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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

११४ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
वर्णितानि चत्वारि प्रमाणानि । एतेभ्योऽन्यन्न प्रमाणम्, प्रमाणस्य
सतोऽत्रैवान्तर्भात् ।
दोनों के अलग अलग मत पाए जाते हैं । जिनको क्रमशः 'अभिहितान्वयवाद'
और 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं। कुमारिल भट्ट 'अभिहितान्वयवाद' के
मानने वाले हैं । उनके अनुसार वाक्य को सुनने पर पहिले 'अभिधा' शक्ति
द्वारा पदों से पदार्थों की प्रतीति होती है । और उसके बाद उन पदार्थों का
परस्पर सम्बन्ध 'तात्पर्याशक्ति' द्वारा होता है। पहिले पदार्थ 'अभिहित' अर्थात्
अभिधा शक्ति से बोधित होते हैं और पीछे उनका 'अन्वय' या परस्पर संसर्गबोध
होता है । इसीको 'अभिहितान्वयवाद' कहते हैं । कुमारिल भट्ट इसी सिद्धान्त
को माननेवाले हैं और उनके मत में 'तात्पर्याशक्ति' भी अलग मानी जाती है ।
इसके विपरीत प्रभाकर के मत में अभिधा शक्ति से 'केवल' पदार्थों की
नहीं, अपितु 'अन्वित' पदार्थों की ही उपस्थिति होती है । क्योंकि अभिधाशक्ति
के लिए आवश्यक, सङ्केत का ग्रहण 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु 'अन्वित
पदार्थ में ही होता है।' सङ्केत का ग्राहक मुख्यतः 'व्यवहार' है। और
'व्यवहार' 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु किसी दूसरे के साथ सम्बद्ध या अन्वित
पदार्थ में ही होता है । इसलिए 'सङ्केतग्रह' भी किसी 'अन्वित' पदार्थ में ही
हो सकता है । इसीलिए अभिधा शक्ति से अन्वित अर्थ ही अभिहित हो सकता
है, 'केवल' पदार्थ नहीं । इसी को 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं । इस मत
में पदार्थों का संसर्गबोध करानेवाली 'तात्पर्या' शक्ति की अलग आवश्यकता
नहीं पड़ती है ।
चारों प्रमाणों का वर्णन हो गया । इनसे अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं
है । प्रमाणभूत [ अन्य सब ] का इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाने से [ केवल चार
ही प्रमाण हैं ] ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में लिखा है—
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव तार्किकाश्च चतुष्टयम् ॥
पंच प्राभाकरा, भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणानि ब्रुवन्ति वै ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अर्थापत्तिखण्डनम् ] अर्थापत्तिनिरूपणम् ११५
अर्थापत्तिः
नन्वर्थापत्तिरपि पृथक् प्रमाणमस्ति । अनुपपद्यमानार्थदर्शनात् तदु-
पपादकीभूतार्थान्तरकल्पनम् ‘अर्थापत्तिः’ । तथाहि, पीनो देवदत्तो दिवा
न भुङ्क्ते इति दृष्टे श्रुते वा रात्रिभोजनं कल्प्यते । दिवाऽभुञ्जानस्य
पीनत्वं रात्रिभोजनमन्तरेण नोपपद्यतेऽतः पीनत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता-
र्थापत्तिरेव रात्रिभोजने प्रमाणम् । तच्च प्रत्यक्षादिभ्यो भिन्नं, रात्रिभोज-
नस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वात् ।
नैतत् । रात्रिभोजनस्यानुमानविषयत्वात् । तथाहि, अयं देवदत्तो
अर्थापत्तिः
नैयायिक लोग प्रत्यक्षादि चार ही प्रमाण मानते हैं । शेष प्रमाणों का
अन्तर्भाव इन्हीं चार प्रमाणों में कर लेते हैं । इन शेष प्रमाणों में 'अर्थापत्ति'
और 'अभाव' ये दोनों मुख्य प्रमाण हैं । इसलिए इन दोनों का अन्तर्भाव
दिखलाने का प्रयत्न तर्कभाषाकार ने किया है । शेष 'ऐतिह्य' और 'सम्भव' का
अन्तर्भाव बहुत स्पष्ट है और वे प्रमाण भी मुख्य नहीं हैं इसलिए उनका अन्त-
र्भाव तर्कभाषाकार ने नहीं दिखाया है । आगे 'अर्थापत्ति' का 'केवलव्यतिरेकी'
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हैं । मीमांसक और वेदान्ती आदि जो लोग
अर्थापत्ति को पृथक प्रमाण मानते हैं वे अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद नहीं
मानते हैं । और नैयायिक अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद मानते हैं
इसलिए वह 'अर्थापत्ति' को अलग प्रमाण नहीं मानते हैं । इसीलिए 'अर्था-
पत्ति' का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं ।
[ पूर्वपक्षी प्रश्न ] अच्छा, अर्थापत्ति भी तो पृथक् प्रमाण है । [ उसका
लक्षण ] अनुपद्यमान अर्थ को देखकर उसके उपपादक अर्थ की कल्पना करना
अर्थापत्ति [ कहलाती ] है । जैसे कि देवदत्त दिन में नहीं खाता है परन्तु मोटा
है ऐसा देखने या सुनने पर [ उसके ] रात्रिभोजन की कल्पना कर ली जाती है ।
[ क्योंकि ] दिन में न खाने वाले का मोटा होना रात्रिभोजन के बिना नहीं बन
सकता है । इसलिए अन्यथा [ अर्थात् रात्रि भोजन के बिना ] पीनत्व की अनुप-
पत्ति ही [ उसके ] रात्रि भोजन में प्रमाण होती है । और वह [ अर्थापत्ति ]
प्रमाण रात्रि भोजन के प्रत्यक्षादि का विषय न होने से प्रत्यक्षादि से भिन्न
[ अलग ही प्रमाण ] है ।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है । रात्रि भोजन के अनुमान का विषय [ अनुमान
गम्य ] होने से [ अर्थापत्ति को अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ]

