सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् ११७
अभावः
नन्वभावाख्यमपि पृथक् प्रमाणमस्ति । तच्चाभावग्रहणायाङ्गीकर-
णीयम् । तथाहि घटाद्यनुपलब्ध्या घटाद्यभावो निश्चीयते । अनुपलब्धि-
श्चोपलब्धेरभावः । इत्यभावप्रमाणेण घटाद्यभावो गृह्यते ।
नैतत् । यद्यत्र घटोऽभविष्यत्तर्हि भूतलमिवादृक्ष्यदित्यादितर्कसहका-
रिणाऽनुपलम्भसनाथेन प्रत्यक्षेणैवाभावग्रहणात् ।
नन्विन्द्रियाणि सम्बद्धार्थग्राहकाणि । तथाहीन्द्रियाणि वस्तुप्राप्य-
प्रकाशकारीणि ज्ञानकारणत्वादालोकवत् ।
अभाव निरूपण
[ प्रश्न ] 'अभाव' [ नामक प्रमाण ] भी अलग प्रमाण है। और अभाव के
ग्रहण करने के लिए उस [ अनुपलब्धि अथवा अभाव नामक प्रमाण ] को स्वीकार
करना चाहिए। क्योंकि घटादि की अनुपलब्धि से घटादि के अभाव का ग्रहण
होता है।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है यदि यहाँ घड़ा होता तो भूतल के समान
दिखाई देता। इस प्रकार के तर्क से सहकृत अनुपलब्धि युक्त प्रत्यक्ष प्रमाण से
ही अभाव का ग्रहण होने से [ अभाव के ग्रहण के लिए अलग अनुपलब्धि
अथवा अभाव प्रमाण के मानने की आवश्यकता नहीं है। ]
[ प्रश्न ] इन्द्रियां [ तो ] संबद्ध अर्थ की ग्राहक होती हैं। जैसा कि [ निम्नां-
कित अनुमान से सिद्ध होता है ] इन्द्रियां वस्तु को प्राप्त कर ] वस्तु से संबद्ध
होकर ही अर्थ का ] प्रकाशित करने वाली हैं ज्ञान का करण होने से
प्रकाश के समान ।
वेदान्तियों के मत में घटाभाव, पटाभाव आदि अभावों के साथ इन्द्रिय
का कोई सम्बन्ध सम्भव न होने से प्रत्यक्ष अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता
है। इसलिए वे अभाव के ग्रहण के लिए 'अभाव' या 'अनुपलब्धि' नामक
एक पृथक् प्रमाण मानते हैं। परन्तु नैयायिक अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष प्रमाण
द्वारा ही मानते हैं। अतः अभाव को पृथक् प्रमाण मानने का खण्डन करने
के लिए इस प्रकरण को प्रारम्भ करते हैं।
आलोक ज्ञान का करण है और वस्तुओं के साथ संबद्ध होकर ही उनको
प्रकाशित करता है। इसी प्रकार इन्द्रियां भी ज्ञान का करण होने से आलोक
के समान वस्तु के साथ संबद्ध होकर ही उसको प्रकाशित कर सकती हैं। अथवा
घ्राण, रसना और त्वक् इन तीन इन्द्रियों के विषय में तो सभी इस बात में एक
मत हैं कि ये इन्द्रियाँ वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही अपने अर्थ को प्रकाशित
करती हैं। विवाद केवल चक्षु और श्रोत्र के विषय में है। बौद्ध लोग चक्षु, श्रोत्र