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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 330 में से

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पृष्ठ 183

११८ तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
यद्वा चक्षुःश्रोत्रे वस्तुप्राप्यप्रकाशकारिणी बहिरिन्द्रियत्वात् त्वगादि-
वत् । त्वगादीनान्तु प्राप्यप्रकाशकारित्वमुभयवादिसिद्धमेव ।
न चेन्द्रियाभावयोः सम्बन्धोऽस्ति संयोगसमवायौ हि सम्बन्धौ, न
च तौ तयोः स्तः । द्रव्ययोरेव संयोग इति नियमात् । अभावस्य च
द्रव्यत्वाभावात् । अयुतसिद्धयभावान्न समवायोऽपि ।
तथा मन को प्राप्य प्रकाशकारी नहीं मानते हैं । '१अप्राप्तान्यक्षिमनःश्रोत्राणि
त्रयमन्यथा' । २जैन लोग केवल चक्षु को छोड़ कर शेष चार को प्राप्यकारी
मानते हैं । साँख्य, न्याय, ५वैशेषिक तथा मीमांसा६ आदि सभी वैदिक दर्शन
अपनी अपनी प्रक्रिया के अनुसार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्यकारी मानते हैं ।
अन्तरिन्द्रिय मनको केवल सांख्य, योग७, और वेदान्त ही प्राप्यकारी मानते हैं ।
शेष वैदिक दर्शन, बौद्ध तथा जैनदर्शन मनको अप्राप्यकारी ही मानते हैं ।
यहाँ बहिरिन्द्रियों की चर्चा बौद्धों के मत के खण्डन के लिए की है । चक्षु से
जिस घटादि अर्थ का प्रत्यक्ष होता है वह चक्षु से दूर होता है और श्रोत्र से
जिस शब्द का ग्रहण होता है उसकी उत्पत्ति भी दूर होती है । इसलिए सब
इन्द्रियों के बजाय इन्हीं दो इन्द्रियों को पक्ष बना कर दूसरा अनुमान करते हैं।
अथवा चक्षु और श्रोत्र [ ये दोनों इन्द्रियां ] वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही
[ वस्तु ] का प्रकाश करने वाली हैं बहिरिन्द्रिय होने से त्वगादि [ अन्य बहिरि-
न्द्रियों ] के समान । त्वगादि [ अन्य तीन बहिरिन्द्रियों ] का वस्तु प्राप्य
प्रकाशकारित्व तो दोनों वादियों को स्वीकृत ही है [ इन्हीं के समान चक्षु और
श्रोत्र का भी वस्तु के साथ सम्बद्ध होना प्रत्यक्ष में आवश्यक है । ]
[ परन्तु ] इन्द्रिय और अभाव का [ कोई भी ] सम्बन्ध नहीं [ हो सकता ]
है । [ क्योंकि संसार में ] संयोग और समवाय [ दो ही ] सम्बन्ध हैं और उन
दोनों [ अर्थात् इन्द्रिय और अभाव ] के वे दोनों [ संयोग या समवाय सम्बन्ध ]
नहीं हैं । [ क्योंकि ] संयोग दो द्रव्यों का ही होता है यह नियम होने से । और
अभाव के द्रव्य नहीं होने से [ इन्द्रिय के द्रव्य होते हुए भी उसके दूसरे सम्बन्धी
अभाव के द्रव्य न होने से इन्द्रिय-चक्षु-का अभाव के साथ संयोग सम्बन्ध नहीं
हो सकता है । और समवाय सम्बन्ध अयुतसिद्धों का ही होता है । अयुतसिद्ध
भी पांच परिगणित हैं उनमें भी अभाव की गणना नहीं है इसलिए ] अयुतसिद्ध
न होने से समवाय सम्बन्ध भी नहीं है ।
१ अभिधर्म० २,४३ । २ आव० नि० श० । ३ सां० सू० १,८० ।
४ सू० २,१,३३-५२ । ५ कन्दली पृ० ३३ । ६ शा० भा० १,१,१३ ।
७ योग भा० १,७