तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
न सम्बन्धः । एवं व्याप्यव्यापकभावादयोऽपि। सम्बन्धशब्दप्रयोगस्तूभ-
यनिरूपणीयत्वसाधर्म्येणोपचारात् ।
तथा चासम्बद्धस्याभावस्येन्द्रियेण ग्रहणं न सम्भवति ।
सत्यम् । भावावच्छिन्नत्वाद् व्याप्तेर्भावं प्रकाशयदिन्द्रियं प्राप्तमेव
प्रकाशयति, नत्वभावमपि । अभावं प्रकाशयदिन्द्रियं विशेषणविशेष्यभा-
वमुखेनैवेति सिद्धान्तः ।
गौण रूप से होता है [ यह समझना चाहिए । अर्थात् जैसे संयोग समवाय आदि
सम्बन्ध किन्हीं दो पदार्थों में होते हैं। और उन दोनों का कथन कर के ही उस
सम्बन्ध को प्रदर्शित किया जा सकता है इसी प्रकार विशेषण विशेष्य भाव में
दो पदार्थों के कथन द्वारा ही उसका निरूपण होता है। इसलिए इस उभयनिरू-
पणीयत्व साधर्म्य से विशेषण विशेष्य भाव को भी गौण रूप से सम्बन्ध कहा
जाता है । वास्तव में वह सम्बन्ध नहीं है ]
इसलिए [ फलितार्थ यह हुआ कि ] सम्बन्ध के बिना अभाव का इन्द्रिय से
[ प्रत्यक्ष ] ग्रहण नहीं हो सकता है । [ अतः अभाव के ग्रहण के लिए अलग
प्रमाण मानना चाहिए । यह पूर्वपक्ष हुआ । ]
[ इसका उत्तर यह है कि ] ठीक है। [ किन्तु इन्द्रिय संबद्ध अर्थ को ही
ग्रहण करती है इस ] व्याप्ति के भाव [ पदार्थ ] तक परिमित होने से भाव को
प्रकाशित करनेवाली इन्द्रिय, संबद्ध [ भाव ] को ही प्रकाशित करती है। परन्तु
अभाव [ के विषय में ही यह नियम नहीं ] को तो नहीं। अभाव को प्रकाशित
करनेवाली इन्द्रिय तो विशेषण विशेष्य [ भाव ] द्वारा ही प्रकाशित करती है
यह सिद्धान्त [ पक्ष ] है ।
इस पर प्रश्न हो सकता है कि विशेषण विशेष्य भाव के सम्बन्धत्व का
खण्डन किया जा चुका है। ऐसी दशा में यदि इन्द्रिय से अभाव का ग्रहण
माना जायगा तो असम्बद्ध अभाव का ग्रहण माना जायगा । और उस दशा
में अति प्रसङ्ग दोष होगा । अर्थात् जब बिना सम्बन्ध के इन्द्रिय अभाव को
ग्रहण कर सकती है तब सभी पदार्थों को बिना सम्बन्ध के ग्रहण करती है
यह भी माना जा सकता है। इस शङ्का के होने पर नैयायिक का उत्तर यह है
कि हम तो विशेषण विशेष्य भाव को 'सम्बन्ध' मानते हैं इसलिए हमारे मत
में इन्द्रिय बिना सम्बन्ध के अभाव को ग्रहण नहीं करती इसलिए अतिप्रसङ्ग
का कोई अवसर नहीं है। फिर भी यदि आप उसे असंबद्ध ग्रहण ही कहते हैं
तो यह दोष आपके मत में भी आता है। क्योंकि अभाव प्रमाण के मान लेने