११६ तर्कभाषा [ अर्थपत्तिखण्डनम्
रात्रौ भुङ्क्ते दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात् । यस्तु न रात्रौ भुङ्क्ते
नासौ दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनो, यथा दिवा रात्रौ चाऽभुञ्जानोऽपीनो,
न चायं तथा, तस्मान्न तथेति केवलव्यतिरेक्यनुमानेनैव रात्रिभोजनस्य
प्रतीयमानत्वात् । किमर्थमर्थापत्तिः पृथक्त्वेन कल्पनीया ।
क्योंकि [ अनुमान की प्रक्रिया में ] यह देवदत्त रात्रि में खाता है [ यह प्रतिज्ञा
हुई ] दिन में न खाने पर भी मोटा होने से [ यह हेतु हुआ ] । जो रात्रि में नहीं
खाता है वह दिन में न खाने पर मोटा नहीं होता । जैसे दिन और रात्रि में न
खानेवाला [ नवरात्रोपवासी पुरुष ] दुबला [ होता ] है। [ यह व्यतिरेक व्याप्ति
और उसका उदाहरण हुआ ] यह देवदत्त वैसा [ नवरात्रोपवासी के समान
दुर्बल ] नहीं है [ यह उपनय हुआ ] इसलिए वैसा [ दिन और रात में भोजन न
करने वाला ] नहीं है [ अर्थात् रात्रि में भोजन करता है यह निगमन हुआ ]
इस प्रकार केवल व्यतिरेकी अनुमान से ही रात्रि भोजन के प्रतीत हो जाने से
अर्थापत्ति को अलग प्रमाण क्यों माना जाय ।
हमने अपनी दर्शन मीमांसा में लिखा है—
अनुपपद्यमानार्थादुपपादककल्पना ।
अर्थापत्तिर्द्विधा प्रोक्ता श्रुतदृष्टप्रभेदतः ॥१॥
पीनोऽयं देवदत्तस्तु नैव भुङ्क्ते दिवा च सः ।
इति दृष्टे श्रुते वापि कल्प्यते रात्रिभोजनम् ॥२॥
अतो वेदान्तिनश्चैव तथा मीमांसकावुभौ ।
अर्थापत्तिं पृथक्त्वेन प्रमाणं ब्रुवते परम् ॥३॥
अनियम्यस्य नायुक्तिर्नानियन्तोपपादकः ।
इति कृत्वानुमानेन गृह्यते रात्रिभोजनम् ॥४॥
ततश्च भिद्यते नेयं केवलव्यतिरेकिणः ।
अन्तर्भूताऽनुमानेऽतो न्याये मानान्तरं न सा ॥५॥
विषयव्यवस्थार्थं च मानयोस्तु विरुद्धयोः ।
अर्थापत्तिः पृथङ् मानं मीमांसकमते मता ॥६॥
न मानयोर्विरोधोऽस्ति विरोधे वा न मानता ।
इति तस्याः प्रमाणत्वं नैवमप्युपपद्यते ॥७॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् ११७
अभावः
नन्वभावाख्यमपि पृथक् प्रमाणमस्ति । तच्चाभावग्रहणायाङ्गीकर-
णीयम् । तथाहि घटाद्यनुपलब्ध्या घटाद्यभावो निश्चीयते । अनुपलब्धि-
श्चोपलब्धेरभावः । इत्यभावप्रमाणेण घटाद्यभावो गृह्यते ।
नैतत् । यद्यत्र घटोऽभविष्यत्तर्हि भूतलमिवादृक्ष्यदित्यादितर्कसहका-
रिणाऽनुपलम्भसनाथेन प्रत्यक्षेणैवाभावग्रहणात् ।
नन्विन्द्रियाणि सम्बद्धार्थग्राहकाणि । तथाहीन्द्रियाणि वस्तुप्राप्य-
प्रकाशकारीणि ज्ञानकारणत्वादालोकवत् ।
अभाव निरूपण
[ प्रश्न ] 'अभाव' [ नामक प्रमाण ] भी अलग प्रमाण है। और अभाव के
ग्रहण करने के लिए उस [ अनुपलब्धि अथवा अभाव नामक प्रमाण ] को स्वीकार
करना चाहिए। क्योंकि घटादि की अनुपलब्धि से घटादि के अभाव का ग्रहण
होता है।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है यदि यहाँ घड़ा होता तो भूतल के समान
दिखाई देता। इस प्रकार के तर्क से सहकृत अनुपलब्धि युक्त प्रत्यक्ष प्रमाण से
ही अभाव का ग्रहण होने से [ अभाव के ग्रहण के लिए अलग अनुपलब्धि
अथवा अभाव प्रमाण के मानने की आवश्यकता नहीं है। ]
[ प्रश्न ] इन्द्रियां [ तो ] संबद्ध अर्थ की ग्राहक होती हैं। जैसा कि [ निम्नां-
कित अनुमान से सिद्ध होता है ] इन्द्रियां वस्तु को प्राप्त कर ] वस्तु से संबद्ध
होकर ही अर्थ का ] प्रकाशित करने वाली हैं ज्ञान का करण होने से
प्रकाश के समान ।
वेदान्तियों के मत में घटाभाव, पटाभाव आदि अभावों के साथ इन्द्रिय
का कोई सम्बन्ध सम्भव न होने से प्रत्यक्ष अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता
है। इसलिए वे अभाव के ग्रहण के लिए 'अभाव' या 'अनुपलब्धि' नामक
एक पृथक् प्रमाण मानते हैं। परन्तु नैयायिक अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष प्रमाण
द्वारा ही मानते हैं। अतः अभाव को पृथक् प्रमाण मानने का खण्डन करने
के लिए इस प्रकरण को प्रारम्भ करते हैं।
आलोक ज्ञान का करण है और वस्तुओं के साथ संबद्ध होकर ही उनको
प्रकाशित करता है। इसी प्रकार इन्द्रियां भी ज्ञान का करण होने से आलोक
के समान वस्तु के साथ संबद्ध होकर ही उसको प्रकाशित कर सकती हैं। अथवा
घ्राण, रसना और त्वक् इन तीन इन्द्रियों के विषय में तो सभी इस बात में एक
मत हैं कि ये इन्द्रियाँ वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही अपने अर्थ को प्रकाशित
करती हैं। विवाद केवल चक्षु और श्रोत्र के विषय में है। बौद्ध लोग चक्षु, श्रोत्र

११८ तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
यद्वा चक्षुःश्रोत्रे वस्तुप्राप्यप्रकाशकारिणी बहिरिन्द्रियत्वात् त्वगादि-
वत् । त्वगादीनान्तु प्राप्यप्रकाशकारित्वमुभयवादिसिद्धमेव ।
न चेन्द्रियाभावयोः सम्बन्धोऽस्ति संयोगसमवायौ हि सम्बन्धौ, न
च तौ तयोः स्तः । द्रव्ययोरेव संयोग इति नियमात् । अभावस्य च
द्रव्यत्वाभावात् । अयुतसिद्धयभावान्न समवायोऽपि ।
तथा मन को प्राप्य प्रकाशकारी नहीं मानते हैं । '१अप्राप्तान्यक्षिमनःश्रोत्राणि
त्रयमन्यथा' । २जैन लोग केवल चक्षु को छोड़ कर शेष चार को प्राप्यकारी
मानते हैं । साँख्य, न्याय, ५वैशेषिक तथा मीमांसा६ आदि सभी वैदिक दर्शन
अपनी अपनी प्रक्रिया के अनुसार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्यकारी मानते हैं ।
अन्तरिन्द्रिय मनको केवल सांख्य, योग७, और वेदान्त ही प्राप्यकारी मानते हैं ।
शेष वैदिक दर्शन, बौद्ध तथा जैनदर्शन मनको अप्राप्यकारी ही मानते हैं ।
यहाँ बहिरिन्द्रियों की चर्चा बौद्धों के मत के खण्डन के लिए की है । चक्षु से
जिस घटादि अर्थ का प्रत्यक्ष होता है वह चक्षु से दूर होता है और श्रोत्र से
जिस शब्द का ग्रहण होता है उसकी उत्पत्ति भी दूर होती है । इसलिए सब
इन्द्रियों के बजाय इन्हीं दो इन्द्रियों को पक्ष बना कर दूसरा अनुमान करते हैं।
अथवा चक्षु और श्रोत्र [ ये दोनों इन्द्रियां ] वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही
[ वस्तु ] का प्रकाश करने वाली हैं बहिरिन्द्रिय होने से त्वगादि [ अन्य बहिरि-
न्द्रियों ] के समान । त्वगादि [ अन्य तीन बहिरिन्द्रियों ] का वस्तु प्राप्य
प्रकाशकारित्व तो दोनों वादियों को स्वीकृत ही है [ इन्हीं के समान चक्षु और
श्रोत्र का भी वस्तु के साथ सम्बद्ध होना प्रत्यक्ष में आवश्यक है । ]
[ परन्तु ] इन्द्रिय और अभाव का [ कोई भी ] सम्बन्ध नहीं [ हो सकता ]
है । [ क्योंकि संसार में ] संयोग और समवाय [ दो ही ] सम्बन्ध हैं और उन
दोनों [ अर्थात् इन्द्रिय और अभाव ] के वे दोनों [ संयोग या समवाय सम्बन्ध ]
नहीं हैं । [ क्योंकि ] संयोग दो द्रव्यों का ही होता है यह नियम होने से । और
अभाव के द्रव्य नहीं होने से [ इन्द्रिय के द्रव्य होते हुए भी उसके दूसरे सम्बन्धी
अभाव के द्रव्य न होने से इन्द्रिय-चक्षु-का अभाव के साथ संयोग सम्बन्ध नहीं
हो सकता है । और समवाय सम्बन्ध अयुतसिद्धों का ही होता है । अयुतसिद्ध
भी पांच परिगणित हैं उनमें भी अभाव की गणना नहीं है इसलिए ] अयुतसिद्ध
न होने से समवाय सम्बन्ध भी नहीं है ।
१ अभिधर्म० २,४३ । २ आव० नि० श० । ३ सां० सू० १,८० ।
४ सू० २,१,३३-५२ । ५ कन्दली पृ० ३३ । ६ शा० भा० १,१,१३ ।
७ योग भा० १,७

