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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 330 में से

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पृष्ठ 201

१३६ तर्कभाषा [ स्वतःप्रामाण्यपक्षः
इदमिदानीं निरूप्यते । जलादिज्ञाने जाते, तस्य प्रामाण्यमवधार्य
कश्चिज्जलादौ प्रवर्तते । कश्चित्तु सन्देहादेव प्रवृत्तः प्रवृत्त्युत्तरकाले
जलादिप्रतिलम्भे सति प्रामाण्यमवधारयतीति वस्तुगतिः ।
अत्र कश्चिदाह । प्रवृत्तेः प्रागेव प्रामाण्यावधारणात् । अस्यार्थः ।
येनैव यज्ज्ञानं गृह्यते तेनैव तद्गतं प्रामाण्यमपि न तु ज्ञानग्राहकादन्यज्
ज्ञानधर्मस्य प्रामाण्यस्य ग्राहकम् । तेन ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वमेव
स्वतस्त्वं प्रामाण्यस्य। ज्ञानं च प्रवृत्तेः पूर्वमेव गृहीतं कथमन्यथा प्रामाण्या-
और नैयायिकों के 'अनुव्यवसाय' की उत्पत्ति भी उसी 'अयं घटः' ज्ञान से
होती है। परन्तु उन दोनों में अन्तर यह है कि मीमांसक की 'ज्ञातता' तो
घट में रहने वाला धर्म है और नैयायिक का 'अनुव्यवसाय' घट में नहीं किन्तु
आत्मा में रहने वाला धर्म है ।
मीमांसक 'अयं घटः' से घट में ज्ञातता धर्म की उत्पत्ति मान कर उसी के
आधार पर विषय नियम का उपपादन करते हैं और उसी के आधार पर
'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान और प्रामाण्य दोनों का ग्रहण
मान कर 'स्वतः प्रामाण्यवाद' की स्थापना करते हैं । परन्तु नैयायिक विषय
नियम को स्वाभाविक मान कर 'ज्ञातता' का खण्डन कर देते हैं और ज्ञान का
ग्रहण 'अनुव्यवसाय' से तथा प्रामाण्य का ग्रहण 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान'
से मान कर परतः प्रामाण्यवाद को सिद्ध करते हैं । यही कहते हैं—
अब यह [ प्रामाण्यवाद ] निरूपण करते हैं कि जलादि का ज्ञान होने पर
कोई [ अनभ्यास दशा में ही ] उसका प्रामाण्य निश्चय करके जलादि [ के हान
उपादान आदि ] में प्रवृत्त होता है । और कोई [ प्रामाण्य का अवधारण किए
बिना ] सन्देह से ही प्रवृत्त होकर जल आदि की प्राप्ति होने पर प्रामाण्य का
निर्णय [ अभ्यास दशापन्न रूप से ] करता है । यह वस्तु स्थिति है ।
यहां [ इस विषय में ] कोई [ मीमांसक ] कहता है । प्रवृत्ति के पूर्व ही
प्रामाण्य का निश्चय हो जाने से [ प्रवृत्ति साफल्य प्रामाण्य का अनुमापक नहीं
है ] । इसका अर्थ यह है कि जिस [ सामग्री ] से जिस ज्ञान का ग्रहण होता है
उसी [ सामग्री ] से उस [ ज्ञान ] में रहने वाले प्रामाण्य का भी ग्रहण होता
है । ज्ञान ग्राहक से भिन्न ज्ञान के धर्म प्रामाण्य का ग्राहक दूसरा नहीं है ।
[ अर्थात् नैयायिक जो ज्ञान का ग्रहण 'अनुव्यवसाय' से और प्रामाण्य का ग्रहण
'प्रवृत्ति साफल्य मूलक अनुमान' से सिद्ध करना चाहते हैं वह ठीक नहीं है ] इस
लिए [ ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री एक होने से ] ज्ञान ग्राहक से