद्यपि गौ प्रत्यक्ष नहीं है, गवय प्रत्यक्ष है । परन्तु
गौ तथा गवय का सादृश्य तो एक ही है । वह सादृश्य गवय के प्रत्यक्ष होने
से गवय में प्रत्यक्ष है इसलिए उससे अभिन्नगोनिष्ठ सादृश्य भी प्रत्यक्ष है । इस
१. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५ । २. न्यायसूत्रम् १, १, ६, ।
प्रमाणसंख्याभेदः ] अभावनिरूपणम् १२७
प्रकार इस कार्य के लिए भी उपमान प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अत
एव सांख्य में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना गया है।
अभाव के विषय में सांख्यमत—
अभाव प्रमाण का अन्तर्भाव नैयायिकों ने भी प्रत्यक्ष प्रमाण में किया है
और सांख्य में भी उसको प्रत्यक्ष के अन्तर्गत ही माना गया है। परन्तु उसके
उपपादन का मार्ग भिन्न है। सांख्य के मतानुसार भूतल के स्वरूप में प्रतिक्षण
परिवर्तन होता रहता है। उनमें कभी भूतल घटवत् अर्थात् घट युक्त होता है
और कभी घट के हट जाने पर केवल भूतल शेष रह जाता है। जब केवल
भूतल रह जाता है इसी अवस्था को 'घटाभाववद् भूतलम्' कहते हैं। इसलिए
घटाभाव भी भूतल का स्वरूप विशेष ही है। भूतल का ग्रहण इन्द्रिय से होता
है इसलिए उसका कैवल्य रूप भेद भी जिसको 'घटाभाववद् भूतल' कहा जाता
है, प्रत्यक्ष ही है। इसीलिए उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में ही हो सकता है।
वैशेषिक मत—
वैशेषिक दर्शन में केवल 'प्रत्यक्ष तथा अनुमान' ये दो ही प्रमाण माने हैं।
शेष सबका अन्तर्भाव अनुमान में ही किया है। उसमें से शब्द का अन्तर्भाव
अनुमान में किया गया है यह ऊपर दिखाया जा चुका है। शेष प्रमाणों का
अनुमान में अन्तर्भाव करते हुए वैशेषिक में लिखा है—
'प्रसिद्धाभिनस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात्तदप्यनुमानमेव ।
आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयत्वप्रतिपादनादुपमानमप्याप्तवचनमेव ।
दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येव । श्रवणादनुमितानुमानम् ।
सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव ।
अभावोऽप्यनुमानमेव । यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, एवमनुत्पन्नं
कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम्¹ ।
इस प्रकार वैशेषिक दर्शन में उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, सम्भव तथा
अभाव इन प्रमाणों का साक्षात् या परम्परया अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया
है। इसमें विशेषता यह है कि ऐतिह्य की चर्चा नहीं की है और उसके स्थान
पर चेष्टा का अन्तर्भाव दिखाया है।
सांख्य विषयक मतभेद—
सांख्य में तीन प्रमाण माने हैं और शेष सबका अन्तर्भाव उन्हीं में दिखाया
है। इनमें से उपमान तथा अभाव के अन्तर्भाव का प्रकार दिखाया जा चुका
१ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १११ ।
१२८ तर्कभाषा [ प्रमाणसंख्याभेदः
है। शेष अर्थापत्ति और सम्भव इन दो का अनुमान में और ऐतिह्य का शब्द
में अन्तर्भाव माना है।
इस प्रकार देखने से प्रतीत होता है कि प्रमाणों की संख्या के विषय में
अनेक प्रकार के मत दार्शनिकों में पाए जाते हैं। विभिन्न मतों में एक से लेकर
आठ तक प्रमाण माने गए हैं। इन मतों का वर्गीकरण इस प्रकार किया
जा सकता है।
एक प्रमाण वादी। चार्वाक सम्प्रदाय केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानता है।
द्वि प्रमाणवादी। बौद्ध तथा वैशेषिक प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो प्रमाण मानते हैं।
त्रि प्रमाणवादी। सांख्य और योग प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द इन तीन
प्रमाणों को मानते हैं।
चतुः प्रमाणवादी। नैयायिक, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द इन चार
प्रमाणों को मानते हैं।
पञ्च प्रमाणवादी। प्रभाकर अर्थापत्ति को पञ्चम प्रमाण मानते हैं।
षट् प्रमाणवादी। कुमारिल भट्ट तथा वेदान्ती अर्थापत्ति तथा अभाव को मिला-
कर छः प्रमाण मानते हैं।
अष्ट प्रमाणवादी। पौराणिक सम्प्रदाय में ऐतिह्य तथा सम्भव दो प्रमाण और
बढ़ा कर आठ प्रमाण माने गए हैं।
हमने 'दर्शन मीमांसा' में इसका संग्रह इस प्रकार किया है।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव न्याये चैव चतुष्टयम् ॥
पञ्च प्राभाकरा भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणान्यत्र मन्वते ॥
१ दर्शनमीमांसा ५ ।
प्रामाण्यवादः ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १२६
प्रामाण्यवादः
प्रामाण्यवाद निरूपण
इस प्रकार प्रमाणों का निरूपण हो चुकने के बाद इन प्रमाणों से उत्पन्न
ज्ञान के प्रामाण्य के निर्णय का प्रश्न सामने उपस्थित होता है। इस विषय में
आस्तिक दर्शनों में भी दो प्रकार के मत पाए जाते हैं। मीमांसक कुमारिलभट्ट
ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः मानते हैं और अप्रामाण्य परतः मानते हैं।