सम्बन्धलक्षणम् ] अभावनिरूपणम् ११६
संयोग और समवाय ये ही दो सम्बन्ध हैं। इन्द्रिय का अभाव के साथ
उनमें से एक भी सम्बन्ध नहीं बनता। इसलिए इन्द्रिय का अभाव के साथ
कोई सम्बन्ध नहीं है। बिना इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है
इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता है। अतएव अभाव
के ग्रहण के लिए अभाव नामक अलग प्रमाण मानना चाहिये यह पूर्व पक्ष
का आशय है।
जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है नैयायिक के मत में 'अभावसमवायौ
च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः'के अनुसार अभाव के ग्रहण में इन्द्रिय और अभाव
का 'विशेष्यविशेषणभाव' सम्बन्ध होता है। इसलिए पूर्वपक्षी 'विशेष्यविशेषण-
भाव' के सम्बन्धत्व का ही खण्डन करता है। उसका कहना है कि 'विशेष्य-
विशेषणभाव' में सम्बन्ध का लक्षण ही नहीं घटता है इसलिए उसको सम्बन्ध
नहीं कहा जा सकता है। सम्बन्ध के लक्षण में तीन बातें आवश्यक हैं।
'सम्बन्धो हि १ सम्बन्धिभ्यां भिन्नः, २ उभयाश्रितः, ३ एकश्च'। अर्थात् सम्बंध
को १ सम्बन्धियों से भिन्न, २ उभयाश्रित और ३ एक होना चाहिये। जैसे घट
और पट का संयोग होता है। इस संयोग में घट और पट दोनों सम्बन्धी हुए और
'संयोग' उनका 'सम्बन्ध' हुआ। यह संयोग सम्बन्ध अपने सम्बन्धी घट और
पट दोनोंसे भिन्न है। घट और पट दोनों 'द्रव्य' हैं परंतु संयोग 'गुण' है। इसलिए
'संयोग' रूप 'गुण' अपने 'द्रव्य' रूप 'सम्बन्धियों'से भिन्न है। वह संयोग घट और
पट दोनोंमें रहता है इसलिए उभयाश्रित हुआ। और उभयाश्रित होनेसे ही एक
भी है। घट का पट के साथ जो संयोग है पटका घट के साथ भी वही संयोग
है। यहां दो संयोग नहीं हैं। इस प्रकार संयोग 'सम्बन्ध'में सम्बन्ध के लक्षण
के तीनों अंश घट जाते हैं। इसलिए संयोग को 'सम्बन्ध' कहना उचित है।
इसी प्रकार तन्तु और पट का 'समवाय' सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भी
'सम्बन्ध'का लक्षण घट जाता है। क्योंकि यहाँ तन्तु और पट दोनों 'सम्बन्धी'
हैं। और दोनों 'द्रव्य' रूप हैं। परन्तु इनका सम्बन्ध 'समवाय' कोई द्रव्य
नहीं है। उसे द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, और अभाव से भिन्न अलग
पदार्थ माना गया है। इसलिए 'समवाय' भी सम्बन्धियों से भिन्न है। और
उभयाश्रित तथा एक भी है। इसलिए समवाय में भी 'सम्बन्ध' का लक्षण घट
जाता है। अतः उसको भी 'सम्बन्ध' कहा जा सकता है।
परन्तु 'विशेष्यविशेषणभाव' में इस सम्बन्ध लक्षण के तीन अंशों में से
एक भी नहीं घटता है। सबसे पहिली बात है, 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः'। सो

१२० तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
‘विशेष्य विशेषण भाव’ ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ नहीं अपितु सम्बन्धिस্বরূপ है।
‘दण्डी-पुरुषः’ इस प्रतीति में दण्ड ‘विशेषण’ है और पुरुष ‘विशेष्य’ है। इन
दोनों में रहनेवाली ‘विशेषणता’ या ‘विशेष्यता’ उन दोनों के स्वरूप से अलग
कोई पदार्थ नहीं है अपितु उन दोनों का स्वरूप ही है। दण्ड में जो विशे-
षणता है वह दण्ड से अलग नहीं है बल्कि दण्ड का स्वरूपभूत है। और
पुरुष में जो ‘विशेष्यता’ है वह भी पुरुष के स्वरूप से अलग नहीं अपितु पुरुष
का स्वरूपभूत ही है। अर्थात् ‘विशेष्यता’ और विशेषणता’ को सम्बन्धियों से
अलग नहीं अपितु ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही मानना होगा। इसलिए ‘विशेष्य-
विशेषणभाव’ को ‘सम्बन्ध’ नहीं कहा जा सकता।
यदि यह पूछा जाय कि ‘विशेष्यविशेषणभाव’को ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही क्यों
माना जाय सम्बन्धियों से अलग ही क्यों न मान लिया जाय। तो इसका
उत्तर यह होगा कि ‘घटाभाववद् भूतलम्’ इस प्रतीति में घटाभाव विशेषण होता
है और भूतल विशेष्य है। इसके विपरीत ‘भूतलनिष्ठः घटाभावः’ इस प्रतीतिमें
घटाभाव विशेष्य है और भूतल विशेषण है। इससे यह सिद्ध होता है कि
अभाव भी ‘विशेष्य’ तथा ‘विशेषण’ होता है। यदि ‘विशेष्यविशेषण भाव’ को
‘सम्बन्धिस্বরূপ’ न मानकर ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ माना जाय तो घटाभाव में
रहनेवाली ‘विशेष्यता’ और ‘विशेषणता’ भी घटाभाव से भिन्न कोई अन्य पदार्थ
होगी। संसार के समस्त भाव पदार्थों का वर्गीकरण द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य,
विशेष, और समवाय इन छः पदार्थों में ही किया गया है। इसलिए यह
‘विशेष्य विशेषणभाव’ यदि अलग कोई पदार्थ होगा भी तो इन्हीं छः पदार्थों
में कहीं उसका अन्तर्भाव होगा। जैसे संयोग और समवाय को सम्बन्धियों से
अलग मानने पर भी इन्हीं छः पदार्थों में उनका अन्तर्भाव होता है। संयोग
गुण में गिना जाता है और समवाय छठा पदार्थ माना जाता है। इसी प्रकार
‘विशेष्य-विशेषणभाव’ भी यदि सम्बन्धियों से भिन्न है तो, या तो द्रव्य होगा,
या गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, या समवाय में से कोई होगा। इनसे भिन्न
कोई और पदार्थ नहीं हो सकता है।
यदि ‘विशेष्यविशेषणभाव’ को द्रव्यादि में से कोई पदार्थ मान लिया जाय
तो यह आपत्ति उपस्थित होती है कि द्रव्यादि छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ
‘अभाव’ में नहीं रहता है। द्रव्यादि छहों पदार्थ किसी भाव पदार्थ में ही रह
सकते हैं। अभाव में उनमें से कोई भी पदार्थ नहीं रह सकता है। इसलिए यदि
‘विशेष्यविशेषणभाव’ को ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ मानेंगे तो उसे इन छहों पदार्थों
में से ही कोई पदार्थ मानना होगा। और इन छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ

