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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 330 में से

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पृष्ठ 194

प्रामाण्यवादः ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १२६
प्रामाण्यवादः
प्रामाण्यवाद निरूपण
इस प्रकार प्रमाणों का निरूपण हो चुकने के बाद इन प्रमाणों से उत्पन्न
ज्ञान के प्रामाण्य के निर्णय का प्रश्न सामने उपस्थित होता है। इस विषय में
आस्तिक दर्शनों में भी दो प्रकार के मत पाए जाते हैं। मीमांसक कुमारिलभट्ट
ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः मानते हैं और अप्रामाण्य परतः मानते हैं।
स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् ।
न हि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन शक्यते¹ ॥
इसके विपरीत नैयायिक और वैशेषिक दर्शन प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों को
परतः मानते हैं।
‘किं विज्ञानानां प्रामाण्यमप्रामाण्यं चेति द्वयमपि स्वतः, १ उत उभयमपि
परतः, ३ आहोस्विदप्रामाण्यं स्वतः प्रामाण्यं तु परतः, ४ उतस्वित् प्रामाण्यं
स्वतः अप्रामाण्यं तु परत इति ।
स्थितिमेतदर्थक्रियाज्ञानात् प्रामाण्यनिश्चय इति । तदिदमुक्तं, ‘प्रमाणतोऽ-
र्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत् प्रमाणम्' [ न्याय भाष्य पृ० १ ] इति । तस्मा-
दप्रामाण्यमपि परोक्षमित्यतो द्वयमपि परत इत्येष एव पक्षः श्रेयानिति² ।
इस प्रकार न्याय वैशेषिक के मत में प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों परतः माने
गए हैं। मीमांसक मत में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः माना
है। सांख्य और योग का इस विषय में क्या मत है इसका स्पष्ट उल्लेख उनके
मुख्य ग्रन्थों में नहीं मिलता है फिर भी माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह में
सांख्य को न्याय तथा मीमांसा दोनों से भिन्न प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य दोनों
को स्वतः मानने वाला बताया है ।
प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे स्वतः सांख्याः समाश्रिताः³ ।
'श्लोकवार्तिक' सूत्र २ में 'केचिदाहुर्द्वयं स्वतः' लिखकर इसी सांख्य
मत का निर्देश किया गया जान पड़ता है और बौद्ध आचार्य शान्तरक्षित ने भी
तत्त्वसंग्रह कारिका २८११ में इसी मत का समर्थन किया है। इस प्रकार न्याय
वैशेषिक प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों को परतः मानते हैं। सांख्य योग दोनों
को स्वतः मानते हैं। मीमांसा में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः
माना गया है। अब अप्रामाण्य को स्वतः और प्रामाण्य को परतः माननेवाला
१ श्लोक वार्तिक सू० २, श्लो० ४७ ।
२ न्यायमञ्जरी पृ० १६०-१७४ । कन्दली पृ० २१७-२२० ।
३ सर्वदर्शन संग्रह जैमिनिद० पृ० २७९ ।
६ त० भा०