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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 330 में से

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पृष्ठ 187

१२२ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
विशेषणविशेष्यभावश्च सम्बन्ध एव न सम्भवति भिन्नोभयाश्रितै-
कत्वाभावात् । सम्बन्धो हि सम्बन्धिभ्यां भिन्नो भवत्युभयसम्बन्ध्याश्रित-
श्चैकश्च । यथा भेरीदण्डयोः संयोगः । स हि भेरीदण्डाभ्यां भिन्नस्तदु-
भयाश्रितश्चैकश्च । न च विशेषणविशेष्यभावस्तथा । तथाहिं दण्डपुरुष-
योर्विशेषणविशेष्यभावो न ताभ्यां भिद्यते । न हि दण्डस्य विशेषणत्व-
मर्थान्तरं, नापि पुरुषस्य विशेष्यत्वमर्थान्तरमपि तु स्वरूपमेव । अभाव-
स्यापि विशेषणत्वाद् विशेष्यत्वाच्च । न चाभावे कस्यचित् पदार्थस्य
द्रव्याद्यन्यतमस्य सम्भवः । तस्मादभावस्य स्वोपरक्तबुद्धिजनकत्वं
यत्स्वरूपं तदेव विशेषणत्वं, न तु पदार्थान्तरम् ।
एवं व्याप्यव्यापकत्वकारणत्वादयोऽप्यूह्याः । स्वप्रतिबद्धबुद्धिजन-
इसी का उपपादन ग्रन्थकार इस प्रकार करते हैं—
और विशेषण विशेष्य भाव [ सम्बन्धियों से ] भिन्न, उभयाश्रित और एक
न होने से सम्बन्ध ही नहीं हो सकता है । क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धियों से भिन्न
उभयाश्रित और एक होता है । जैसे भेरी और दण्ड का संयोग [सम्बन्ध है, तो]
वह भेरी और दण्ड [ दोनों सम्बन्धियों ] से भिन्न [ भेरी और दण्ड दोनों द्रव्य
हैं और संयोग गुण है इसलिए वह दोनों सम्बन्धियों से भिन्न है ] उभयाश्रित और
एक है । परन्तु विशेषण विशेष्यभाव वैसा [ अर्थात् सम्बन्धिभ्यां भिन्नः उभयाश्रितः
और एकश्च ] नहीं है । क्योंकि [ दण्डी पुरुषः इस विशिष्ट प्रतीति में क्रमशः ]
दण्ड और पुरुष का विशेषण विशेष्य भाव उन [ दण्ड और पुरुष के स्वरूप ]
से भिन्न नहीं है [ किन्तु उनका स्वरूप ही है ] । दण्ड का विशेषणत्व [ उसके
स्वरूप से भिन्न ] कोई दूसरा पदार्थ नहीं है और न तो पुरुष का विशेष्यत्व
[ उसके स्वरूप से भिन्न ] ही कोई अर्थान्तर है । किन्तु [ विशेषण और विशेष्य
भाव उन दोनों का ] स्वरूपभूत ही हैं । अभाव के भी विशेषण और विशेष्य
होने से । [ यदि विशेषण विशेष्य भाव को स्वरूप से भिन्न अलग अर्थान्तर
माना जाय तो संयोगादि के समान द्रव्यादि छः पदार्थों में ही उसका अन्तर्भाव
कहीं होगा । परन्तु ] द्रव्यादि [ छः पदार्थों से ] में से किसी एक भी पदार्थ
का अभाव में [ रहना ] सम्भव नहीं है । [ क्योंकि अभाव किसी का आश्रय
नहीं हो सकता है ] इसलिए स्व [ अर्थात् घटाभाव ] से उपरत बुद्धि [ घटा-
भावद् भूतलम् ] को उत्पन्न करना जो अभाव का स्वरूप है, वही [ स्वरूप-
भूत ] विशेषणत्व है । [ उस से भिन्न ] अर्थान्तर नहीं ।
इसी प्रकार व्याप्य व्यापक भाव और कार्य कारणत्व आदि भी [ सम्बन्धियों
से भिन्न नहीं अपितु सम्बन्धि स्वरूप ही ] समझने चाहिए । अग्नि आदि का