सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

प्रमाणसंख्याभेदः ] अभावनिरूपणम् १२७
प्रकार इस कार्य के लिए भी उपमान प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अत
एव सांख्य में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना गया है।
अभाव के विषय में सांख्यमत—
अभाव प्रमाण का अन्तर्भाव नैयायिकों ने भी प्रत्यक्ष प्रमाण में किया है
और सांख्य में भी उसको प्रत्यक्ष के अन्तर्गत ही माना गया है। परन्तु उसके
उपपादन का मार्ग भिन्न है। सांख्य के मतानुसार भूतल के स्वरूप में प्रतिक्षण
परिवर्तन होता रहता है। उनमें कभी भूतल घटवत् अर्थात् घट युक्त होता है
और कभी घट के हट जाने पर केवल भूतल शेष रह जाता है। जब केवल
भूतल रह जाता है इसी अवस्था को 'घटाभाववद् भूतलम्' कहते हैं। इसलिए
घटाभाव भी भूतल का स्वरूप विशेष ही है। भूतल का ग्रहण इन्द्रिय से होता
है इसलिए उसका कैवल्य रूप भेद भी जिसको 'घटाभाववद् भूतल' कहा जाता
है, प्रत्यक्ष ही है। इसीलिए उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में ही हो सकता है।
वैशेषिक मत—
वैशेषिक दर्शन में केवल 'प्रत्यक्ष तथा अनुमान' ये दो ही प्रमाण माने हैं।
शेष सबका अन्तर्भाव अनुमान में ही किया है। उसमें से शब्द का अन्तर्भाव
अनुमान में किया गया है यह ऊपर दिखाया जा चुका है। शेष प्रमाणों का
अनुमान में अन्तर्भाव करते हुए वैशेषिक में लिखा है—
'प्रसिद्धाभिनस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात्तदप्यनुमानमेव ।
आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयत्वप्रतिपादनादुपमानमप्याप्तवचनमेव ।
दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येव । श्रवणादनुमितानुमानम् ।
सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव ।
अभावोऽप्यनुमानमेव । यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, एवमनुत्पन्नं
कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम्¹ ।
इस प्रकार वैशेषिक दर्शन में उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, सम्भव तथा
अभाव इन प्रमाणों का साक्षात् या परम्परया अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया
है। इसमें विशेषता यह है कि ऐतिह्य की चर्चा नहीं की है और उसके स्थान
पर चेष्टा का अन्तर्भाव दिखाया है।
सांख्य विषयक मतभेद—
सांख्य में तीन प्रमाण माने हैं और शेष सबका अन्तर्भाव उन्हीं में दिखाया
है। इनमें से उपमान तथा अभाव के अन्तर्भाव का प्रकार दिखाया जा चुका
१ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १११ ।