सम्बन्धलक्षणम् ] अभावानिरूपणम् १२१
अभाव में नहीं रहता। इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' भी अभाव में नहीं रह
सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अभाव 'विशेष्य' या विशेषण नहीं हो
सकेगा। परन्तु अभाव विशेष्य भी होता है और विशेषण भी यह बात सर्वा-
नुभव सिद्ध है। परन्तु वह कब सिद्ध हो सकती है ? जब कि 'विशेष्यविशेषण-
भाव' को 'सम्बन्धस्वरूप' माना जाय । जब 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्ब-
न्धस्वरूप' मानते हैं तब तो अभाव विशेष्य और विशेषण हो सकता है।
और यदि 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' मानें तो अभाव न
विशेष्य हो सकता है और न विशेषण । इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को
'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' नहीं अपि तु 'सम्बन्धस्वरूप' ही मानना होगा। और
उस दशा में सम्बन्ध के लक्षण का प्रथम अंश 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' के 'विशे-
ष्यविशेषणभाव' में न घटने से उसको सम्बन्ध नहीं कहा जा सकता है।
इसी प्रकार सम्बन्ध लक्षण के अवशिष्ट दो अंश भी 'विशेष्यविशेषणभाव'
में नहीं घटते हैं। दूसरा अंश है 'उभयाश्रितः' । परन्तु 'विशेष्यभाव' अथवा
'विशेषणभाव' में से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। विशेष्यभाव केवल विशेष्य
में रहता है। और विशेषणभाव केवल विशेषण में रहता है। इसलिए उनमें
से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। और जब वह अलग अलग रहते हैं तब
उनको 'एक' भी नहीं कहा जा सकता है। विशेष्यभाव अलग है जो केवल
विशेष्य में रहता है और विशेषण भाव अलग है जो कि केवल विशेषण में
रहता है।
इस प्रकार सम्बन्ध के लक्षण के तीन अंशों में से एक भी अंश विशेष्य-
विशेषणभाव में नहीं घटता है इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को सम्बन्ध नहीं
कहा जा सकता है। इसी प्रक्रिया से कार्यकारण भाव आदि अन्य समस्त
सम्बन्धों का भी खण्डन किया जा सकता है। इसलिए 'संयोग' और 'समवाय'
को छोड़ कर अन्य कोई 'सम्बन्ध' सिद्ध नहीं हो सकता है। और चक्षु आदि
इन्द्रिय का अभाव के साथ संयोग या समवाय सम्बन्ध नहीं बनता है। क्योंकि
संयोग दो 'द्रव्यों' का ही होता है और अभाव 'द्रव्य' नहीं है। तथा 'समवाय'
सम्बन्ध 'अयुतसिद्धों' का ही होता है परन्तु अभाव 'अयुतसिद्धों' में नहीं गिना
गया है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का न 'संयोग' सम्बन्ध होता है और न
'समवाय' । इन दो के अतिरिक्त 'विशेष्यविशेषणभाव' आदि और कोई 'सम्बन्ध'
ही नहीं है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का कोई 'सम्बन्ध' न होने से प्रत्यक्ष
प्रमाण से इन्द्रिय द्वारा अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता । यह पूर्व पक्ष है।

१२२ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
विशेषणविशेष्यभावश्च सम्बन्ध एव न सम्भवति भिन्नोभयाश्रितै-
कत्वाभावात् । सम्बन्धो हि सम्बन्धिभ्यां भिन्नो भवत्युभयसम्बन्ध्याश्रित-
श्चैकश्च । यथा भेरीदण्डयोः संयोगः । स हि भेरीदण्डाभ्यां भिन्नस्तदु-
भयाश्रितश्चैकश्च । न च विशेषणविशेष्यभावस्तथा । तथाहिं दण्डपुरुष-
योर्विशेषणविशेष्यभावो न ताभ्यां भिद्यते । न हि दण्डस्य विशेषणत्व-
मर्थान्तरं, नापि पुरुषस्य विशेष्यत्वमर्थान्तरमपि तु स्वरूपमेव । अभाव-
स्यापि विशेषणत्वाद् विशेष्यत्वाच्च । न चाभावे कस्यचित् पदार्थस्य
द्रव्याद्यन्यतमस्य सम्भवः । तस्मादभावस्य स्वोपरक्तबुद्धिजनकत्वं
यत्स्वरूपं तदेव विशेषणत्वं, न तु पदार्थान्तरम् ।
एवं व्याप्यव्यापकत्वकारणत्वादयोऽप्यूह्याः । स्वप्रतिबद्धबुद्धिजन-
इसी का उपपादन ग्रन्थकार इस प्रकार करते हैं—
और विशेषण विशेष्य भाव [ सम्बन्धियों से ] भिन्न, उभयाश्रित और एक
न होने से सम्बन्ध ही नहीं हो सकता है । क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धियों से भिन्न
उभयाश्रित और एक होता है । जैसे भेरी और दण्ड का संयोग [सम्बन्ध है, तो]
वह भेरी और दण्ड [ दोनों सम्बन्धियों ] से भिन्न [ भेरी और दण्ड दोनों द्रव्य
हैं और संयोग गुण है इसलिए वह दोनों सम्बन्धियों से भिन्न है ] उभयाश्रित और
एक है । परन्तु विशेषण विशेष्यभाव वैसा [ अर्थात् सम्बन्धिभ्यां भिन्नः उभयाश्रितः
और एकश्च ] नहीं है । क्योंकि [ दण्डी पुरुषः इस विशिष्ट प्रतीति में क्रमशः ]
दण्ड और पुरुष का विशेषण विशेष्य भाव उन [ दण्ड और पुरुष के स्वरूप ]
से भिन्न नहीं है [ किन्तु उनका स्वरूप ही है ] । दण्ड का विशेषणत्व [ उसके
स्वरूप से भिन्न ] कोई दूसरा पदार्थ नहीं है और न तो पुरुष का विशेष्यत्व
[ उसके स्वरूप से भिन्न ] ही कोई अर्थान्तर है । किन्तु [ विशेषण और विशेष्य
भाव उन दोनों का ] स्वरूपभूत ही हैं । अभाव के भी विशेषण और विशेष्य
होने से । [ यदि विशेषण विशेष्य भाव को स्वरूप से भिन्न अलग अर्थान्तर
माना जाय तो संयोगादि के समान द्रव्यादि छः पदार्थों में ही उसका अन्तर्भाव
कहीं होगा । परन्तु ] द्रव्यादि [ छः पदार्थों से ] में से किसी एक भी पदार्थ
का अभाव में [ रहना ] सम्भव नहीं है । [ क्योंकि अभाव किसी का आश्रय
नहीं हो सकता है ] इसलिए स्व [ अर्थात् घटाभाव ] से उपरत बुद्धि [ घटा-
भावद् भूतलम् ] को उत्पन्न करना जो अभाव का स्वरूप है, वही [ स्वरूप-
भूत ] विशेषणत्व है । [ उस से भिन्न ] अर्थान्तर नहीं ।
इसी प्रकार व्याप्य व्यापक भाव और कार्य कारणत्व आदि भी [ सम्बन्धियों
से भिन्न नहीं अपितु सम्बन्धि स्वरूप ही ] समझने चाहिए । अग्नि आदि का

सम्बन्धत्वखण्डनम् ] अभावानिरूपणम् १२३
कत्वं स्वरूपमेव हि व्यापकत्वमग्न्यादीनाम् । कारणत्वमपि कार्यानुकृता-
न्वयव्यतिरेकि स्वरूपमेव हि तन्त्वादीनां, नत्वर्थान्तरमभावस्यापि
व्यापकत्वात्कारणत्वाच्च । नह्यभावे सामान्यादिसम्भवः ।
तदेवं विशेषणविशेष्यभावो न विशेषणविशेष्यस्वरूपाभ्यां भिन्नः ।
नाप्युभयाश्रितो, विशेषणे विशेषणभावमात्रस्य सत्त्वाद् विशेष्यभावस्या-
भावाद्, विशेष्ये च विशेष्यभावमात्रस्य सद्भावाद्, विशेषणभावस्याभा-
वात् । नाप्येको, विशेषणं च विशेष्यं च तयोर्भाव इति द्वन्द्वात् परं श्रूय-
माणो भावशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा च विशेषणभावो विशेष्य-
भावश्चेत्युपपन्नम् । द्वावेतावेकश्च सम्बन्धः तस्माद् विशेषणविशेष्यभावो
स्वप्रतिबद्ध [ अपने से संबद्ध ] बुद्धि को उत्पन्न करना ही उनका व्यापकत्व है ।
[ इसी प्रकार ] कारणत्व भी तन्त्वादि का कार्यानुकृत अन्वय व्यतिरेकिस्वरूप ही
है, अर्थान्तर नहीं । अभाव के भी व्यापक तथा कारण होने से । [ यदि व्याप्य
व्यापक भाव अथवा कार्य कारण भाव को सम्बन्धियों से भिन्न मानेंगे तो जैसा
विशेष्य विशेषण भाव के विषय में दिखाया है व्याप्य व्यापक भाव तथा कारण
कार्य भाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से ही कोई पदार्थ मानना होगा । परन्तु ]
अभाव में सामान्यादि [ छहों पदार्थों में से किसी ] का सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार विशेषण विशेष्य भाव विशेषण और विशेष्य के स्वरूपों से भिन्न
नहीं है । और न उभयाश्रित ही है, विशेषण में विशेषण भाव मात्र के होने
और विशेष भाव के न होने से, और विशेष्य में विशेष्य भाव मात्र के होने से
विशेषण भाव के न होने से । [ उन दोनों में से कोई भी उभयाश्रित नहीं है ]
और न एक ही है । [ क्योंकि ] विशेषण और विशेष्य और उन दोनों का
भाव इस रूप में [ विशेषण विशेष्य भाव पद में 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं
प्रत्येकमभिसम्बध्यते,' इस नियम के अनुसार ] द्वन्द्व से परे श्रूयमाण भाव पद
[ विशेषण और विशेष्य दोनों पदों में से ] प्रत्येक के साथ सम्बद्ध होता है । इस
प्रकार विशेषणभाव और विशेष्यभाव यह [ अर्थ ] उपपन्न होता है । [ इससे
स्पष्ट है कि ] ये दो हैं और सम्बन्ध एक होता है [ इसलिए विशेषण-विशेष्य
भाव सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं ] इसी प्रकार व्याप्य-व्यापक-भावादि भी
[ सम्बन्ध नहीं हैं । इस प्रकार प्रबलतर युक्तियों से यह सिद्ध होता है कि
विशेषण विशेष्य भाव, व्याप्य व्यापक भाव, कार्य कारण भाव आदि कोई भी
सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं क्योंकि उनमें सम्बन्ध का लक्षण नहीं घटता है ।
इस प्रकार उनका सम्बन्धत्व सिद्ध न होने पर भी उनके लिए ] सम्बन्ध शब्द
का प्रयोग तो दो के द्वारा निरूपणीय होने से [ सम्बन्ध के साथ ] साधर्म्य वश