स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् ।
न हि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन शक्यते¹ ॥
इसके विपरीत नैयायिक और वैशेषिक दर्शन प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों को
परतः मानते हैं।
‘किं विज्ञानानां प्रामाण्यमप्रामाण्यं चेति द्वयमपि स्वतः, १ उत उभयमपि
परतः, ३ आहोस्विदप्रामाण्यं स्वतः प्रामाण्यं तु परतः, ४ उतस्वित् प्रामाण्यं
स्वतः अप्रामाण्यं तु परत इति ।
स्थितिमेतदर्थक्रियाज्ञानात् प्रामाण्यनिश्चय इति । तदिदमुक्तं, ‘प्रमाणतोऽ-
र्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत् प्रमाणम्' [ न्याय भाष्य पृ० १ ] इति । तस्मा-
दप्रामाण्यमपि परोक्षमित्यतो द्वयमपि परत इत्येष एव पक्षः श्रेयानिति² ।
इस प्रकार न्याय वैशेषिक के मत में प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों परतः माने
गए हैं। मीमांसक मत में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः माना
है। सांख्य और योग का इस विषय में क्या मत है इसका स्पष्ट उल्लेख उनके
मुख्य ग्रन्थों में नहीं मिलता है फिर भी माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह में
सांख्य को न्याय तथा मीमांसा दोनों से भिन्न प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य दोनों
को स्वतः मानने वाला बताया है ।
प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे स्वतः सांख्याः समाश्रिताः³ ।
'श्लोकवार्तिक' सूत्र २ में 'केचिदाहुर्द्वयं स्वतः' लिखकर इसी सांख्य
मत का निर्देश किया गया जान पड़ता है और बौद्ध आचार्य शान्तरक्षित ने भी
तत्त्वसंग्रह कारिका २८११ में इसी मत का समर्थन किया है। इस प्रकार न्याय
वैशेषिक प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों को परतः मानते हैं। सांख्य योग दोनों
को स्वतः मानते हैं। मीमांसा में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः
माना गया है। अब अप्रामाण्य को स्वतः और प्रामाण्य को परतः माननेवाला
१ श्लोक वार्तिक सू० २, श्लो० ४७ ।
२ न्यायमञ्जरी पृ० १६०-१७४ । कन्दली पृ० २१७-२२० ।
३ सर्वदर्शन संग्रह जैमिनिद० पृ० २७९ ।
६ त० भा०
१३० तर्कभाषा [ प्रामाण्यवादः
एक चौथा पक्ष शेष रह जाता है । सर्वदर्शन संग्रह में 'सौगताश्चरमं स्वतः' १
लिख कर बौद्धों को इस चतुर्थ पक्ष का मानने वाला बताया है ।
परन्तु बौद्ध आचार्य शान्त रक्षित ने 'तत्त्वसंग्रह' २ में बौद्ध मत को इन
चारों पक्षों से विलक्षण दिखाया है । वह लिखते हैं, -
'न हि बौद्धैरैषां चतुर्णामेकतमोऽपि पक्षोऽभीष्टः । अनियमपक्षस्येष्टत्वात् ।
तथाहि, उभयमप्येतत् किञ्चित् स्वतः, किञ्चित् परतः, इति पूर्वमुपवर्णितम् ।
अत एव पक्षचतुष्टयोपन्यासोऽप्ययुक्तः । पञ्चमस्याप्यनियमपक्षस्य सम्भवात् ।'
अनियम पक्ष का अभिप्राय यह है कि अभ्यासदशापन्न ज्ञान में प्रामाण्य
अप्रामाण्य दोनों स्वतः और अनभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों परतः हैं । जैन
परम्परा में आचार्य हेमचन्द्र ३ ने इसी रूप से तथा आचार्य देवसूरि ने उत्पत्ति
और ज्ञप्ति भेद से प्रामाण्य को स्वतः तथा परतः इन दोनों प्रकार का माना है-
तत्प्रामाण्यं ४ स्वतः परतश्चेति ।
तदुभयमुत्पत्तौ ५ परत एव ज्ञप्तौ तु स्वतः परतश्चेति ।
इस प्रकार प्रामाण्यवाद के विषय में कुल छः पक्ष बन जाते हैं-
१ न्याय पक्ष में प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः हैं ।
२ सांख्य पक्ष में प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों स्वतः हैं ।
३ मीमांसक पक्ष में प्रामाण्य स्वतः तथा अप्रामाण्य परतः है ।
४ बौद्धैकदेशी पक्ष में अप्रामाण्य स्वतः और प्रामाण्य परतः है ।
५ बौद्धपक्ष [शान्तरक्षित] में अभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों स्वतः और
अनभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों परतः हैं ।
६ जैनपक्ष में उत्पत्ति में दोनों परतः और ज्ञप्ति में दोनों स्वतः हैं ।
तर्कभाषाकार ने वहाँ जो प्रामाण्य चर्चा का विषय उठाया है वह मुख्यतः
मीमांसकों के 'स्वतः प्रामाण्यवाद' का निराकरण करने के लिए उठाया है ।
इसलिए अन्य पक्षों की चर्चा नहीं की है ।
हमने अपनी दर्शन मीमांसा में प्रामाण्यवादविषयक इन विभिन्न मतों का
संकलन इस प्रकार किया है-
प्रमाणत्वाप्रमाणत्वं सांख्ये योगे स्वतो मतम् ।
तदेव परतो ज्ञेयमुभयं गौतमे नये ॥
१ सर्व० द० पृ० २७९
२ तत्त्वसंग्रह कारिका ३१२३
३ प्रमाणमीमांसा १, १, ८ । ४ परी० १, १३ । ५ प्रमाणन० १, २१ ।
६ दर्शन मीमांसा ५ ।
मीमांसकमतम् ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १३१
प्राभाकराश्च भाट्टाश्च प्रामाण्यं ब्रुवते स्वतः ।
अप्रामाण्यं पुनस्तेषां पुन्दोषात् परतो मतम् ॥
स्वतोऽभ्यासद्शापक्षे, उभयं शान्तरक्षितैः ।
अनभ्यासद्शायां तैरभयं परतो मतम् ॥
अप्रामाण्यं स्वतो नित्यं प्रामाण्यं परतस्तथा ।
