तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वतःप्रामाण्यखण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३६
मैवम् । स्वभावादेव विषयविषयितोपपत्तेः । अर्थज्ञानयोरेतादृश एव
स्वभाविको विशेषो येनानयोर्विषयविषयिभावः । इतरथातीतानागतयो-
र्विषयत्वं न स्यात् । ज्ञानेन तत्र ज्ञातताजननासम्भवादसति धर्मिणि
धर्मजननायोगात् ।
किञ्च, ज्ञातताया अपि स्वज्ञानविषयत्वात् तत्रापि ज्ञाततान्तर-
प्रसङ्गस्तथा चाऽनवस्था । अथ ज्ञाततान्तरमन्तरेणापि स्वभावादेव
विषयत्वं ज्ञाततायाः । एवं चेत् तर्हि घटादावपि किं ज्ञाततयेति ।
विषयविषयी भाव के स्वभावतः होने से, यह [पूर्वपक्ष का] कहना ठीक नहीं
है । अर्थ और ज्ञान का [ कुछ ] ऐसा स्वाभाविक विशेष [ सम्बन्ध ] है कि जिससे
इन दोनों का विषयविषयीभाव होता है । अन्यथा [ यदि ज्ञानजनित ज्ञातता का
आधार होने से ही विषयविषयी भाव माना जाय तो ] अतीत और अनागत
[ पदार्थों ] का विषयत्व नहीं हो सकेगा । धर्मी [ अतीतादि पदार्थ ] के अविद्य-
मान होने पर उसमें [ ज्ञातता रूप ] धर्म की उत्पत्ति असम्भव होने से । ज्ञान
से उस [ अतीतादि पदार्थ ] में ज्ञातता का उत्पादन, असम्भव होने से ।
[ ज्ञातता के अभाव में अतीतादि पदार्थों का विषयत्व नहीं होगा । ]
और [ दूसरा दोष यह भी होगा कि ] ज्ञातता भी अपने ज्ञान का विषय
होती है इसलिए उसमें दूसरी ज्ञातता माननी होगी और इस प्रकार अनवस्था दोष
होगा । और यदि [ इन अनवस्था दोष को बचाने के लिए ज्ञातता में ] दूसरी
ज्ञातता के माने बिना ही स्वभाव से ही ज्ञातता का विषयत्व [ मीमांसक को
अभिमत ] हो तो ऐसा होने पर घटादि में भी ज्ञातता [ मानने ] से क्या [ लाभ ।
जैसे बिना दूसरी ज्ञातता के माने ही ज्ञातता अपने ज्ञान का विषय हो सकती है ।
इसी प्रकार घट आदि भी ज्ञातता के बिना स्वभाव से ही ज्ञान के विषय हो सकते
हैं । फिर उनमें ही ज्ञातता मानने की क्या आवश्यकता है । ]
इस प्रकार विषय नियम को स्वाभाविक मान कर ज्ञातता की अनुपयोगिता
प्रतिपादित की । न केवल ज्ञातता अनावश्यक ही है अपितु उसके मानने पर
अतीत अनागत आदि का विषयत्व नहीं बन सकता है और अनवस्था दोष भी
आता है इसलिए ज्ञातता का मानना असङ्गत है । इस प्रकार से नैयायिक ने
ज्ञातता का खण्डन किया । अब आगे यह कहते हैं कि 'दुर्जन तोष' न्याय से
यदि थोड़ी देर के लिए ज्ञातता को मान भी लिया जाय तो भी उससे स्वतः
प्रामाण्य की सिद्धि नहीं हो सकती । क्योंकि ज्ञातता मान लेने पर भी ज्ञान