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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 330 में से

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पृष्ठ 191

१२६ तर्कभाषा [ उपमाने सांख्यमतम् ]
स्मर्यमाणायां गवि गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षम् । न ह्यन्यद् गवि सादृश्यमन्यच्च
गवये । भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते ।
सामान्ययोगश्चैकः । स चेद् गवये प्रत्यक्षो गव्यपि तथेति नोपमानस्य प्रमेया-
न्तरमस्ति यत्र प्रमाणान्तरमुपमानं भवेदिति न प्रमाणान्तरमुपमानम्¹ ।
१ अर्थात् उपमान के तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं। उन तीनों के
अनुसार उपमान का इन तीन प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव हो सकता है। यदि
न्याय दर्शन के 'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्'² इस लक्षण के
अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को उपमान प्रमाण मानें तो
उससे उत्पन्न ज्ञान अर्थात् वाक्यार्थ ज्ञान ही उसका फल होगा। और वाक्य
से वाक्यार्थ का ज्ञान शब्द प्रमाण का विषय है इसलिए इस अवस्था में
उपमान का काम शब्द प्रमाण से निकल आता है । उसके लिए अलग उपमान
प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ।
२ इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन 'संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरुपमानार्थः'
यह लिखा है । इसके अनुसार । संज्ञा संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति को उपमान
प्रमाण का फल माना जाता है । इस पक्ष में वाचस्पति मिश्र उसका अन्तर्भाव
अनुमान में करते हैं । जो शब्द वृद्ध लोग जिस अर्थ में प्रयुक्त करते हैं यदि
लक्षणा आदि अन्य वृत्तियों का आश्रय न लिया जाय तो वह शब्द उस अर्थ
का वाचक होता है । वृद्ध लोग गवयशब्द को गोसदृश में प्रयुक्त करते हैं
इसलिए वह गोसदृश का वाचक होता है । इस प्रकार अनुमान प्रमाण से संज्ञा
संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति हो सकती है । अतः इस के लिए भी उपमान को
अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ।
३ मीमांसकों ने उपमान प्रमाण का प्रतिपादन अन्य प्रकार से किया है ।
उनके अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को सुनने के बाद जो व्यक्ति
जङ्गल में जाकर गो सदृश प्राणी को देखता है उसे पहिले यह ज्ञान होता है
कि इसके समान ही मेरी गौ है । यहां अप्रत्यक्ष गौ में जो इस गवय का
सादृश्य प्रतीत होता है वह उपमान प्रमाण से ही प्रतीत होता है यह मीमां-
सकों का मत है । परन्तु वाचस्पति मिश्र ने इस सादृश्य ज्ञान को प्रत्यक्ष
प्रमाण का विषय माना है । यद्यपि गौ प्रत्यक्ष नहीं है, गवय प्रत्यक्ष है । परन्तु
गौ तथा गवय का सादृश्य तो एक ही है । वह सादृश्य गवय के प्रत्यक्ष होने
से गवय में प्रत्यक्ष है इसलिए उससे अभिन्नगोनिष्ठ सादृश्य भी प्रत्यक्ष है । इस
१. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५ । २. न्यायसूत्रम् १, १, ६, ।