बौद्धं मतान्तरं प्रोक्तं सर्वदर्शनसंग्रहे ॥
स्वतस्त्वन्तु समुत्पत्तौ ज्ञप्तौ परतस्त्वं तथा ।
उभयोरेतयोः सर्वे जैनाश्च सम्प्रचक्षते १ ॥
मीमांसक मत का उपपादन—
मीमांसक मत स्वतः प्रामाण्यवादी है । उनके मत में स्वतः प्रमाण का
लक्षण 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' किया गया है । अर्थात् ज्ञान
ग्राहक सामग्री से अतिरिक्त सामग्री प्रामाण्यग्रह के लिए जहां अपेक्षित न होती
हो उसे स्वतः प्रमाण कहना चाहिए । अर्थात् जहां ज्ञान तथा तद्गत प्रामाण्य
दोनों का ग्रहण एक ही सामग्री से हो जाता है उसे स्वतः प्रमाण कहा जाता
है । इसके विपरीत 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्वं परतस्त्वम्' अर्थात् ज्ञान ग्राहक
और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री अलग अलग होने पर परतः प्रामाण्य होता है ।
यह 'स्वतः प्रामाण्य' और 'परतः प्रामाण्य' के लक्षण हैं । मीमांसक मत में
ज्ञान और प्रामाण्य दोनों की ग्राहक एक ही सामग्री 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता
अर्थापत्ति' है और न्याय मत में ज्ञान ग्राहक सामग्री 'अनुव्यवसाय' है तथा
'प्रामाण्य ग्राहक सामग्री' इससे भिन्न 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान' हैं ।
मीमांसक का अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान से घट में 'ज्ञातता'
नामक एक धर्म उत्पन्न होता है । यह धर्म 'अयं घटः' इस ज्ञान के होने से
पहिले नहीं था इस ज्ञान के बाद उत्पन्न हुआ है इसलिए वह 'अयं घटः' इस
ज्ञान से जन्य है । अर्थात् उसका कारण ज्ञान है ।
इस 'ज्ञातता' धर्म की प्रतीति 'ज्ञातो मया घटः' इस ज्ञान में होती है । यह
'ज्ञातता' धर्म अपने कारण ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता है । इसलिए
'ज्ञातता' की अन्यथानुपपत्ति से प्रसूता अर्थापत्ति ही इस 'ज्ञातता धर्म' की
ग्राहिका है । और जब 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान का ग्रहण
होता है तब उस ज्ञान में रहनेवाले प्रामाण्य का ग्रहण भी उसी अर्थापत्ति से
१ दर्शन मीमांसा ५ ।
१३२ | तर्कभाषा | [ मीमांसकमतम्
हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री समान हो
जाने से 'स्वतः प्रामाण्य' है । यह मीमांसक मत है ।
परन्तु नैयायिकों के मत में 'ज्ञातता' नाम का कोई पदार्थ ही नहीं है ।
इसलिए 'ज्ञातता' की सिद्धि का एक और भार मीमांसक पर आता है । बिना
ज्ञातता की सिद्धि के 'स्वतः प्रामाण्य' की सिद्धि नहीं हो सकती है । इसलिए
मीमांसक दूसरी 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से 'ज्ञातता' की सिद्धि
करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान का विषय घट होता है
पट नहीं । इस विषय नियम का उपपादन किस आधार पर किया जाय । नैया-
यिक के मत से इसका उपपादन 'तदुत्पत्ति सिद्धान्त' को मान कर और
बौद्धादि मतों में 'तादात्म्य' सिद्धान्त के आधार पर किया जा सकता है ।
परन्तु वे दोनों ही समाधान ठीक नहीं बनेंगे ।
'तदुत्पत्ति' सिद्धान्त का आशय यह होगा कि ज्ञान के प्रति विषय भी
कारण होता है । इसलिए 'अयं घटः' यह ज्ञान घट से पैदा होता है इसलिए
घटज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । यह 'तदुत्पत्ति' पक्ष से नैयायिकों की
ओर से कहा जा सकता है । परन्तु इस में दोष यह आता है कि 'घट-ज्ञान' के
प्रति जैसे विषय रूप घट कारण होता है इसी प्रकार आलोक भी कारण होता
है । घट से उत्पन्न होने के कारण यदि 'घट-ज्ञान' का विषय घट हो सकता है
तो 'घट-ज्ञान' आलोक से भी उत्पन्न होता है इसलिए उसका विषय आलोक
भी होना चाहिए । परन्तु कोई भी 'घट-ज्ञान' का विषय आलोक को मानने के
लिए तैयार नहीं हो सकता है । इसलिए 'तदुत्पत्ति' के आधार पर विषय
नियम का उपपादन नहीं किया जा सकता है ।
दूसरा 'तादात्म्य' या 'तदाकारतापक्ष' बौद्धों का या वेदान्त आदि का हो सकता
है । ज्ञान के आकार से बाह्य अर्थों का अनुमान माननेवाला बौद्ध वैभाषिक मत
है । और उनको सौत्रान्तिक मत में बाह्य अर्थों का अस्तित्व मानकर ज्ञान को तज्जन्य
तदाकार माना जाता है । इन मतों के अनुसार घट और घटज्ञान का 'तादात्म्य'
या 'तदाकारता' होने से घट ज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । इसप्रकार
तादात्म्य या तदाकारता के आधार पर भी विषय नियम का उपपादन करना ठीक
नहीं है क्योंकि ज्ञान और विषय वस्तुतः दोनों भिन्न हैं । घटादि विषयों का बाह्य
अस्तित्व है और उससे भिन्न ज्ञान का केवल आन्तरिक अस्तित्व है इसलिए
घट और ज्ञान का तादात्म्य बन भी नहीं सकता अतएव घट ज्ञान का विषय
घट ही क्यों होता है पट क्यों नहीं । इस विषय नियम का उपपादन न
'तदुत्पत्ति' पक्ष से ठीक होता है और न 'तादात्म्य' पक्ष से ही बन सकता है ।
स्वतःप्रामाण्यखण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३३
