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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 330 में से

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पृष्ठ 193

१२८ तर्कभाषा [ प्रमाणसंख्याभेदः
है। शेष अर्थापत्ति और सम्भव इन दो का अनुमान में और ऐतिह्य का शब्द
में अन्तर्भाव माना है।
इस प्रकार देखने से प्रतीत होता है कि प्रमाणों की संख्या के विषय में
अनेक प्रकार के मत दार्शनिकों में पाए जाते हैं। विभिन्न मतों में एक से लेकर
आठ तक प्रमाण माने गए हैं। इन मतों का वर्गीकरण इस प्रकार किया
जा सकता है।
एक प्रमाण वादी। चार्वाक सम्प्रदाय केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानता है।
द्वि प्रमाणवादी। बौद्ध तथा वैशेषिक प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो प्रमाण मानते हैं।
त्रि प्रमाणवादी। सांख्य और योग प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द इन तीन
प्रमाणों को मानते हैं।
चतुः प्रमाणवादी। नैयायिक, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द इन चार
प्रमाणों को मानते हैं।
पञ्च प्रमाणवादी। प्रभाकर अर्थापत्ति को पञ्चम प्रमाण मानते हैं।
षट् प्रमाणवादी। कुमारिल भट्ट तथा वेदान्ती अर्थापत्ति तथा अभाव को मिला-
कर छः प्रमाण मानते हैं।
अष्ट प्रमाणवादी। पौराणिक सम्प्रदाय में ऐतिह्य तथा सम्भव दो प्रमाण और
बढ़ा कर आठ प्रमाण माने गए हैं।
हमने 'दर्शन मीमांसा' में इसका संग्रह इस प्रकार किया है।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव न्याये चैव चतुष्टयम् ॥
पञ्च प्राभाकरा भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणान्यत्र मन्वते ॥
१ दर्शनमीमांसा ५ ।