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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 330 में से

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पृष्ठ 188

सम्बन्धत्वखण्डनम् ] अभावानिरूपणम् १२३
कत्वं स्वरूपमेव हि व्यापकत्वमग्न्यादीनाम् । कारणत्वमपि कार्यानुकृता-
न्वयव्यतिरेकि स्वरूपमेव हि तन्त्वादीनां, नत्वर्थान्तरमभावस्यापि
व्यापकत्वात्कारणत्वाच्च । नह्यभावे सामान्यादिसम्भवः ।
तदेवं विशेषणविशेष्यभावो न विशेषणविशेष्यस्वरूपाभ्यां भिन्नः ।
नाप्युभयाश्रितो, विशेषणे विशेषणभावमात्रस्य सत्त्वाद् विशेष्यभावस्या-
भावाद्, विशेष्ये च विशेष्यभावमात्रस्य सद्भावाद्, विशेषणभावस्याभा-
वात् । नाप्येको, विशेषणं च विशेष्यं च तयोर्भाव इति द्वन्द्वात् परं श्रूय-
माणो भावशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा च विशेषणभावो विशेष्य-
भावश्चेत्युपपन्नम् । द्वावेतावेकश्च सम्बन्धः तस्माद् विशेषणविशेष्यभावो
स्वप्रतिबद्ध [ अपने से संबद्ध ] बुद्धि को उत्पन्न करना ही उनका व्यापकत्व है ।
[ इसी प्रकार ] कारणत्व भी तन्त्वादि का कार्यानुकृत अन्वय व्यतिरेकिस्वरूप ही
है, अर्थान्तर नहीं । अभाव के भी व्यापक तथा कारण होने से । [ यदि व्याप्य
व्यापक भाव अथवा कार्य कारण भाव को सम्बन्धियों से भिन्न मानेंगे तो जैसा
विशेष्य विशेषण भाव के विषय में दिखाया है व्याप्य व्यापक भाव तथा कारण
कार्य भाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से ही कोई पदार्थ मानना होगा । परन्तु ]
अभाव में सामान्यादि [ छहों पदार्थों में से किसी ] का सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार विशेषण विशेष्य भाव विशेषण और विशेष्य के स्वरूपों से भिन्न
नहीं है । और न उभयाश्रित ही है, विशेषण में विशेषण भाव मात्र के होने
और विशेष भाव के न होने से, और विशेष्य में विशेष्य भाव मात्र के होने से
विशेषण भाव के न होने से । [ उन दोनों में से कोई भी उभयाश्रित नहीं है ]
और न एक ही है । [ क्योंकि ] विशेषण और विशेष्य और उन दोनों का
भाव इस रूप में [ विशेषण विशेष्य भाव पद में 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं
प्रत्येकमभिसम्बध्यते,' इस नियम के अनुसार ] द्वन्द्व से परे श्रूयमाण भाव पद
[ विशेषण और विशेष्य दोनों पदों में से ] प्रत्येक के साथ सम्बद्ध होता है । इस
प्रकार विशेषणभाव और विशेष्यभाव यह [ अर्थ ] उपपन्न होता है । [ इससे
स्पष्ट है कि ] ये दो हैं और सम्बन्ध एक होता है [ इसलिए विशेषण-विशेष्य
भाव सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं ] इसी प्रकार व्याप्य-व्यापक-भावादि भी
[ सम्बन्ध नहीं हैं । इस प्रकार प्रबलतर युक्तियों से यह सिद्ध होता है कि
विशेषण विशेष्य भाव, व्याप्य व्यापक भाव, कार्य कारण भाव आदि कोई भी
सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं क्योंकि उनमें सम्बन्ध का लक्षण नहीं घटता है ।
इस प्रकार उनका सम्बन्धत्व सिद्ध न होने पर भी उनके लिए ] सम्बन्ध शब्द
का प्रयोग तो दो के द्वारा निरूपणीय होने से [ सम्बन्ध के साथ ] साधर्म्य वश