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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 330 में से

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पृष्ठ 205

१४० तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यखण्डनम्
अस्तु वा ज्ञातता तथापि तन्मात्रेण ज्ञानं गम्यते ज्ञातताविशेषेण
प्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा प्रामाण्यमिति कुत एव ज्ञानग्राहकग्राह्यता
प्रामाण्यस्य । अथ केनचिज्ज्ञातताविशेषेण प्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा
ज्ञानप्रामाण्ये सहैव गृह्येते । एवं चेदप्रामाण्येऽपि शक्यमिदं वक्तुम् ।
केनचिज्ज्ञातताविशेषेण अप्रमाणज्ञानाव्यभिचारिणा ज्ञानाप्रामाण्ये
सहैव गृह्येते इत्यप्रामाण्यमपि स्वत एव गृह्यताम् ।
ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री एक नहीं किन्तु अलग अलग ही माननी
पड़ेगी। क्योंकि ज्ञान का ग्रहण तो प्रत्येक ज्ञातता से होता है फिर चाहे
वह ज्ञातता यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न हुई हो अथवा अयथार्थ ज्ञान से । दोनों
ही प्रकार के ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता अपने कारण 'ज्ञान' का अर्थापत्ति से
बोध करावेगी। परन्तु प्रामाण्य का ग्रहण दोनों प्रकार की ज्ञातता नहीं करा
सकती है। प्रामाण्य का ग्रहण तो केवल वही ज्ञातता करा सकेगी जो यथार्थ
ज्ञान से उत्पन्न हुई हो । इस प्रकार ज्ञान ग्राहक सामग्री 'ज्ञातता मात्र' और
प्रामाण्य ग्राहक सामग्री केवल यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली 'ज्ञातता विशेष'
है। इसलिए, ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री में भेद हो जाने से
ज्ञातता को मान लेने पर भी स्वतः प्रामाण्य सिद्ध नहीं हो सकता है । यही
कहते हैं—
अथवा [ दुर्जन तोष न्याय से ] ज्ञातता मान भी लें तो भी 'ज्ञातता मात्र'
[ अर्थात् यथार्थ ज्ञान और अयथार्थ ज्ञान सभी से उत्पन्न होने वाली सभी प्रकार
की ज्ञातता ] से ज्ञान का ग्रहण होता है और प्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी
[ यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न ] किसी 'ज्ञातता विशेष' से प्रामाण्य गृहीत होता है
इसलिए ज्ञानग्राहक सामग्री से प्रामाण्य की ग्राह्यता कहाँ रही ।
और यदि प्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी [ यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न हुई ]
किसी ज्ञातता विशेष से ज्ञान और प्रामाण्य का ग्रहण साथ ही होता है यह कहो
तो, अप्रमाण ज्ञान की अव्यभिचारिणी किसी ज्ञातता विशेष [ अयथार्थ अथवा
भ्रम ज्ञान से उत्पन्न हुई ज्ञातता ] से ज्ञान और अप्रामाण्य का ग्रहण भी साथ
ही होता है इसलिए अप्रामाण्य भी स्वतः ही मानना चाहिए [ परन्तु मीमांसक
इस को नहीं मानते हैं। वह प्रामाण्य का स्वतः और अप्रामाण्य का परतः ग्रहण
मानते हैं। नैयायिक का कहना यह है कि इस युक्ति से या तो प्रामाण्य और
अप्रामाण्य दोनों को स्वतः मानना चाहिए या फिर दोनों को परतः ही मानना
चाहिये। और दोनों का परतः मानना ही अधिक युक्तिसङ्गत है । ]