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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 330 में से

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पृष्ठ 190

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् १२५
असम्बद्धाभावग्रहेऽतिप्रसङ्गदोषस्तु विशेषणतयैव निरस्तः । समश्च
परमते ।
यत्रोभयोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥
पर भी उस प्रमाण का अभाव के साथ संयोग का समवाय कोई सम्बन्ध
नहीं बन सकेगा । इसलिए यह असंबद्धार्थ ग्राहकत्व दोष आप पर भी आता
है । और आप उसका जो समाधान करें वही समाधान हमारे पक्ष में भी
समझ लेना चाहिए ।
असम्बद्ध अभाव के ग्रहण में [ आने वाला ] अतिप्रसङ्गदोष तो विशे-
षणतया ही खण्डित हो जाता है । और दूसरे [ प्रतिवादी ] के मत में भी
समान है । [ इसलिए ]
जहाँ दोनों [ पक्षों ] में समान दोष हो और परिहार भी समान हो । ऐसे
अर्थ के विचार करते समय किसी एक पक्ष पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए ।
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने अर्थापत्ति तथा अभाव इन दो प्रमाणों का
अन्तर्भाव दिखाया है । इनमें से अर्थापत्ति का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में
अन्तर्भाव दिखाया है । और अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष से ही हो जाता है यह
न्याय सिद्धान्त स्थापित किया है । इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान,
उपमान और शब्द यह चार प्रमाण सिद्ध किए गए हैं । और शेष सबका अन्त-
र्भाव इन्हीं में किया गया है । परन्तु न्याय की अपेक्षा भी कम प्रमाण मानने
वाले सांख्य, योग, वैशेषिक आदि आस्तिक दर्शन भी हैं । सांख्य तथा योग,
में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द यह तीन प्रमाण माने गए हैं । उन्होंने
उपमान को अलग प्रमाण न मान कर इन्हीं तीनों प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव
मान लिया है ।
उपमान के विषय में सांख्यमत—
सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने उपमान प्रमाण के भिन्न भिन्न
तीन लक्षणों के अनुसार क्रमशः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द इन तीनों प्रमाणों
के भीतर उपमान का अन्तर्भाव दिखाते हुए लिखा है—
१ उपमानं तावत्, यथा गौस्तथा गवय इति वाक्यम् । तज्जनिता
धीरागम एव ।
२ योऽप्ययं गवयशब्दो गोसदृशस्य वाचक इति प्रत्ययः सोऽप्यनुमानमेव ।
यो हि शब्दः वृद्धैर्यत्र प्रयुज्यते सोऽसति वृत्त्यन्तरे तस्य वाचकः । यथा गो-
शब्दो गोत्वस्य । प्रयुज्यते चैष गवयशब्दो गोसदृशे इति तस्यैव वाचक इति
तज्ज्ञानमनुमानमेव ।
३ यत्तु गवयस्य चक्षुःसन्निकृष्टस्य गोसादृश्यज्ञानं तत्प्रत्यक्षमेव । अत एव