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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 330 में से

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पृष्ठ 199

१३४ तर्कभाषा [ परतःप्रामाण्यमण्डनम्
उसमें तीसरी ज्ञातता माननी होगी। इस प्रकार एक में दूसरी और दूसरी
में तीसरी ज्ञातता मानने से 'अनवस्था' होगी। यह दूसरा दोष ज्ञातता के
आधार पर विषय नियम मानने में बाधक है। अतएव विषय नियम ज्ञातता
के आधार पर नहीं अपितु स्वाभाविक है यही मानना उचित है।
विषय नियम के उपपादन के लिए मीमांसक ने ज्ञातता की अपरिहार्यता
बतलाई थी। जब उसका खण्डन हो गया तब ज्ञातता की सिद्धि का और कोई
मार्ग नहीं रह जाता है। इसलिए न्याय मत में ज्ञान विषयता के अतिरिक्त
ज्ञातता कोई पदार्थ नहीं है। यह ज्ञातता ही मीमांसक के स्वतः प्रामाण्यवाद
का मूल थी। इसी के आधार पर 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान
और प्रामाण्य का ग्रहण मान कर मीमांसक स्वतः प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं।
जब उस ज्ञातता का ही खण्डन हो गया तब फिर 'छिन्ने मूले नैव पत्रं न
शाखा'। 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान और प्रामाण्य ग्रहण
की चर्चा करना ही व्यर्थ है।
इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि जिस प्रकार यथार्थ ज्ञान से
ज्ञातता उत्पन्न होती है उसी प्रकार अयथार्थ ज्ञान से भी ज्ञातता उत्पन्न होती
है। इसलिए यदि यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली ज्ञातता से, ज्ञान और
प्रामाण्य दोनों का ग्रहण होता है यह माना जाय तो, उसी प्रकार अयथार्थज्ञान
से उत्पन्न होनेवाली ज्ञातता से ज्ञान और अप्रामाण्य का ग्रहण भी एक साथ
होता है यह भी मानना चाहिए। इस का अर्थ यह हुआ कि जिस 'ज्ञातता-
न्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से प्रामाण्य का ग्रहण होता है उसी अर्थापत्ति से
अप्रामाण्य का ग्रहण भी हो सकता है। इसलिए प्रामाण्य के समान अप्रामाण्य
को भी स्वतः मानना चाहिए। अथवा यदि अप्रामाण्य को परतः मानते हैं तो
प्रामाण्य को भी परतः मानना चाहिए। परन्तु मीमांसक इसे स्वीकार नहीं
करते हैं। वे प्रामाण्य को तो स्वतः मानते हैं परन्तु अप्रामाण्य को करण दोष
जन्य अर्थात् परतः मानते हैं। नैयायिक का कहना है कि इन दोनों की एक
सी स्थिति है। या तो दोनों को स्वतः मानो अथवा दोनों को परतः मानो।
और दोनों को परतः मानना ही उचित है। यह न्याय सिद्धान्त है।
परतः प्रामाण्य का उपपादन—
न्याय के परतः प्रामाण्यवाद में ज्ञान और प्रामाण्य दोनों की ग्राहक सामग्री
अलग अलग है। ज्ञान ग्राहक सामग्री तो 'अनुव्यवसाय' है और प्रामाण्य या
अप्रामाण्य की ग्राहक सामग्री, प्रवृत्ति के साफल्य या वैफल्य मूलक अनुमान है।