तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ तर्कभाषा [ अर्थपत्तिखण्डनम्
रात्रौ भुङ्क्ते दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात् । यस्तु न रात्रौ भुङ्क्ते
नासौ दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनो, यथा दिवा रात्रौ चाऽभुञ्जानोऽपीनो,
न चायं तथा, तस्मान्न तथेति केवलव्यतिरेक्यनुमानेनैव रात्रिभोजनस्य
प्रतीयमानत्वात् । किमर्थमर्थापत्तिः पृथक्त्वेन कल्पनीया ।
क्योंकि [ अनुमान की प्रक्रिया में ] यह देवदत्त रात्रि में खाता है [ यह प्रतिज्ञा
हुई ] दिन में न खाने पर भी मोटा होने से [ यह हेतु हुआ ] । जो रात्रि में नहीं
खाता है वह दिन में न खाने पर मोटा नहीं होता । जैसे दिन और रात्रि में न
खानेवाला [ नवरात्रोपवासी पुरुष ] दुबला [ होता ] है। [ यह व्यतिरेक व्याप्ति
और उसका उदाहरण हुआ ] यह देवदत्त वैसा [ नवरात्रोपवासी के समान
दुर्बल ] नहीं है [ यह उपनय हुआ ] इसलिए वैसा [ दिन और रात में भोजन न
करने वाला ] नहीं है [ अर्थात् रात्रि में भोजन करता है यह निगमन हुआ ]
इस प्रकार केवल व्यतिरेकी अनुमान से ही रात्रि भोजन के प्रतीत हो जाने से
अर्थापत्ति को अलग प्रमाण क्यों माना जाय ।
हमने अपनी दर्शन मीमांसा में लिखा है—
अनुपपद्यमानार्थादुपपादककल्पना ।
अर्थापत्तिर्द्विधा प्रोक्ता श्रुतदृष्टप्रभेदतः ॥१॥
पीनोऽयं देवदत्तस्तु नैव भुङ्क्ते दिवा च सः ।
इति दृष्टे श्रुते वापि कल्प्यते रात्रिभोजनम् ॥२॥
अतो वेदान्तिनश्चैव तथा मीमांसकावुभौ ।
अर्थापत्तिं पृथक्त्वेन प्रमाणं ब्रुवते परम् ॥३॥
अनियम्यस्य नायुक्तिर्नानियन्तोपपादकः ।
इति कृत्वानुमानेन गृह्यते रात्रिभोजनम् ॥४॥
ततश्च भिद्यते नेयं केवलव्यतिरेकिणः ।
अन्तर्भूताऽनुमानेऽतो न्याये मानान्तरं न सा ॥५॥
विषयव्यवस्थार्थं च मानयोस्तु विरुद्धयोः ।
अर्थापत्तिः पृथङ् मानं मीमांसकमते मता ॥६॥
न मानयोर्विरोधोऽस्ति विरोधे वा न मानता ।
इति तस्याः प्रमाणत्वं नैवमप्युपपद्यते ॥७॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।