तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतःप्रामाण्यखण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३३
उसके उपपादन का केवल एक ही मार्ग है और वह है ज्ञातता। घट ज्ञान से
उत्पन्न होने वाली 'ज्ञातता' केवल घट में रहती है, पट में नहीं। इसलिए
घटज्ञान का विषय घट ही होता है पट नहीं। इस प्रकार 'ज्ञातता' के आधार
पर ही विषय नियम का उपपादन हो सकता है। अन्यथा नहीं। यह
'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' ही ज्ञातता की सिद्धि में प्रमाण है।
जब 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञातता की सिद्धि हो
जाती है तब वह ज्ञातता अपने कारण रूप ज्ञान को 'ज्ञाततान्यथानुपपत्ति-
प्रसूता अर्थापत्ति' से सिद्ध कर देती है और उसी अर्थापत्ति से, ज्ञान में रहने
वाले प्रामाण्य का भी ग्रहण हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य
ग्राहक सामग्री एक होने से 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' यह स्वतः
प्रामाण्य का लक्षण घटित हो जाने से स्वतः प्रामाण्यवाद ही मानना चाहिए
यह मीमांसक का मत है।
नैयायिक मत से स्वतः प्रामाण्य का खण्डन—
इसके विपरीत नैयायिक का सिद्धान्त पक्ष यह है कि मीमांसक 'विषय-
विषयिभाव' के उपपादन के लिए 'ज्ञातता' को मानना चाहते हैं यह ठीक नहीं
है। घट और ज्ञान का 'विषयविषयिभाव' ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु
स्वाभाविक है। यदि 'विषयविषयिभाव' को ज्ञातता के आधार पर मानेंगे तो
उसमें दो दोष होंगे। एक तो यह कि अतीत और अनागत पदार्थ ज्ञान का
विषय नहीं हो सकेंगे। क्योंकि आपके मत से ज्ञान का विषय वही हो सकता है
जो ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता का आधार हो। वर्तमान ज्ञातता का आधार
वर्तमान पदार्थ ही हो सकता है। अतीत और अनागत पदार्थों का वर्तमान काल
में कोई अस्तित्व नहीं है। तब ज्ञान से उत्पन्न होने वाली ज्ञातता उनमें कैसे
रहेगी। इसलिए यदि ज्ञातता के आधार पर विषय नियम माना जायगा तो
अतीत और अनागत पदार्थ विषय नहीं बन सकेंगे। यह एक दोष है जिसके कारण
विषय नियम को ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु स्वाभाविक मानना चाहिए।
ज्ञातता के आधार पर विषय नियम मानने में दूसरा 'अनवस्था' दोष
बाधक है। अनवस्था दोष का अभिप्राय यह है कि ज्ञातता का भी हमको ज्ञान
होता है अतः ज्ञातता भी उस ज्ञान का विषय होती है। आपके मतानुसार
ज्ञातता ज्ञान का विषय तब ही हो सकती है जब उसके ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता
उसमें रहे। इस प्रकार एक ज्ञातता के विषयत्व के उपपादन के लिए उसमें दूसरी
ज्ञातता माननी होगी। वह दूसरी ज्ञातता भी ज्ञान का विषय होती है इसलिए