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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 330 में से

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पृष्ठ 202

स्वतःप्रामाण्यपक्षः ] प्रामाण्यवादः १३७
प्रामाण्यसन्देहोऽपि स्यात् । अनधिगते धर्मिणिऽसन्देहानुदयात् । तस्मात्
प्रवृत्तेः पूर्वमेव ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्या ज्ञाने गृहीते
ज्ञानगतं प्रामाण्यमप्यर्थापत्त्यैव गृह्यते । ततः पुरुषः प्रवर्तते । न तु
प्रथमं ज्ञानमात्रं गृह्यते ततः प्रवृत्त्युत्तरकाले फलदर्शनेन ज्ञानस्य प्रामा-
ण्यमवधार्यते ।
अत्रोच्यते । ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्या ज्ञानं गृह्यते इति
यदुक्तं तदेव वयं न मृष्यामहे तया प्रामाण्यग्रहस्तु दूरत एव । तथा हि
इदं किल परस्याभिमतम् । घटादिविषये ज्ञाने जाते 'मया ज्ञातोऽयं घटः'
इति घटस्य ज्ञातता प्रतिसन्धीयते । तेन ज्ञाने जाते सति ज्ञातता नाम
कश्चिद्धर्मो जात इत्यनुमीयते । स च ज्ञानात्पूर्वमजातत्वात् , ज्ञाने जाते
च जातत्वाद्न्वयव्यतिरेकाभ्यां ज्ञानेन जन्यत इत्यवधार्यते । एवं च
ज्ञानजन्योऽसौ ज्ञातता नाम धर्मो ज्ञानमन्तरेण नोपपद्यते कारणाभावे
कार्यानुदयात् । तेनार्थापत्त्या स्वकारणं ज्ञानं ज्ञाततयाऽऽक्षिप्यत इति ।
अतिरिक्त [ प्रामाण्य ग्रह के लिये दूसरी सामग्री ] की अपेक्षा न होने से
प्रामाण्य का स्वतस्त्व ही है ।
ज्ञान तो प्रवृत्ति के पूर्व ही गृहीत हो जाता है [ यह निश्चय है ] अन्यथा
[ ज्ञान रूप धर्मी का ग्रहण हुए बिना ] प्रामाण्य अप्रामाण्य का संदेह भी कैसे
हो सकेगा । धर्मी [ रूप ज्ञान ] के ज्ञान के बिना [ उसमें प्रामाण्य या अप्रा-
माण्य रूप धर्म का ] सन्देह नहीं हो सकता है । इसलिए प्रवृत्ति के पहिले
[ अनभ्यास दशा में ] ही ज्ञातता [ रूप कार्य ] की अन्यथा [ ज्ञान रूप कारण
के बिना ] अनुपपत्ति से उत्पन्न अर्थापत्ति से ज्ञान का ग्रहण होने पर उसमें
रहने वाले प्रामाण्य का भी उसी अर्थापत्ति से ग्रहण हो जाता है । उसके बाद
पुरुष प्रवृत्त होता है । न कि पहिले केवल ज्ञान गृहीत होता है और उसके बाद
प्रवृत्ति के उत्तरकाल में फल को देखकर ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय होता है ।
[ यह मीमांसक का पूर्व पक्ष हुआ ] ।
इस [ विषय ] पर [ उत्तर ] कहते हैं । ज्ञातता की अन्यथानुपपत्ति से
प्रसूत अर्थापत्ति से ज्ञान का ग्रहण होता है यह जो कहा है उसको ही हम
[ नैयायिक ] नहीं मान सकते हैं उस [ अर्थापत्ति ] के द्वारा प्रामाण्यग्रह तो
दूर रहा । क्योंकि [ इस विषय में पूर्वपक्षी ] दूसरे [ मीमांसक के पूर्वपक्ष ] का
अभिप्राय यह है कि घटादि विषयक ज्ञान के होने पर मैंने यह घड़ा जान लिया
इस प्रकार घट की ज्ञातता प्रतीत होती है । उससे ज्ञान के होने पर [ घट में ज्ञातता