तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यपक्षः
न चैतद्युक्तम्। ज्ञानविषयतातिरिक्ताया ज्ञातताया अभावात्।
ननु ज्ञानजनितज्ञातताधारत्वमेव हि घटादेर्ज्ञानविषयत्वम् । तथा
हि न तावत् तादात्म्येन विषयता, विषयविषयिणोर्घटज्ञानयोस्तादात्म्या-
नभ्युपगमात्। तदुत्पत्त्या तु विषयत्वे इन्द्रियादेरपि विषयत्वापत्तिः।
इन्द्रियादेरपि तस्य ज्ञानस्योत्पत्तेः। तेनेदमनुमीयते । ज्ञानेन घटे किञ्चि-
ज्जनितं येन घट एव तस्य ज्ञानस्य विषयो नान्यः। इत्यतो विषयत्वान्य-
थानुपपत्तिप्रसूतयाऽर्थापत्त्यैव ज्ञाततासिद्धिः, नतु प्रत्यक्षमात्रेण ।
नामक कोई धर्म उत्पन्न हुआ यह अनुमान होता है। और वह [ धर्म ] ज्ञान से
पहिले न होने और ज्ञान के उत्पन्न होने के बाद उत्पन्न होने से अन्वय व्यतिरेक
से ज्ञान से उत्पन्न होता है ऐसा निश्चय होता है। इस प्रकार ज्ञान से उत्पन्न
यह ज्ञातता नामक धर्म ज्ञान के बिना उपपन्न नहीं होता है कारण के अभाव में
कार्य का उदय न होने से। इसलिए ज्ञातता, अर्थापत्ति द्वारा अपने कारण ज्ञान
का आक्षेप करती है [ यह मीमांसक के पूर्वपक्ष का आशय हुआ । ]
[ इसके उत्तर में नैयायिक का कहना है कि ] ज्ञान विषयता के अतिरिक्त
ज्ञातता [ नामक पदार्थ ] का अभाव होने से यह [ कहना ] ठीक नहीं है।
[ इस पर मीमांसक फिर ज्ञातता की सिद्धि 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्था-
पत्ति' के आधार पर इस प्रकार करता है कि ] ज्ञान से जन्य ज्ञातता का आधार
होना ही घट आदि का ज्ञानविषयत्व है। क्योंकि विषय [ घट ] और विषयी
[ ज्ञान ] का तादात्म्य अभिमत न होने से तादात्म्य से विषयता [ नियन्त्रित ]
नहीं हो सकती। तदुत्पत्ति से [ अर्थात् घटज्ञान घट से उत्पन्न होता है इसलिए ]
विषयत्व मानने पर तो इन्द्रिय आदि [ आदि पद से आलोक ] से भी उस ज्ञान
के उत्पन्न होने से इन्द्रियादि का भी विषयत्व होने लगेगा। [ अर्थात् इन्द्रिय और
आलोक आदि भी घट ज्ञान का विषय कहलाने लगेंगे । ] इसलिए [ तादात्म्य
या तदुत्पत्ति अथवा अन्य किसी भी प्रकार से विषय नियम का उपपादन सम्भव
न होने से ] यह अनुमान होता है कि ज्ञान ने घट में कुछ [ ज्ञातता रूप धर्म ]
उत्पन्न कर दिया है जिसके कारण घट ही उसका विषय होता है अन्य [पटादि]
नहीं। इसलिए विषयत्व की अन्यथा [ अर्थात् ज्ञातता के बिना ] अनुपपत्ति से
उत्पन्न अर्थापत्ति [ प्रमाण ] द्वारा ज्ञातता की सिद्धि होती है। केवल प्रत्यक्ष
मात्र से नहीं। [ यह मीमांसक का ज्ञातता सिद्धि के विषय में पूर्व पक्ष हुआ ।
इसका खण्डन आगे करते हैं । ]