तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरतःप्रामाण्यमण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १४१
अथैवमप्यप्रामाण्यं परतस्तर्हि प्रामाण्यमपि परत एव गृह्यताम् ।
ज्ञानग्राहकादन्यत इत्यर्थः । ज्ञानं हि मानसप्रत्यक्षेणैव गृह्यते प्रामाण्यं
पुनरनुमानेन । तथाहि जलज्ञानानन्तरं जलार्थिनः प्रवृत्तिर्द्वैधा, फलवती,
अफला चेति । तत्र या फलवती प्रवृत्तिः सा समर्था तया तज्ज्ञानस्य
याथार्थ्यलक्षणं प्रामाण्यमनुमीयते । प्रयोगश्च विवादाध्यासितं जलज्ञानं
प्रमाणं, समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात् । यन्न प्रमाणं तन्न समर्थां प्रवृत्तिं जनयति
यथा प्रमाणाभास इति केवलव्यतिरेकी ।
अत्र च फलवत्प्रवृत्तिजनकं यज्जलज्ञानं तत्पक्षः, तस्य प्रामाण्यं साध्यं
याथार्थ्यमित्यर्थः । न तु प्रमाकरणत्वं, स्मृत्या व्यभिचारापत्तेः । हेतुस्तु
समर्थप्रवृत्तिजनकत्वं फलवत्प्रवृत्तिजनकत्वमिति यावत् ।
अनेन तु केवलव्यतिरेक्यनुमानेनाभ्यासदशापन्नस्य ज्ञानस्य प्रामाण्ये-
ऽवबोधिते तद्दृष्टान्तेन जलप्रवृत्तेः पूर्वमपि तज्जातीयत्वेन लिङ्गेनान्वय-
और यदि ऐसा होने पर भी [ अप्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी किसी
ज्ञातता विशेष से ज्ञान और अप्रामाण्य के एक साथ ही गृहीत होने पर भी ]
अप्रामाण्य परतः ही [ मानना अभीष्ट ] है तो प्रामाण्य का ग्रहण भी परतः
मानना चाहिए । [ परतः ] अर्थात् ज्ञान ग्राहक [ सामग्री ] से भिन्न [ सामग्री ]
से [ न्याय सिद्धान्त ] । ज्ञान का ग्रहण [ अनुव्यवसाय रूप ] मानस प्रत्यक्ष से
होता है । और प्रामाण्य का ग्रहण [ प्रवृत्ति साफल्य मूलक ] अनुमान से ।
[ इसे यों समझिए ] जैसे कि जल ज्ञान के अनन्तर जलार्थी की प्रवृत्ति दो प्रकार
की होती [ हो सकती ] है [ एक ] फलवती और [ दूसरी ] अफला । उसमें जो
फलवती [ सफला ] प्रवृत्ति है वह समर्था [ प्रवृत्ति कहलाती ] है । उससे उस
ज्ञान का याथार्थ्य रूप प्रामाण्य अनुमित होता है । [ उसके अनुमान वाक्य का ]
प्रयोग [ इस प्रकार बनेगा ] । विवाद ग्रस्त [ अर्थात् सन्दिग्ध, प्रस्तुत ] जल ज्ञान
समर्थ [ सफल ] प्रवृत्ति का जनक होने से प्रमाण है। जो [ ज्ञान ] समर्थ
[सफल] प्रवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता है वह प्रमाण नहीं होता है जैसे प्रमाणा-
भास । यह केवल व्यतिरेकी [ अनुमान ] है ।
यहां [ इस व्यतिरेकी अनुमान में ] सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाला जो
जल ज्ञान है वह पक्ष है और उसका प्रामाण्य अर्थात् याथार्थ्य साध्य है । प्रमा-
करणत्व नहीं [ साध्य है ] । स्मृति में व्यभिचारी होने से । [ अर्थात् समर्थ प्रवृत्ति
जनक या सफल प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाली स्मृति का भी याथार्थ्य रूप
प्रामाण्य माना जाता है । प्रमाकरणत्व रूप प्रामाण्य स्मृति का नहीं होता है ।
इसलिये यहां प्रामाण्य का अर्थ याथार्थ्य करना चाहिए प्रमाकरणत्व नहीं ] और