उसके उपपादन का केवल एक ही मार्ग है और वह है ज्ञातता। घट ज्ञान से
उत्पन्न होने वाली 'ज्ञातता' केवल घट में रहती है, पट में नहीं। इसलिए
घटज्ञान का विषय घट ही होता है पट नहीं। इस प्रकार 'ज्ञातता' के आधार
पर ही विषय नियम का उपपादन हो सकता है। अन्यथा नहीं। यह
'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' ही ज्ञातता की सिद्धि में प्रमाण है।
जब 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञातता की सिद्धि हो
जाती है तब वह ज्ञातता अपने कारण रूप ज्ञान को 'ज्ञाततान्यथानुपपत्ति-
प्रसूता अर्थापत्ति' से सिद्ध कर देती है और उसी अर्थापत्ति से, ज्ञान में रहने
वाले प्रामाण्य का भी ग्रहण हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य
ग्राहक सामग्री एक होने से 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' यह स्वतः
प्रामाण्य का लक्षण घटित हो जाने से स्वतः प्रामाण्यवाद ही मानना चाहिए
यह मीमांसक का मत है।
नैयायिक मत से स्वतः प्रामाण्य का खण्डन—
इसके विपरीत नैयायिक का सिद्धान्त पक्ष यह है कि मीमांसक 'विषय-
विषयिभाव' के उपपादन के लिए 'ज्ञातता' को मानना चाहते हैं यह ठीक नहीं
है। घट और ज्ञान का 'विषयविषयिभाव' ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु
स्वाभाविक है। यदि 'विषयविषयिभाव' को ज्ञातता के आधार पर मानेंगे तो
उसमें दो दोष होंगे। एक तो यह कि अतीत और अनागत पदार्थ ज्ञान का
विषय नहीं हो सकेंगे। क्योंकि आपके मत से ज्ञान का विषय वही हो सकता है
जो ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता का आधार हो। वर्तमान ज्ञातता का आधार
वर्तमान पदार्थ ही हो सकता है। अतीत और अनागत पदार्थों का वर्तमान काल
में कोई अस्तित्व नहीं है। तब ज्ञान से उत्पन्न होने वाली ज्ञातता उनमें कैसे
रहेगी। इसलिए यदि ज्ञातता के आधार पर विषय नियम माना जायगा तो
अतीत और अनागत पदार्थ विषय नहीं बन सकेंगे। यह एक दोष है जिसके कारण
विषय नियम को ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु स्वाभाविक मानना चाहिए।
ज्ञातता के आधार पर विषय नियम मानने में दूसरा 'अनवस्था' दोष
बाधक है। अनवस्था दोष का अभिप्राय यह है कि ज्ञातता का भी हमको ज्ञान
होता है अतः ज्ञातता भी उस ज्ञान का विषय होती है। आपके मतानुसार
ज्ञातता ज्ञान का विषय तब ही हो सकती है जब उसके ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता
उसमें रहे। इस प्रकार एक ज्ञातता के विषयत्व के उपपादन के लिए उसमें दूसरी
ज्ञातता माननी होगी। वह दूसरी ज्ञातता भी ज्ञान का विषय होती है इसलिए
१३४ तर्कभाषा [ परतःप्रामाण्यमण्डनम्
उसमें तीसरी ज्ञातता माननी होगी। इस प्रकार एक में दूसरी और दूसरी
में तीसरी ज्ञातता मानने से 'अनवस्था' होगी। यह दूसरा दोष ज्ञातता के
आधार पर विषय नियम मानने में बाधक है। अतएव विषय नियम ज्ञातता
के आधार पर नहीं अपितु स्वाभाविक है यही मानना उचित है।
विषय नियम के उपपादन के लिए मीमांसक ने ज्ञातता की अपरिहार्यता
बतलाई थी। जब उसका खण्डन हो गया तब ज्ञातता की सिद्धि का और कोई
मार्ग नहीं रह जाता है। इसलिए न्याय मत में ज्ञान विषयता के अतिरिक्त
ज्ञातता कोई पदार्थ नहीं है। यह ज्ञातता ही मीमांसक के स्वतः प्रामाण्यवाद
का मूल थी। इसी के आधार पर 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान
और प्रामाण्य का ग्रहण मान कर मीमांसक स्वतः प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं।
जब उस ज्ञातता का ही खण्डन हो गया तब फिर 'छिन्ने मूले नैव पत्रं न
शाखा'। 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान और प्रामाण्य ग्रहण
की चर्चा करना ही व्यर्थ है।
इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि जिस प्रकार यथार्थ ज्ञान से
ज्ञातता उत्पन्न होती है उसी प्रकार अयथार्थ ज्ञान से भी ज्ञातता उत्पन्न होती
है। इसलिए यदि यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली ज्ञातता से, ज्ञान और
प्रामाण्य दोनों का ग्रहण होता है यह माना जाय तो, उसी प्रकार अयथार्थज्ञान
से उत्पन्न होनेवाली ज्ञातता से ज्ञान और अप्रामाण्य का ग्रहण भी एक साथ
होता है यह भी मानना चाहिए। इस का अर्थ यह हुआ कि जिस 'ज्ञातता-
न्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से प्रामाण्य का ग्रहण होता है उसी अर्थापत्ति से
अप्रामाण्य का ग्रहण भी हो सकता है। इसलिए प्रामाण्य के समान अप्रामाण्य
को भी स्वतः मानना चाहिए। अथवा यदि अप्रामाण्य को परतः मानते हैं तो
प्रामाण्य को भी परतः मानना चाहिए। परन्तु मीमांसक इसे स्वीकार नहीं
करते हैं। वे प्रामाण्य को तो स्वतः मानते हैं परन्तु अप्रामाण्य को करण दोष
जन्य अर्थात् परतः मानते हैं। नैयायिक का कहना है कि इन दोनों की एक
सी स्थिति है। या तो दोनों को स्वतः मानो अथवा दोनों को परतः मानो।
और दोनों को परतः मानना ही उचित है। यह न्याय सिद्धान्त है।
