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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 330 में से

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पृष्ठ 196

मीमांसकमतम् ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १३१
प्राभाकराश्च भाट्टाश्च प्रामाण्यं ब्रुवते स्वतः ।
अप्रामाण्यं पुनस्तेषां पुन्दोषात् परतो मतम् ॥
स्वतोऽभ्यासद्शापक्षे, उभयं शान्तरक्षितैः ।
अनभ्यासद्शायां तैरभयं परतो मतम् ॥
अप्रामाण्यं स्वतो नित्यं प्रामाण्यं परतस्तथा ।
बौद्धं मतान्तरं प्रोक्तं सर्वदर्शनसंग्रहे ॥
स्वतस्त्वन्तु समुत्पत्तौ ज्ञप्तौ परतस्त्वं तथा ।
उभयोरेतयोः सर्वे जैनाश्च सम्प्रचक्षते १ ॥
मीमांसक मत का उपपादन—
मीमांसक मत स्वतः प्रामाण्यवादी है । उनके मत में स्वतः प्रमाण का
लक्षण 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' किया गया है । अर्थात् ज्ञान
ग्राहक सामग्री से अतिरिक्त सामग्री प्रामाण्यग्रह के लिए जहां अपेक्षित न होती
हो उसे स्वतः प्रमाण कहना चाहिए । अर्थात् जहां ज्ञान तथा तद्गत प्रामाण्य
दोनों का ग्रहण एक ही सामग्री से हो जाता है उसे स्वतः प्रमाण कहा जाता
है । इसके विपरीत 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्वं परतस्त्वम्' अर्थात् ज्ञान ग्राहक
और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री अलग अलग होने पर परतः प्रामाण्य होता है ।
यह 'स्वतः प्रामाण्य' और 'परतः प्रामाण्य' के लक्षण हैं । मीमांसक मत में
ज्ञान और प्रामाण्य दोनों की ग्राहक एक ही सामग्री 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता
अर्थापत्ति' है और न्याय मत में ज्ञान ग्राहक सामग्री 'अनुव्यवसाय' है तथा
'प्रामाण्य ग्राहक सामग्री' इससे भिन्न 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान' हैं ।
मीमांसक का अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान से घट में 'ज्ञातता'
नामक एक धर्म उत्पन्न होता है । यह धर्म 'अयं घटः' इस ज्ञान के होने से
पहिले नहीं था इस ज्ञान के बाद उत्पन्न हुआ है इसलिए वह 'अयं घटः' इस
ज्ञान से जन्य है । अर्थात् उसका कारण ज्ञान है ।
इस 'ज्ञातता' धर्म की प्रतीति 'ज्ञातो मया घटः' इस ज्ञान में होती है । यह
'ज्ञातता' धर्म अपने कारण ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता है । इसलिए
'ज्ञातता' की अन्यथानुपपत्ति से प्रसूता अर्थापत्ति ही इस 'ज्ञातता धर्म' की
ग्राहिका है । और जब 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान का ग्रहण
होता है तब उस ज्ञान में रहनेवाले प्रामाण्य का ग्रहण भी उसी अर्थापत्ति से
१ दर्शन मीमांसा ५ ।