तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरतःप्रामाण्यमण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३५
पहिले प्रमाण से घट, पट या जलादि रूप अर्थ का ज्ञान होता है। उसके बाद
उसके ग्रहण आदि के लिए मनुष्य प्रवृत्त होता है। प्रवृत्ति होने पर यदि वह
प्रवृत्ति सफल हो जाती है अर्थात् वहाँ अर्थ की उपलब्धि हो जाती है तो
मनुष्य अपने उस ज्ञान को यथार्थ समझता है। और यदि प्रवृत्ति विफल हो
जाती है तो मनुष्य अपने ज्ञान को अयथार्थ अथवा भ्रम समझता है। इस
प्रकार प्रवृत्ति के साफल्य या वैफल्य के अनुसार प्रामाण्य या अप्रामाण्य का
निर्णय हाता है। ऐसे स्थलों को जहाँ ज्ञान के बाद प्रवृत्ति हो जाती है और
उसके बाद प्रामाण्य या अप्रामाण्य का निश्चय होता है, 'अभ्यास दशा' कहते
हैं। इस 'अभ्यासदशापन्न ज्ञान' के प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य का निश्चय
'प्रवृत्ति साफल्य या वैफल्य मूलक अनुमान' से होता है यह तो स्पष्ट ही है।
इसके अनुसार अनुमान इस प्रकार बनेगा । 'इदं मे जलज्ञानं प्रमाणं समर्थ-
प्रवृत्तिजनकत्वात्' । यह मेरा जल ज्ञान प्रमाण है सफलप्रवृत्ति का जनक होने
से। इस प्रकार 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' हेतु से 'अभ्यासदशापन्नज्ञान' का
प्रामाण्य 'प्रवृत्ति साफल्य मूलक अनुमान' के द्वारा गृहीत होता है ।
परन्तु कुछ स्थल ऐसे भी होते हैं जहाँ ज्ञान होने के बाद ही, अर्थात् प्रवृत्ति
से पहिले ही, उसके प्रामाण्य का भी ग्रहण हो जाता है। ऐसे ज्ञान को 'अन-
भ्यासदशापन्न ज्ञान' कहेंगे। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है 'अभ्यासदशापन्नज्ञान'
में तो 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु हो सकता है। परन्तु 'अनभ्यासदशा-
पन्नज्ञान' में जहाँ प्रवृत्ति हुई ही नहीं है वहाँ 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' यह हेतु
कैसे बनेगा। इसका उत्तर यह है कि वहाँ 'समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्' के बजाय
'समर्थप्रवृत्तिजनकज्ञानजातीयत्वात्' यह हेतु रखना चाहिए। इस 'अभ्यास-
दशापन्न' शब्द का उल्लेख बौद्ध और जैन दर्शनों ने इस स्वतः प्रामाण्यवाद के
प्रसङ्ग में किया है।
न्याय मत में प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य का ग्रहण तो इस प्रवृत्ति साफल्य
अथवा वैफल्य मूलक अनुमान से होता है परन्तु ज्ञान का ग्रहण 'अनुव्यवसाय'
से होता है। ज्ञान के ज्ञान को 'अनुव्यवसाय' कहते हैं। जैसे 'अयं घट:' यह
ज्ञान घट से उत्पन्न होता है। इस ज्ञान का विषय घट होता है। इस प्रथम
ज्ञान को 'व्यवसायात्मक ज्ञान' कहते हैं। इसके बाद 'घटज्ञानवानहम्' या
'घटमहं जानामि' इस प्रकार का ज्ञान होता है। इस द्वितीय ज्ञान का विषय
घट नहीं अपितु 'घट ज्ञान' होता है। इस ज्ञान विषयक ज्ञान को 'अनुव्यव-
साय' कहते हैं। इसी अनुव्यवसाय से ज्ञान का ग्रहण होता है।
मीमांसक की 'ज्ञातता' की उत्पत्ति भी 'अयं घटः' इस ज्ञान से होती है