परतः प्रामाण्य का उपपादन—
न्याय के परतः प्रामाण्यवाद में ज्ञान और प्रामाण्य दोनों की ग्राहक सामग्री
अलग अलग है। ज्ञान ग्राहक सामग्री तो 'अनुव्यवसाय' है और प्रामाण्य या
अप्रामाण्य की ग्राहक सामग्री, प्रवृत्ति के साफल्य या वैफल्य मूलक अनुमान है।
परतःप्रामाण्यमण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३५
पहिले प्रमाण से घट, पट या जलादि रूप अर्थ का ज्ञान होता है। उसके बाद
उसके ग्रहण आदि के लिए मनुष्य प्रवृत्त होता है। प्रवृत्ति होने पर यदि वह
प्रवृत्ति सफल हो जाती है अर्थात् वहाँ अर्थ की उपलब्धि हो जाती है तो
मनुष्य अपने उस ज्ञान को यथार्थ समझता है। और यदि प्रवृत्ति विफल हो
जाती है तो मनुष्य अपने ज्ञान को अयथार्थ अथवा भ्रम समझता है। इस
प्रकार प्रवृत्ति के साफल्य या वैफल्य के अनुसार प्रामाण्य या अप्रामाण्य का
निर्णय हाता है। ऐसे स्थलों को जहाँ ज्ञान के बाद प्रवृत्ति हो जाती है और
उसके बाद प्रामाण्य या अप्रामाण्य का निश्चय होता है, 'अभ्यास दशा' कहते
हैं। इस 'अभ्यासदशापन्न ज्ञान' के प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य का निश्चय
'प्रवृत्ति साफल्य या वैफल्य मूलक अनुमान' से होता है यह तो स्पष्ट ही है।
इसके अनुसार अनुमान इस प्रकार बनेगा । 'इदं मे जलज्ञानं प्रमाणं समर्थ-
प्रवृत्तिजनकत्वात्' । यह मेरा जल ज्ञान प्रमाण है सफलप्रवृत्ति का जनक होने
से। इस प्रकार 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' हेतु से 'अभ्यासदशापन्नज्ञान' का
प्रामाण्य 'प्रवृत्ति साफल्य मूलक अनुमान' के द्वारा गृहीत होता है ।
परन्तु कुछ स्थल ऐसे भी होते हैं जहाँ ज्ञान होने के बाद ही, अर्थात् प्रवृत्ति
से पहिले ही, उसके प्रामाण्य का भी ग्रहण हो जाता है। ऐसे ज्ञान को 'अन-
भ्यासदशापन्न ज्ञान' कहेंगे। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है 'अभ्यासदशापन्नज्ञान'
में तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु हो सकता है। परन्तु 'अनभ्यासदशा-
पन्नज्ञान' में जहाँ प्रवृत्ति हुई ही नहीं है वहाँ 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु
कैसे बनेगा। इसका उत्तर यह है कि वहाँ 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' के बजाय
'समर्थप्रवृत्तिजनकज्ञानजातीयत्वात्' यह हेतु रखना चाहिए। इस 'अभ्यास-
दशापन्न' शब्द का उल्लेख बौद्ध और जैन दर्शनों ने इस स्वतः प्रामाण्यवाद के
प्रसङ्ग में किया है।
न्याय मत में प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य का ग्रहण तो इस प्रवृत्ति साफल्य
अथवा वैफल्य मूलक अनुमान से होता है परन्तु ज्ञान का ग्रहण 'अनुव्यवसाय'
से होता है। ज्ञान के ज्ञान को 'अनुव्यवसाय' कहते हैं। जैसे 'अयं घट:' यह
ज्ञान घट से उत्पन्न होता है। इस ज्ञान का विषय घट होता है। इस प्रथम
ज्ञान को 'व्यवसायात्मक ज्ञान' कहते हैं। इसके बाद 'घटज्ञानवानहम्' या
'घटमहं जानामि' इस प्रकार का ज्ञान होता है। इस द्वितीय ज्ञान का विषय
घट नहीं अपितु 'घट ज्ञान' होता है। इस ज्ञान विषयक ज्ञान को 'अनुव्यव-
साय' कहते हैं। इसी अनुव्यवसाय से ज्ञान का ग्रहण होता है।
मीमांसक की 'ज्ञातता' की उत्पत्ति भी 'अयं घटः' इस ज्ञान से होती है
१३६ तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यपक्षः
इदमिदानीं निरूप्यते । जलादिज्ञाने जाते, तस्य प्रामाण्यमवधार्य
कश्चिज्जलादौ प्रवर्तते । कश्चित्तु सन्देहादेव प्रवृत्तः प्रवृत्त्युत्तरकाले
जलादिप्रतिलम्भे सति प्रामाण्यमवधारयतीति वस्तुगतिः ।
अत्र कश्चिदाह । प्रवृत्तेः प्रागेव प्रामाण्यावधारणात् । अस्यार्थः ।
येनैव यज्ज्ञानं गृह्यते तेनैव तद्गतं प्रामाण्यमपि न तु ज्ञानग्राहकादन्यज्
ज्ञानधर्मस्य प्रामाण्यस्य ग्राहकम् । तेन ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वमेव
स्वतस्त्वं प्रामाण्यस्य। ज्ञानं च प्रवृत्तेः पूर्वमेव गृहीतं कथमन्यथा प्रामाण्या-
और नैयायिकों के 'अनुव्यवसाय' की उत्पत्ति भी उसी 'अयं घटः' ज्ञान से
होती है। परन्तु उन दोनों में अन्तर यह है कि मीमांसक की 'ज्ञातता' तो
घट में रहने वाला धर्म है और नैयायिक का 'अनुव्यवसाय' घट में नहीं किन्तु
आत्मा में रहने वाला धर्म है ।
मीमांसक 'अयं घटः' से घट में ज्ञातता धर्म की उत्पत्ति मान कर उसी के
आधार पर विषय नियम का उपपादन करते हैं और उसी के आधार पर
'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान और प्रामाण्य दोनों का ग्रहण
मान कर 'स्वतः प्रामाण्यवाद' की स्थापना करते हैं । परन्तु नैयायिक विषय
नियम को स्वाभाविक मान कर 'ज्ञातता' का खण्डन कर देते हैं और ज्ञान का
ग्रहण 'अनुव्यवसाय' से तथा प्रामाण्य का ग्रहण 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान'
से मान कर परतः प्रामाण्यवाद को सिद्ध करते हैं । यही कहते हैं—
अब यह [ प्रामाण्यवाद ] निरूपण करते हैं कि जलादि का ज्ञान होने पर