१२४ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
न सम्बन्धः । एवं व्याप्यव्यापकभावादयोऽपि। सम्बन्धशब्दप्रयोगस्तूभ-
यनिरूपणीयत्वसाधर्म्येणोपचारात् ।
तथा चासम्बद्धस्याभावस्येन्द्रियेण ग्रहणं न सम्भवति ।
सत्यम् । भावावच्छिन्नत्वाद् व्याप्तेर्भावं प्रकाशयदिन्द्रियं प्राप्तमेव
प्रकाशयति, नत्वभावमपि । अभावं प्रकाशयदिन्द्रियं विशेषणविशेष्यभा-
वमुखेनैवेति सिद्धान्तः ।
गौण रूप से होता है [ यह समझना चाहिए । अर्थात् जैसे संयोग समवाय आदि
सम्बन्ध किन्हीं दो पदार्थों में होते हैं। और उन दोनों का कथन कर के ही उस
सम्बन्ध को प्रदर्शित किया जा सकता है इसी प्रकार विशेषण विशेष्य भाव में
दो पदार्थों के कथन द्वारा ही उसका निरूपण होता है। इसलिए इस उभयनिरू-
पणीयत्व साधर्म्य से विशेषण विशेष्य भाव को भी गौण रूप से सम्बन्ध कहा
जाता है । वास्तव में वह सम्बन्ध नहीं है ]
इसलिए [ फलितार्थ यह हुआ कि ] सम्बन्ध के बिना अभाव का इन्द्रिय से
[ प्रत्यक्ष ] ग्रहण नहीं हो सकता है । [ अतः अभाव के ग्रहण के लिए अलग
प्रमाण मानना चाहिए । यह पूर्वपक्ष हुआ । ]
[ इसका उत्तर यह है कि ] ठीक है। [ किन्तु इन्द्रिय संबद्ध अर्थ को ही
ग्रहण करती है इस ] व्याप्ति के भाव [ पदार्थ ] तक परिमित होने से भाव को
प्रकाशित करनेवाली इन्द्रिय, संबद्ध [ भाव ] को ही प्रकाशित करती है। परन्तु
अभाव [ के विषय में ही यह नियम नहीं ] को तो नहीं। अभाव को प्रकाशित
करनेवाली इन्द्रिय तो विशेषण विशेष्य [ भाव ] द्वारा ही प्रकाशित करती है
यह सिद्धान्त [ पक्ष ] है ।
इस पर प्रश्न हो सकता है कि विशेषण विशेष्य भाव के सम्बन्धत्व का
खण्डन किया जा चुका है। ऐसी दशा में यदि इन्द्रिय से अभाव का ग्रहण
माना जायगा तो असम्बद्ध अभाव का ग्रहण माना जायगा । और उस दशा
में अति प्रसङ्ग दोष होगा । अर्थात् जब बिना सम्बन्ध के इन्द्रिय अभाव को
ग्रहण कर सकती है तब सभी पदार्थों को बिना सम्बन्ध के ग्रहण करती है
यह भी माना जा सकता है। इस शङ्का के होने पर नैयायिक का उत्तर यह है
कि हम तो विशेषण विशेष्य भाव को 'सम्बन्ध' मानते हैं इसलिए हमारे मत
में इन्द्रिय बिना सम्बन्ध के अभाव को ग्रहण नहीं करती इसलिए अतिप्रसङ्ग
का कोई अवसर नहीं है। फिर भी यदि आप उसे असंबद्ध ग्रहण ही कहते हैं
तो यह दोष आपके मत में भी आता है। क्योंकि अभाव प्रमाण के मान लेने

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् १२५
असम्बद्धाभावग्रहेऽतिप्रसङ्गदोषस्तु विशेषणतयैव निरस्तः । समश्च
परमते ।
यत्रोभयोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥
पर भी उस प्रमाण का अभाव के साथ संयोग का समवाय कोई सम्बन्ध
नहीं बन सकेगा । इसलिए यह असंबद्धार्थ ग्राहकत्व दोष आप पर भी आता
है । और आप उसका जो समाधान करें वही समाधान हमारे पक्ष में भी
समझ लेना चाहिए ।
असम्बद्ध अभाव के ग्रहण में [ आने वाला ] अतिप्रसङ्गदोष तो विशे-
षणतया ही खण्डित हो जाता है । और दूसरे [ प्रतिवादी ] के मत में भी
समान है । [ इसलिए ]
जहाँ दोनों [ पक्षों ] में समान दोष हो और परिहार भी समान हो । ऐसे
अर्थ के विचार करते समय किसी एक पक्ष पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए ।
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने अर्थापत्ति तथा अभाव इन दो प्रमाणों का
अन्तर्भाव दिखाया है । इनमें से अर्थापत्ति का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में
अन्तर्भाव दिखाया है । और अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष से ही हो जाता है यह
न्याय सिद्धान्त स्थापित किया है । इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान,
उपमान और शब्द यह चार प्रमाण सिद्ध किए गए हैं । और शेष सबका अन्त-
र्भाव इन्हीं में किया गया है । परन्तु न्याय की अपेक्षा भी कम प्रमाण मानने
वाले सांख्य, योग, वैशेषिक आदि आस्तिक दर्शन भी हैं । सांख्य तथा योग,
में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द यह तीन प्रमाण माने गए हैं । उन्होंने
उपमान को अलग प्रमाण न मान कर इन्हीं तीनों प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव
मान लिया है ।
उपमान के विषय में सांख्यमत—
सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने उपमान प्रमाण के भिन्न भिन्न
तीन लक्षणों के अनुसार क्रमशः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द इन तीनों प्रमाणों
के भीतर उपमान का अन्तर्भाव दिखाते हुए लिखा है—
१ उपमानं तावत्, यथा गौस्तथा गवय इति वाक्यम् । तज्जनिता
धीरागम एव ।
२ योऽप्ययं गवयशब्दो गोसदृशस्य वाचक इति प्रत्ययः सोऽप्यनुमानमेव ।
यो हि शब्दः वृद्धैर्यत्र प्रयुज्यते सोऽसति वृत्त्यन्तरे तस्य वाचकः । यथा गो-
शब्दो गोत्वस्य । प्रयुज्यते चैष गवयशब्दो गोसदृशे इति तस्यैव वाचक इति
तज्ज्ञानमनुमानमेव ।
३ यत्तु गवयस्य चक्षुःसन्निकृष्टस्य गोसादृश्यज्ञानं तत्प्रत्यक्षमेव । अत एव

