तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री समान हो
जाने से 'स्वतः प्रामाण्य' है । यह मीमांसक मत है ।
परन्तु नैयायिकों के मत में 'ज्ञातता' नाम का कोई पदार्थ ही नहीं है ।
इसलिए 'ज्ञातता' की सिद्धि का एक और भार मीमांसक पर आता है । बिना
ज्ञातता की सिद्धि के 'स्वतः प्रामाण्य' की सिद्धि नहीं हो सकती है । इसलिए
मीमांसक दूसरी 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से 'ज्ञातता' की सिद्धि
करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान का विषय घट होता है
पट नहीं । इस विषय नियम का उपपादन किस आधार पर किया जाय । नैया-
यिक के मत से इसका उपपादन 'तदुत्पत्ति सिद्धान्त' को मान कर और
बौद्धादि मतों में 'तादात्म्य' सिद्धान्त के आधार पर किया जा सकता है ।
परन्तु वे दोनों ही समाधान ठीक नहीं बनेंगे ।
'तदुत्पत्ति' सिद्धान्त का आशय यह होगा कि ज्ञान के प्रति विषय भी
कारण होता है । इसलिए 'अयं घटः' यह ज्ञान घट से पैदा होता है इसलिए
घटज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । यह 'तदुत्पत्ति' पक्ष से नैयायिकों की
ओर से कहा जा सकता है । परन्तु इस में दोष यह आता है कि 'घट-ज्ञान' के
प्रति जैसे विषय रूप घट कारण होता है इसी प्रकार आलोक भी कारण होता
है । घट से उत्पन्न होने के कारण यदि 'घट-ज्ञान' का विषय घट हो सकता है
तो 'घट-ज्ञान' आलोक से भी उत्पन्न होता है इसलिए उसका विषय आलोक
भी होना चाहिए । परन्तु कोई भी 'घट-ज्ञान' का विषय आलोक को मानने के
लिए तैयार नहीं हो सकता है । इसलिए 'तदुत्पत्ति' के आधार पर विषय
नियम का उपपादन नहीं किया जा सकता है ।
दूसरा 'तादात्म्य' या 'तदाकारतापक्ष' बौद्धों का या वेदान्त आदि का हो सकता
है । ज्ञान के आकार से बाह्य अर्थों का अनुमान माननेवाला बौद्ध वैभाषिक मत
है । और उनको सौत्रान्तिक मत में बाह्य अर्थों का अस्तित्व मानकर ज्ञान को तज्जन्य
तदाकार माना जाता है । इन मतों के अनुसार घट और घटज्ञान का 'तादात्म्य'
या 'तदाकारता' होने से घट ज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । इसप्रकार
तादात्म्य या तदाकारता के आधार पर भी विषय नियम का उपपादन करना ठीक
नहीं है क्योंकि ज्ञान और विषय वस्तुतः दोनों भिन्न हैं । घटादि विषयों का बाह्य
अस्तित्व है और उससे भिन्न ज्ञान का केवल आन्तरिक अस्तित्व है इसलिए
घट और ज्ञान का तादात्म्य बन भी नहीं सकता अतएव घट ज्ञान का विषय
घट ही क्यों होता है पट क्यों नहीं । इस विषय नियम का उपपादन न
'तदुत्पत्ति' पक्ष से ठीक होता है और न 'तादात्म्य' पक्ष से ही बन सकता है ।