कोई [ अनभ्यास दशा में ही ] उसका प्रामाण्य निश्चय करके जलादि [ के हान
उपादान आदि ] में प्रवृत्त होता है । और कोई [ प्रामाण्य का अवधारण किए
बिना ] सन्देह से ही प्रवृत्त होकर जल आदि की प्राप्ति होने पर प्रामाण्य का
निर्णय [ अभ्यास दशापन्न रूप से ] करता है । यह वस्तु स्थिति है ।
यहां [ इस विषय में ] कोई [ मीमांसक ] कहता है । प्रवृत्ति के पूर्व ही
प्रामाण्य का निश्चय हो जाने से [ प्रवृत्ति साफल्य प्रामाण्य का अनुमापक नहीं
है ] । इसका अर्थ यह है कि जिस [ सामग्री ] से जिस ज्ञान का ग्रहण होता है
उसी [ सामग्री ] से उस [ ज्ञान ] में रहने वाले प्रामाण्य का भी ग्रहण होता
है । ज्ञान ग्राहक से भिन्न ज्ञान के धर्म प्रामाण्य का ग्राहक दूसरा नहीं है ।
[ अर्थात् नैयायिक जो ज्ञान का ग्रहण 'अनुव्यवसाय' से और प्रामाण्य का ग्रहण
'प्रवृत्ति साफल्य मूलक अनुमान' से सिद्ध करना चाहते हैं वह ठीक नहीं है ] इस
लिए [ ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री एक होने से ] ज्ञान ग्राहक से
स्वतःप्रामाण्यपक्षः ] प्रामाण्यवादः १३७
प्रामाण्यसन्देहोऽपि स्यात् । अनधिगते धर्मिणिऽसन्देहानुदयात् । तस्मात्
प्रवृत्तेः पूर्वमेव ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्या ज्ञाने गृहीते
ज्ञानगतं प्रामाण्यमप्यर्थापत्त्यैव गृह्यते । ततः पुरुषः प्रवर्तते । न तु
प्रथमं ज्ञानमात्रं गृह्यते ततः प्रवृत्त्युत्तरकाले फलदर्शनेन ज्ञानस्य प्रामा-
ण्यमवधार्यते ।
अत्रोच्यते । ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्या ज्ञानं गृह्यते इति
यदुक्तं तदेव वयं न मृष्यामहे तया प्रामाण्यग्रहस्तु दूरत एव । तथा हि
इदं किल परस्याभिमतम् । घटादिविषये ज्ञाने जाते 'मया ज्ञातोऽयं घटः'
इति घटस्य ज्ञातता प्रतिसन्धीयते । तेन ज्ञाने जाते सति ज्ञातता नाम
कश्चिद्धर्मो जात इत्यनुमीयते । स च ज्ञानात्पूर्वमजातत्वात् , ज्ञाने जाते
च जातत्वाद्न्वयव्यतिरेकाभ्यां ज्ञानेन जन्यत इत्यवधार्यते । एवं च
ज्ञानजन्योऽसौ ज्ञातता नाम धर्मो ज्ञानमन्तरेण नोपपद्यते कारणाभावे
कार्यानुदयात् । तेनार्थापत्त्या स्वकारणं ज्ञानं ज्ञाततयाऽऽक्षिप्यत इति ।
अतिरिक्त [ प्रामाण्य ग्रह के लिये दूसरी सामग्री ] की अपेक्षा न होने से
प्रामाण्य का स्वतस्त्व ही है ।
ज्ञान तो प्रवृत्ति के पूर्व ही गृहीत हो जाता है [ यह निश्चय है ] अन्यथा
[ ज्ञान रूप धर्मी का ग्रहण हुए बिना ] प्रामाण्य अप्रामाण्य का संदेह भी कैसे
हो सकेगा । धर्मी [ रूप ज्ञान ] के ज्ञान के बिना [ उसमें प्रामाण्य या अप्रा-
माण्य रूप धर्म का ] सन्देह नहीं हो सकता है । इसलिए प्रवृत्ति के पहिले
[ अनभ्यास दशा में ] ही ज्ञातता [ रूप कार्य ] की अन्यथा [ ज्ञान रूप कारण
के बिना ] अनुपपत्ति से उत्पन्न अर्थापत्ति से ज्ञान का ग्रहण होने पर उसमें
रहने वाले प्रामाण्य का भी उसी अर्थापत्ति से ग्रहण हो जाता है । उसके बाद
पुरुष प्रवृत्त होता है । न कि पहिले केवल ज्ञान गृहीत होता है और उसके बाद
प्रवृत्ति के उत्तरकाल में फल को देखकर ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय होता है ।
[ यह मीमांसक का पूर्व पक्ष हुआ ] ।
इस [ विषय ] पर [ उत्तर ] कहते हैं । ज्ञातता की अन्यथानुपपत्ति से
प्रसूत अर्थापत्ति से ज्ञान का ग्रहण होता है यह जो कहा है उसको ही हम
[ नैयायिक ] नहीं मान सकते हैं उस [ अर्थापत्ति ] के द्वारा प्रामाण्यग्रह तो
दूर रहा । क्योंकि [ इस विषय में पूर्वपक्षी ] दूसरे [ मीमांसक के पूर्वपक्ष ] का
अभिप्राय यह है कि घटादि विषयक ज्ञान के होने पर मैंने यह घड़ा जान लिया
इस प्रकार घट की ज्ञातता प्रतीत होती है । उससे ज्ञान के होने पर [ घट में ज्ञातता
१३८ तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यपक्षः
न चैतद्युक्तम्। ज्ञानविषयतातिरिक्ताया ज्ञातताया अभावात्।
ननु ज्ञानजनितज्ञातताधारत्वमेव हि घटादेर्ज्ञानविषयत्वम् । तथा
हि न तावत् तादात्म्येन विषयता, विषयविषयिणोर्घटज्ञानयोस्तादात्म्या-
नभ्युपगमात्। तदुत्पत्त्या तु विषयत्वे इन्द्रियादेरपि विषयत्वापत्तिः।
इन्द्रियादेरपि तस्य ज्ञानस्योत्पत्तेः। तेनेदमनुमीयते । ज्ञानेन घटे किञ्चि-
ज्जनितं येन घट एव तस्य ज्ञानस्य विषयो नान्यः। इत्यतो विषयत्वान्य-
थानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्यैव ज्ञाततासिद्धिः, नतु प्रत्यक्षमात्रेण ।
नामक कोई धर्म उत्पन्न हुआ यह अनुमान होता है। और वह [ धर्म ] ज्ञान से
पहिले न होने और ज्ञान के उत्पन्न होने के बाद उत्पन्न होने से अन्वय व्यतिरेक
से ज्ञान से उत्पन्न होता है ऐसा निश्चय होता है। इस प्रकार ज्ञान से उत्पन्न
यह ज्ञातता नामक धर्म ज्ञान के बिना उपपन्न नहीं होता है कारण के अभाव में
कार्य का उदय न होने से। इसलिए ज्ञातता, अर्थापत्ति द्वारा अपने कारण ज्ञान
का आक्षेप करती है [ यह मीमांसक के पूर्वपक्ष का आशय हुआ । ]