१२६ तर्कभाषा [ उपमाने सांख्यमतम् ]
स्मर्यमाणायां गवि गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षम् । न ह्यन्यद् गवि सादृश्यमन्यच्च
गवये । भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते ।
सामान्ययोगश्चैकः । स चेद् गवये प्रत्यक्षो गव्यपि तथेति नोपमानस्य प्रमेया-
न्तरमस्ति यत्र प्रमाणान्तरमुपमानं भवेदिति न प्रमाणान्तरमुपमानम्¹ ।
१ अर्थात् उपमान के तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं। उन तीनों के
अनुसार उपमान का इन तीन प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव हो सकता है। यदि
न्याय दर्शन के 'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्'² इस लक्षण के
अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को उपमान प्रमाण मानें तो
उससे उत्पन्न ज्ञान अर्थात् वाक्यार्थ ज्ञान ही उसका फल होगा। और वाक्य
से वाक्यार्थ का ज्ञान शब्द प्रमाण का विषय है इसलिए इस अवस्था में
उपमान का काम शब्द प्रमाण से निकल आता है । उसके लिए अलग उपमान
प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ।
२ इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन 'संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरुपमानार्थः'
यह लिखा है । इसके अनुसार । संज्ञा संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति को उपमान
प्रमाण का फल माना जाता है । इस पक्ष में वाचस्पति मिश्र उसका अन्तर्भाव
अनुमान में करते हैं । जो शब्द वृद्ध लोग जिस अर्थ में प्रयुक्त करते हैं यदि
लक्षणा आदि अन्य वृत्तियों का आश्रय न लिया जाय तो वह शब्द उस अर्थ
का वाचक होता है । वृद्ध लोग गवयशब्द को गोसदृश में प्रयुक्त करते हैं
इसलिए वह गोसदृश का वाचक होता है । इस प्रकार अनुमान प्रमाण से संज्ञा
संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति हो सकती है । अतः इस के लिए भी उपमान को
अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ।
३ मीमांसकों ने उपमान प्रमाण का प्रतिपादन अन्य प्रकार से किया है ।
उनके अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को सुनने के बाद जो व्यक्ति
जङ्गल में जाकर गो सदृश प्राणी को देखता है उसे पहिले यह ज्ञान होता है
कि इसके समान ही मेरी गौ है । यहां अप्रत्यक्ष गौ में जो इस गवय का
सादृश्य प्रतीत होता है वह उपमान प्रमाण से ही प्रतीत होता है यह मीमां-
सकों का मत है । परन्तु वाचस्पति मिश्र ने इस सादृश्य ज्ञान को प्रत्यक्ष
प्रमाण का विषय माना है । यद्यपि गौ प्रत्यक्ष नहीं है, गवय प्रत्यक्ष है । परन्तु
गौ तथा गवय का सादृश्य तो एक ही है । वह सादृश्य गवय के प्रत्यक्ष होने
से गवय में प्रत्यक्ष है इसलिए उससे अभिन्नगोनिष्ठ सादृश्य भी प्रत्यक्ष है । इस
१. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५ । २. न्यायसूत्रम् १, १, ६, ।

प्रमाणसंख्याभेदः ] अभावनिरूपणम् १२७
प्रकार इस कार्य के लिए भी उपमान प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अत
एव सांख्य में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना गया है।
अभाव के विषय में सांख्यमत—
अभाव प्रमाण का अन्तर्भाव नैयायिकों ने भी प्रत्यक्ष प्रमाण में किया है
और सांख्य में भी उसको प्रत्यक्ष के अन्तर्गत ही माना गया है। परन्तु उसके
उपपादन का मार्ग भिन्न है। सांख्य के मतानुसार भूतल के स्वरूप में प्रतिक्षण
परिवर्तन होता रहता है। उनमें कभी भूतल घटवत् अर्थात् घट युक्त होता है
और कभी घट के हट जाने पर केवल भूतल शेष रह जाता है। जब केवल
भूतल रह जाता है इसी अवस्था को 'घटाभाववद् भूतलम्' कहते हैं। इसलिए
घटाभाव भी भूतल का स्वरूप विशेष ही है। भूतल का ग्रहण इन्द्रिय से होता
है इसलिए उसका कैवल्य रूप भेद भी जिसको 'घटाभाववद् भूतल' कहा जाता
है, प्रत्यक्ष ही है। इसीलिए उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में ही हो सकता है।
वैशेषिक मत—
वैशेषिक दर्शन में केवल 'प्रत्यक्ष तथा अनुमान' ये दो ही प्रमाण माने हैं।
शेष सबका अन्तर्भाव अनुमान में ही किया है। उसमें से शब्द का अन्तर्भाव
अनुमान में किया गया है यह ऊपर दिखाया जा चुका है। शेष प्रमाणों का
अनुमान में अन्तर्भाव करते हुए वैशेषिक में लिखा है—
'प्रसिद्धाभिनस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात्तदप्यनुमानमेव ।
आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयत्वप्रतिपादनादुपमानमप्याप्तवचनमेव ।
दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येव । श्रवणादनुमितानुमानम् ।
सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव ।
अभावोऽप्यनुमानमेव । यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, एवमनुत्पन्नं
कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम्¹ ।
इस प्रकार वैशेषिक दर्शन में उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, सम्भव तथा
अभाव इन प्रमाणों का साक्षात् या परम्परया अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया
है। इसमें विशेषता यह है कि ऐतिह्य की चर्चा नहीं की है और उसके स्थान
पर चेष्टा का अन्तर्भाव दिखाया है।
सांख्य विषयक मतभेद—
सांख्य में तीन प्रमाण माने हैं और शेष सबका अन्तर्भाव उन्हीं में दिखाया
है। इनमें से उपमान तथा अभाव के अन्तर्भाव का प्रकार दिखाया जा चुका
१ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १११ ।

१२८ तर्कभाषा [ प्रमाणसंख्याभेदः
है। शेष अर्थापत्ति और सम्भव इन दो का अनुमान में और ऐतिह्य का शब्द
में अन्तर्भाव माना है।
इस प्रकार देखने से प्रतीत होता है कि प्रमाणों की संख्या के विषय में
अनेक प्रकार के मत दार्शनिकों में पाए जाते हैं। विभिन्न मतों में एक से लेकर
आठ तक प्रमाण माने गए हैं। इन मतों का वर्गीकरण इस प्रकार किया
जा सकता है।
एक प्रमाण वादी। चार्वाक सम्प्रदाय केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानता है।
द्वि प्रमाणवादी। बौद्ध तथा वैशेषिक प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो प्रमाण मानते हैं।
त्रि प्रमाणवादी। सांख्य और योग प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द इन तीन
प्रमाणों को मानते हैं।
चतुः प्रमाणवादी। नैयायिक, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द इन चार
प्रमाणों को मानते हैं।
पञ्च प्रमाणवादी। प्रभाकर अर्थापत्ति को पञ्चम प्रमाण मानते हैं।
षट् प्रमाणवादी। कुमारिल भट्ट तथा वेदान्ती अर्थापत्ति तथा अभाव को मिला-
कर छः प्रमाण मानते हैं।
अष्ट प्रमाणवादी। पौराणिक सम्प्रदाय में ऐतिह्य तथा सम्भव दो प्रमाण और
बढ़ा कर आठ प्रमाण माने गए हैं।
हमने 'दर्शन मीमांसा' में इसका संग्रह इस प्रकार किया है।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव न्याये चैव चतुष्टयम् ॥
पञ्च प्राभाकरा भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणान्यत्र मन्वते ॥
१ दर्शनमीमांसा ५ ।

