तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धलक्षणम् ] अभावानिरूपणम् १२१
अभाव में नहीं रहता। इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' भी अभाव में नहीं रह
सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अभाव 'विशेष्य' या विशेषण नहीं हो
सकेगा। परन्तु अभाव विशेष्य भी होता है और विशेषण भी यह बात सर्वा-
नुभव सिद्ध है। परन्तु वह कब सिद्ध हो सकती है ? जब कि 'विशेष्यविशेषण-
भाव' को 'सम्बन्धस्वरूप' माना जाय । जब 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्ब-
न्धस्वरूप' मानते हैं तब तो अभाव विशेष्य और विशेषण हो सकता है।
और यदि 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' मानें तो अभाव न
विशेष्य हो सकता है और न विशेषण । इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को
'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' नहीं अपि तु 'सम्बन्धस्वरूप' ही मानना होगा। और
उस दशा में सम्बन्ध के लक्षण का प्रथम अंश 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' के 'विशे-
ष्यविशेषणभाव' में न घटने से उसको सम्बन्ध नहीं कहा जा सकता है।
इसी प्रकार सम्बन्ध लक्षण के अवशिष्ट दो अंश भी 'विशेष्यविशेषणभाव'
में नहीं घटते हैं। दूसरा अंश है 'उभयाश्रितः' । परन्तु 'विशेष्यभाव' अथवा
'विशेषणभाव' में से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। विशेष्यभाव केवल विशेष्य
में रहता है। और विशेषणभाव केवल विशेषण में रहता है। इसलिए उनमें
से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। और जब वह अलग अलग रहते हैं तब
उनको 'एक' भी नहीं कहा जा सकता है। विशेष्यभाव अलग है जो केवल
विशेष्य में रहता है और विशेषण भाव अलग है जो कि केवल विशेषण में
रहता है।
इस प्रकार सम्बन्ध के लक्षण के तीन अंशों में से एक भी अंश विशेष्य-
विशेषणभाव में नहीं घटता है इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को सम्बन्ध नहीं
कहा जा सकता है। इसी प्रक्रिया से कार्यकारण भाव आदि अन्य समस्त
सम्बन्धों का भी खण्डन किया जा सकता है। इसलिए 'संयोग' और 'समवाय'
को छोड़ कर अन्य कोई 'सम्बन्ध' सिद्ध नहीं हो सकता है। और चक्षु आदि
इन्द्रिय का अभाव के साथ संयोग या समवाय सम्बन्ध नहीं बनता है। क्योंकि
संयोग दो 'द्रव्यों' का ही होता है और अभाव 'द्रव्य' नहीं है। तथा 'समवाय'
सम्बन्ध 'अयुतसिद्धों' का ही होता है परन्तु अभाव 'अयुतसिद्धों' में नहीं गिना
गया है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का न 'संयोग' सम्बन्ध होता है और न
'समवाय' । इन दो के अतिरिक्त 'विशेष्यविशेषणभाव' आदि और कोई 'सम्बन्ध'
ही नहीं है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का कोई 'सम्बन्ध' न होने से प्रत्यक्ष
प्रमाण से इन्द्रिय द्वारा अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता । यह पूर्व पक्ष है।