[ इसके उत्तर में नैयायिक का कहना है कि ] ज्ञान विषयता के अतिरिक्त
ज्ञातता [ नामक पदार्थ ] का अभाव होने से यह [ कहना ] ठीक नहीं है।
[ इस पर मीमांसक फिर ज्ञातता की सिद्धि 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्था-
पत्ति' के आधार पर इस प्रकार करता है कि ] ज्ञान से जन्य ज्ञातता का आधार
होना ही घट आदि का ज्ञानविषयत्व है। क्योंकि विषय [ घट ] और विषयी
[ ज्ञान ] का तादात्म्य अभिमत न होने से तादात्म्य से विषयता [ नियन्त्रित ]
नहीं हो सकती। तदुत्पत्ति से [ अर्थात् घटज्ञान घट से उत्पन्न होता है इसलिए ]
विषयत्व मानने पर तो इन्द्रिय आदि [ आदि पद से आलोक ] से भी उस ज्ञान
के उत्पन्न होने से इन्द्रियादि का भी विषयत्व होने लगेगा। [ अर्थात् इन्द्रिय और
आलोक आदि भी घट ज्ञान का विषय कहलाने लगेंगे । ] इसलिए [ तादात्म्य
या तदुत्पत्ति अथवा अन्य किसी भी प्रकार से विषय नियम का उपपादन सम्भव
न होने से ] यह अनुमान होता है कि ज्ञान ने घट में कुछ [ ज्ञातता रूप धर्म ]
उत्पन्न कर दिया है जिसके कारण घट ही उसका विषय होता है अन्य [पटादि]
नहीं। इसलिए विषयत्व की अन्यथा [ अर्थात् ज्ञातता के बिना ] अनुपपत्ति से
उत्पन्न अर्थापत्ति [ प्रमाण ] द्वारा ज्ञातता की सिद्धि होती है। केवल प्रत्यक्ष
मात्र से नहीं। [ यह मीमांसक का ज्ञातता सिद्धि के विषय में पूर्व पक्ष हुआ ।
इसका खण्डन आगे करते हैं । ]
स्वतःप्रामाण्यखण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३६
मैवम् । स्वभावादेव विषयविषयितोपपत्तेः । अर्थज्ञानयोरेतादृश एव
स्वभाविको विशेषो येनानयोर्विषयविषयिभावः । इतरथातीतानागतयो-
र्विषयत्वं न स्यात् । ज्ञानेन तत्र ज्ञातताजननासम्भवादसति धर्मिणि
धर्मजननायोगात् ।
किञ्च, ज्ञातताया अपि स्वज्ञानविषयत्वात् तत्रापि ज्ञाततान्तर-
प्रसङ्गस्तथा चाऽनवस्था । अथ ज्ञाततान्तरमन्तरेणापि स्वभावादेव
विषयत्वं ज्ञाततायाः । एवं चेत् तर्हि घटादावपि किं ज्ञाततयेति ।
विषयविषयी भाव के स्वभावतः होने से, यह [पूर्वपक्ष का] कहना ठीक नहीं
है । अर्थ और ज्ञान का [ कुछ ] ऐसा स्वाभाविक विशेष [ सम्बन्ध ] है कि जिससे
इन दोनों का विषयविषयीभाव होता है । अन्यथा [ यदि ज्ञानजनित ज्ञातता का
आधार होने से ही विषयविषयी भाव माना जाय तो ] अतीत और अनागत
[ पदार्थों ] का विषयत्व नहीं हो सकेगा । धर्मी [ अतीतादि पदार्थ ] के अविद्य-
मान होने पर उसमें [ ज्ञातता रूप ] धर्म की उत्पत्ति असम्भव होने से । ज्ञान
से उस [ अतीतादि पदार्थ ] में ज्ञातता का उत्पादन, असम्भव होने से ।
[ ज्ञातता के अभाव में अतीतादि पदार्थों का विषयत्व नहीं होगा । ]
और [ दूसरा दोष यह भी होगा कि ] ज्ञातता भी अपने ज्ञान का विषय
होती है इसलिए उसमें दूसरी ज्ञातता माननी होगी और इस प्रकार अनवस्था दोष
होगा । और यदि [ इन अनवस्था दोष को बचाने के लिए ज्ञातता में ] दूसरी
ज्ञातता के माने बिना ही स्वभाव से ही ज्ञातता का विषयत्व [ मीमांसक को
अभिमत ] हो तो ऐसा होने पर घटादि में भी ज्ञातता [ मानने ] से क्या [ लाभ ।
जैसे बिना दूसरी ज्ञातता के माने ही ज्ञातता अपने ज्ञान का विषय हो सकती है ।
इसी प्रकार घट आदि भी ज्ञातता के बिना स्वभाव से ही ज्ञान के विषय हो सकते
हैं । फिर उनमें ही ज्ञातता मानने की क्या आवश्यकता है । ]
इस प्रकार विषय नियम को स्वाभाविक मान कर ज्ञातता की अनुपयोगिता
प्रतिपादित की । न केवल ज्ञातता अनावश्यक ही है अपितु उसके मानने पर
अतीत अनागत आदि का विषयत्व नहीं बन सकता है और अनवस्था दोष भी
आता है इसलिए ज्ञातता का मानना असङ्गत है । इस प्रकार से नैयायिक ने
ज्ञातता का खण्डन किया । अब आगे यह कहते हैं कि 'दुर्जन तोष' न्याय से
यदि थोड़ी देर के लिए ज्ञातता को मान भी लिया जाय तो भी उससे स्वतः
प्रामाण्य की सिद्धि नहीं हो सकती । क्योंकि ज्ञातता मान लेने पर भी ज्ञान
१४० तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यखण्डनम्
अस्तु वा ज्ञातता तथापि तन्मात्रेण ज्ञानं गम्यते ज्ञातताविशेषेण
प्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा प्रामाण्यमिति कुत एव ज्ञानग्राहकग्राह्यता
प्रामाण्यस्य । अथ केनचिज्ज्ञातताविशेषेण प्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा
ज्ञानप्रामाण्ये सहैव गृह्येते । एवं चेदप्रामाण्येऽपि शक्यमिदं वक्तुम् ।
केनचिज्ज्ञातताविशेषेण अप्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा ज्ञानाप्रामाण्ये
सहैव गृह्येते इत्यप्रामाण्यमपि स्वत एव गृह्यताम् ।
ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री एक नहीं किन्तु अलग अलग ही माननी
पड़ेगी। क्योंकि ज्ञान का ग्रहण तो प्रत्येक ज्ञातता से होता है फिर चाहे
वह ज्ञातता यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न हुई हो अथवा अयथार्थ ज्ञान से । दोनों
ही प्रकार के ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता अपने कारण 'ज्ञान' का अर्थापत्ति से