प्रामाण्यवादः ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १२६
प्रामाण्यवादः
प्रामाण्यवाद निरूपण
इस प्रकार प्रमाणों का निरूपण हो चुकने के बाद इन प्रमाणों से उत्पन्न
ज्ञान के प्रामाण्य के निर्णय का प्रश्न सामने उपस्थित होता है। इस विषय में
आस्तिक दर्शनों में भी दो प्रकार के मत पाए जाते हैं। मीमांसक कुमारिलभट्ट
ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः मानते हैं और अप्रामाण्य परतः मानते हैं।
स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् ।
न हि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन शक्यते¹ ॥
इसके विपरीत नैयायिक और वैशेषिक दर्शन प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों को
परतः मानते हैं।
‘किं विज्ञानानां प्रामाण्यमप्रामाण्यं चेति द्वयमपि स्वतः, १ उत उभयमपि
परतः, ३ आहोस्विदप्रामाण्यं स्वतः प्रामाण्यं तु परतः, ४ उतस्वित् प्रामाण्यं
स्वतः अप्रामाण्यं तु परत इति ।
स्थितिमेतदर्थक्रियाज्ञानात् प्रामाण्यनिश्चय इति । तदिदमुक्तं, ‘प्रमाणतोऽ-
र्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत् प्रमाणम्' [ न्याय भाष्य पृ० १ ] इति । तस्मा-
दप्रामाण्यमपि परोक्षमित्यतो द्वयमपि परत इत्येष एव पक्षः श्रेयानिति² ।
इस प्रकार न्याय वैशेषिक के मत में प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों परतः माने
गए हैं। मीमांसक मत में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः माना
है। सांख्य और योग का इस विषय में क्या मत है इसका स्पष्ट उल्लेख उनके
मुख्य ग्रन्थों में नहीं मिलता है फिर भी माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह में
सांख्य को न्याय तथा मीमांसा दोनों से भिन्न प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य दोनों
को स्वतः मानने वाला बताया है ।
प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे स्वतः सांख्याः समाश्रिताः³ ।
'श्लोकवार्तिक' सूत्र २ में 'केचिदाहुर्द्वयं स्वतः' लिखकर इसी सांख्य
मत का निर्देश किया गया जान पड़ता है और बौद्ध आचार्य शान्तरक्षित ने भी
तत्त्वसंग्रह कारिका २८११ में इसी मत का समर्थन किया है। इस प्रकार न्याय
वैशेषिक प्रामाण्य अप्रामाण्य दोनों को परतः मानते हैं। सांख्य योग दोनों
को स्वतः मानते हैं। मीमांसा में प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः
माना गया है। अब अप्रामाण्य को स्वतः और प्रामाण्य को परतः माननेवाला
१ श्लोक वार्तिक सू० २, श्लो० ४७ ।
२ न्यायमञ्जरी पृ० १६०-१७४ । कन्दली पृ० २१७-२२० ।
३ सर्वदर्शन संग्रह जैमिनिद० पृ० २७९ ।
६ त० भा०

१३० तर्कभाषा [ प्रामाण्यवादः
एक चौथा पक्ष शेष रह जाता है । सर्वदर्शन संग्रह में 'सौगताश्चरमं स्वतः' १
लिख कर बौद्धों को इस चतुर्थ पक्ष का मानने वाला बताया है ।
परन्तु बौद्ध आचार्य शान्त रक्षित ने 'तत्त्वसंग्रह' २ में बौद्ध मत को इन
चारों पक्षों से विलक्षण दिखाया है । वह लिखते हैं, -
'न हि बौद्धैरैषां चतुर्णामेकतमोऽपि पक्षोऽभीष्टः । अनियमपक्षस्येष्टत्वात् ।
तथाहि, उभयमप्येतत् किञ्चित् स्वतः, किञ्चित् परतः, इति पूर्वमुपवर्णितम् ।
अत एव पक्षचतुष्टयोपन्यासोऽप्ययुक्तः । पञ्चमस्याप्यनियमपक्षस्य सम्भवात् ।'
अनियम पक्ष का अभिप्राय यह है कि अभ्यासदशापन्न ज्ञान में प्रामाण्य
अप्रामाण्य दोनों स्वतः और अनभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों परतः हैं । जैन
परम्परा में आचार्य हेमचन्द्र ३ ने इसी रूप से तथा आचार्य देवसूरि ने उत्पत्ति
और ज्ञप्ति भेद से प्रामाण्य को स्वतः तथा परतः इन दोनों प्रकार का माना है-
तत्प्रामाण्यं ४ स्वतः परतश्चेति ।
तदुभयमुत्पत्तौ ५ परत एव ज्ञप्तौ तु स्वतः परतश्चेति ।
इस प्रकार प्रामाण्यवाद के विषय में कुल छः पक्ष बन जाते हैं-
१ न्याय पक्ष में प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः हैं ।
२ सांख्य पक्ष में प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों स्वतः हैं ।
३ मीमांसक पक्ष में प्रामाण्य स्वतः तथा अप्रामाण्य परतः है ।
४ बौद्धैकदेशी पक्ष में अप्रामाण्य स्वतः और प्रामाण्य परतः है ।
५ बौद्धपक्ष [शान्तरक्षित] में अभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों स्वतः और
अनभ्यासदशापन्न ज्ञान में दोनों परतः हैं ।
६ जैनपक्ष में उत्पत्ति में दोनों परतः और ज्ञप्ति में दोनों स्वतः हैं ।
तर्कभाषाकार ने वहाँ जो प्रामाण्य चर्चा का विषय उठाया है वह मुख्यतः
मीमांसकों के 'स्वतः प्रामाण्यवाद' का निराकरण करने के लिए उठाया है ।
इसलिए अन्य पक्षों की चर्चा नहीं की है ।
हमने अपनी दर्शन मीमांसा में प्रामाण्यवादविषयक इन विभिन्न मतों का
संकलन इस प्रकार किया है-
प्रमाणत्वाप्रमाणत्वं सांख्ये योगे स्वतो मतम् ।
तदेव परतो ज्ञेयमुभयं गौतमे नये ॥
१ सर्व० द० पृ० २७९
२ तत्त्वसंग्रह कारिका ३१२३
३ प्रमाणमीमांसा १, १, ८ । ४ परी० १, १३ । ५ प्रमाणन० १, २१ ।
६ दर्शन मीमांसा ५ ।

मीमांसकमतम् ] प्रामाण्यवादनिरूपणम् १३१
प्राभाकराश्च भाट्टाश्च प्रामाण्यं ब्रुवते स्वतः ।
अप्रामाण्यं पुनस्तेषां पुन्दोषात् परतो मतम् ॥
स्वतोऽभ्यासद्शापक्षे, उभयं शान्तरक्षितैः ।
अनभ्यासद्शायां तैरभयं परतो मतम् ॥
अप्रामाण्यं स्वतो नित्यं प्रामाण्यं परतस्तथा ।
बौद्धं मतान्तरं प्रोक्तं सर्वदर्शनसंग्रहे ॥
स्वतस्त्वन्तु समुत्पत्तौ ज्ञप्तौ परतस्त्वं तथा ।
उभयोरेतयोः सर्वे जैनाश्च सम्प्रचक्षते १ ॥
मीमांसक मत का उपपादन—
मीमांसक मत स्वतः प्रामाण्यवादी है । उनके मत में स्वतः प्रमाण का
लक्षण 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' किया गया है । अर्थात् ज्ञान
ग्राहक सामग्री से अतिरिक्त सामग्री प्रामाण्यग्रह के लिए जहां अपेक्षित न होती
हो उसे स्वतः प्रमाण कहना चाहिए । अर्थात् जहां ज्ञान तथा तद्गत प्रामाण्य
दोनों का ग्रहण एक ही सामग्री से हो जाता है उसे स्वतः प्रमाण कहा जाता
है । इसके विपरीत 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तापेक्षत्वं परतस्त्वम्' अर्थात् ज्ञान ग्राहक
और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री अलग अलग होने पर परतः प्रामाण्य होता है ।
यह 'स्वतः प्रामाण्य' और 'परतः प्रामाण्य' के लक्षण हैं । मीमांसक मत में
ज्ञान और प्रामाण्य दोनों की ग्राहक एक ही सामग्री 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता
अर्थापत्ति' है और न्याय मत में ज्ञान ग्राहक सामग्री 'अनुव्यवसाय' है तथा
'प्रामाण्य ग्राहक सामग्री' इससे भिन्न 'प्रवृत्तिसाफल्यमूलक अनुमान' हैं ।
मीमांसक का अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान से घट में 'ज्ञातता'
नामक एक धर्म उत्पन्न होता है । यह धर्म 'अयं घटः' इस ज्ञान के होने से
पहिले नहीं था इस ज्ञान के बाद उत्पन्न हुआ है इसलिए वह 'अयं घटः' इस
ज्ञान से जन्य है । अर्थात् उसका कारण ज्ञान है ।
इस 'ज्ञातता' धर्म की प्रतीति 'ज्ञातो मया घटः' इस ज्ञान में होती है । यह
'ज्ञातता' धर्म अपने कारण ज्ञान के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता है । इसलिए
'ज्ञातता' की अन्यथानुपपत्ति से प्रसूता अर्थापत्ति ही इस 'ज्ञातता धर्म' की
ग्राहिका है । और जब 'ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञान का ग्रहण
होता है तब उस ज्ञान में रहनेवाले प्रामाण्य का ग्रहण भी उसी अर्थापत्ति से
१ दर्शन मीमांसा ५ ।