बोध करावेगी। परन्तु प्रामाण्य का ग्रहण दोनों प्रकार की ज्ञातता नहीं करा
सकती है। प्रामाण्य का ग्रहण तो केवल वही ज्ञातता करा सकेगी जो यथार्थ
ज्ञान से उत्पन्न हुई हो । इस प्रकार ज्ञान ग्राहक सामग्री 'ज्ञातता मात्र' और
प्रामाण्य ग्राहक सामग्री केवल यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली 'ज्ञातता विशेष'
है। इसलिए, ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री में भेद हो जाने से
ज्ञातता को मान लेने पर भी स्वतः प्रामाण्य सिद्ध नहीं हो सकता है । यही
कहते हैं—
अथवा [ दुर्जन तोष न्याय से ] ज्ञातता मान भी लें तो भी 'ज्ञातता मात्र'
[ अर्थात् यथार्थ ज्ञान और अयथार्थ ज्ञान सभी से उत्पन्न होने वाली सभी प्रकार
की ज्ञातता ] से ज्ञान का ग्रहण होता है और प्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी
[ यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न ] किसी 'ज्ञातता विशेष' से प्रामाण्य गृहीत होता है
इसलिए ज्ञानग्राहक सामग्री से प्रामाण्य की ग्राह्यता कहाँ रही ।
और यदि प्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी [ यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न हुई ]
किसी ज्ञातता विशेष से ज्ञान और प्रामाण्य का ग्रहण साथ ही होता है यह कहो
तो, अप्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी किसी ज्ञातता विशेष [ अयथार्थ अथवा
भ्रम ज्ञान से उत्पन्न हुई ज्ञातता ] से ज्ञान और अप्रामाण्य का ग्रहण भी साथ
ही होता है इसलिए अप्रामाण्य भी स्वतः ही मानना चाहिए [ परन्तु मीमांसक
इस को नहीं मानते हैं। वह प्रामाण्य का स्वतः और अप्रामाण्य का परतः ग्रहण
मानते हैं। नैयायिक का कहना यह है कि इस युक्ति से या तो प्रामाण्य और
अप्रामाण्य दोनों को स्वतः मानना चाहिए या फिर दोनों को परतः ही मानना
चाहिये। और दोनों का परतः मानना ही अधिक युक्तिसङ्गत है । ]
परतःप्रामाण्यमण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १४१
अथैवमप्यप्रामाण्यं परतस्तर्हि प्रामाण्यमपि परत एव गृह्यताम् ।
ज्ञानग्राहकादन्यत इत्यर्थः । ज्ञानं हि मानसप्रत्यक्षेणैव गृह्यते प्रामाण्यं
पुनरनुमानेन । तथाहि जलज्ञानानन्तरं जलार्थिनः प्रवृत्तिर्द्वैधा, फलवती,
अफला चेति । तत्र या फलवती प्रवृत्तिः सा समर्था तया तज्ज्ञानस्य
याथार्थ्यलक्षणं प्रामाण्यमनुमीयते । प्रयोगश्च विवादाध्यासितं जलज्ञानं
प्रमाणं, समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात् । यन्न प्रमाणं तन्न समर्थां प्रवृत्तिं जनयति
यथा प्रमाणाभास इति केवलव्यतिरेकी ।
अत्र च फलवत्प्रवृत्तिजनकं यज्जलज्ञानं तत्पक्षः, तस्य प्रामाण्यं साध्यं
याथार्थ्यमित्यर्थः । न तु प्रमाकरणत्वं, स्मृत्या व्यभिचारापत्तेः । हेतुस्तु
समर्थप्रवृत्तिजनकत्वं फलवत्प्रवृत्तिजनकत्वमिति यावत् ।
अनेन तु केवलव्यतिरेक्यनुमानेनाभ्यासदशापन्नस्य ज्ञानस्य प्रामाण्ये-
ऽवबोधिते तद्दृष्टान्तेन जलप्रवृत्तेः पूर्वमपि तज्जातीयत्वेन लिङ्गेनान्वय-
और यदि ऐसा होने पर भी [ अप्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी किसी
ज्ञातता विशेष से ज्ञान और अप्रामाण्य के एक साथ ही गृहीत होने पर भी ]
अप्रामाण्य परतः ही [ मानना अभीष्ट ] है तो प्रामाण्य का ग्रहण भी परतः
मानना चाहिए । [ परतः ] अर्थात् ज्ञान ग्राहक [ सामग्री ] से भिन्न [ सामग्री ]
से [ न्याय सिद्धान्त ] । ज्ञान का ग्रहण [ अनुव्यवसाय रूप ] मानस प्रत्यक्ष से
होता है । और प्रामाण्य का ग्रहण [ प्रवृत्ति साफल्य मूलक ] अनुमान से ।
[ इसे यों समझिए ] जैसे कि जल ज्ञान के अनन्तर जलार्थी की प्रवृत्ति दो प्रकार
की होती [ हो सकती ] है [ एक ] फलवती और [ दूसरी ] अफला । उसमें जो
फलवती [ सफला ] प्रवृत्ति है वह समर्था [ प्रवृत्ति कहलाती ] है । उससे उस
ज्ञान का याथार्थ्य रूप प्रामाण्य अनुमित होता है । [ उसके अनुमान वाक्य का ]
प्रयोग [ इस प्रकार बनेगा ] । विवाद ग्रस्त [ अर्थात् सन्दिग्ध, प्रस्तुत ] जल ज्ञान
समर्थ [ सफल ] प्रवृत्ति का जनक होने से प्रमाण है। जो [ ज्ञान ] समर्थ
[सफल] प्रवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता है वह प्रमाण नहीं होता है जैसे प्रमाणा-
भास । यह केवल व्यतिरेकी [ अनुमान ] है ।
यहां [ इस व्यतिरेकी अनुमान में ] सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाला जो
जल ज्ञान है वह पक्ष है और उसका प्रामाण्य अर्थात् याथार्थ्य साध्य है । प्रमा-
करणत्व नहीं [ साध्य है ] । स्मृति में व्यभिचारी होने से । [ अर्थात् समर्थ प्रवृत्ति
जनक या सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाली स्मृति का भी याथार्थ्य रूप
प्रामाण्य माना जाता है । प्रमाकरणत्व रूप प्रामाण्य स्मृति का नहीं होता है ।
इसलिये यहां प्रामाण्य का अर्थ याथार्थ्य करना चाहिए प्रमाकरणत्व नहीं ] और