१३२ | तर्कभाषा | [ मीमांसकमतम्

हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य ग्राहक सामग्री समान हो
जाने से 'स्वतः प्रामाण्य' है । यह मीमांसक मत है ।
परन्तु नैयायिकों के मत में 'ज्ञातता' नाम का कोई पदार्थ ही नहीं है ।
इसलिए 'ज्ञातता' की सिद्धि का एक और भार मीमांसक पर आता है । बिना
ज्ञातता की सिद्धि के 'स्वतः प्रामाण्य' की सिद्धि नहीं हो सकती है । इसलिए
मीमांसक दूसरी 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से 'ज्ञातता' की सिद्धि
करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि 'अयं घटः' इस ज्ञान का विषय घट होता है
पट नहीं । इस विषय नियम का उपपादन किस आधार पर किया जाय । नैया-
यिक के मत से इसका उपपादन 'तदुत्पत्ति सिद्धान्त' को मान कर और
बौद्धादि मतों में 'तादात्म्य' सिद्धान्त के आधार पर किया जा सकता है ।
परन्तु वे दोनों ही समाधान ठीक नहीं बनेंगे ।
'तदुत्पत्ति' सिद्धान्त का आशय यह होगा कि ज्ञान के प्रति विषय भी
कारण होता है । इसलिए 'अयं घटः' यह ज्ञान घट से पैदा होता है इसलिए
घटज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । यह 'तदुत्पत्ति' पक्ष से नैयायिकों की
ओर से कहा जा सकता है । परन्तु इस में दोष यह आता है कि 'घट-ज्ञान' के
प्रति जैसे विषय रूप घट कारण होता है इसी प्रकार आलोक भी कारण होता
है । घट से उत्पन्न होने के कारण यदि 'घट-ज्ञान' का विषय घट हो सकता है
तो 'घट-ज्ञान' आलोक से भी उत्पन्न होता है इसलिए उसका विषय आलोक
भी होना चाहिए । परन्तु कोई भी 'घट-ज्ञान' का विषय आलोक को मानने के
लिए तैयार नहीं हो सकता है । इसलिए 'तदुत्पत्ति' के आधार पर विषय
नियम का उपपादन नहीं किया जा सकता है ।
दूसरा 'तादात्म्य' या 'तदाकारतापक्ष' बौद्धों का या वेदान्त आदि का हो सकता
है । ज्ञान के आकार से बाह्य अर्थों का अनुमान माननेवाला बौद्ध वैभाषिक मत
है । और उनको सौत्रान्तिक मत में बाह्य अर्थों का अस्तित्व मानकर ज्ञान को तज्जन्य
तदाकार माना जाता है । इन मतों के अनुसार घट और घटज्ञान का 'तादात्म्य'
या 'तदाकारता' होने से घट ज्ञान का विषय घट होता है पट नहीं । इसप्रकार
तादात्म्य या तदाकारता के आधार पर भी विषय नियम का उपपादन करना ठीक
नहीं है क्योंकि ज्ञान और विषय वस्तुतः दोनों भिन्न हैं । घटादि विषयों का बाह्य
अस्तित्व है और उससे भिन्न ज्ञान का केवल आन्तरिक अस्तित्व है इसलिए
घट और ज्ञान का तादात्म्य बन भी नहीं सकता अतएव घट ज्ञान का विषय
घट ही क्यों होता है पट क्यों नहीं । इस विषय नियम का उपपादन न
'तदुत्पत्ति' पक्ष से ठीक होता है और न 'तादात्म्य' पक्ष से ही बन सकता है ।

स्वतःप्रामाण्यखण्डनम् ] प्रामाण्यवादः १३३
उसके उपपादन का केवल एक ही मार्ग है और वह है ज्ञातता। घट ज्ञान से
उत्पन्न होने वाली 'ज्ञातता' केवल घट में रहती है, पट में नहीं। इसलिए
घटज्ञान का विषय घट ही होता है पट नहीं। इस प्रकार 'ज्ञातता' के आधार
पर ही विषय नियम का उपपादन हो सकता है। अन्यथा नहीं। यह
'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' ही ज्ञातता की सिद्धि में प्रमाण है।
जब 'विषयत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति' से ज्ञातता की सिद्धि हो
जाती है तब वह ज्ञातता अपने कारण रूप ज्ञान को 'ज्ञाततान्यथानुपपत्ति-
प्रसूता अर्थापत्ति' से सिद्ध कर देती है और उसी अर्थापत्ति से, ज्ञान में रहने
वाले प्रामाण्य का भी ग्रहण हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान ग्राहक और प्रामाण्य
ग्राहक सामग्री एक होने से 'ज्ञानग्राहकातिरिक्तानपेक्षत्वं स्वतःस्त्वम्' यह स्वतः
प्रामाण्य का लक्षण घटित हो जाने से स्वतः प्रामाण्यवाद ही मानना चाहिए
यह मीमांसक का मत है।
नैयायिक मत से स्वतः प्रामाण्य का खण्डन—
इसके विपरीत नैयायिक का सिद्धान्त पक्ष यह है कि मीमांसक 'विषय-
विषयिभाव' के उपपादन के लिए 'ज्ञातता' को मानना चाहते हैं यह ठीक नहीं
है। घट और ज्ञान का 'विषयविषयिभाव' ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु
स्वाभाविक है। यदि 'विषयविषयिभाव' को ज्ञातता के आधार पर मानेंगे तो
उसमें दो दोष होंगे। एक तो यह कि अतीत और अनागत पदार्थ ज्ञान का
विषय नहीं हो सकेंगे। क्योंकि आपके मत से ज्ञान का विषय वही हो सकता है
जो ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता का आधार हो। वर्तमान ज्ञातता का आधार
वर्तमान पदार्थ ही हो सकता है। अतीत और अनागत पदार्थों का वर्तमान काल
में कोई अस्तित्व नहीं है। तब ज्ञान से उत्पन्न होने वाली ज्ञातता उनमें कैसे
रहेगी। इसलिए यदि ज्ञातता के आधार पर विषय नियम माना जायगा तो
अतीत और अनागत पदार्थ विषय नहीं बन सकेंगे। यह एक दोष है जिसके कारण
विषय नियम को ज्ञातता के आधार पर नहीं अपितु स्वाभाविक मानना चाहिए।
ज्ञातता के आधार पर विषय नियम मानने में दूसरा 'अनवस्था' दोष
बाधक है। अनवस्था दोष का अभिप्राय यह है कि ज्ञातता का भी हमको ज्ञान
होता है अतः ज्ञातता भी उस ज्ञान का विषय होती है। आपके मतानुसार
ज्ञातता ज्ञान का विषय तब ही हो सकती है जब उसके ज्ञान से उत्पन्न ज्ञातता
उसमें रहे। इस प्रकार एक ज्ञातता के विषयत्व के उपपादन के लिए उसमें दूसरी
ज्ञातता माननी होगी। वह दूसरी ज्ञातता भी ज्ञान का विषय होती है इसलिए