तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थापत्तिखण्डनम् ] अर्थापत्तिनिरूपणम् ११५
अर्थापत्तिः
नन्वर्थापत्तिरपि पृथक् प्रमाणमस्ति । अनुपपद्यमानार्थदर्शनात् तदु-
पपादकीभूतार्थान्तरकल्पनम् ‘अर्थापत्तिः’ । तथाहि, पीनो देवदत्तो दिवा
न भुङ्क्ते इति दृष्टे श्रुते वा रात्रिभोजनं कल्प्यते । दिवाऽभुञ्जानस्य
पीनत्वं रात्रिभोजनमन्तरेण नोपपद्यतेऽतः पीनत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता-
र्थापत्तिरेव रात्रिभोजने प्रमाणम् । तच्च प्रत्यक्षादिभ्यो भिन्नं, रात्रिभोज-
नस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वात् ।
नैतत् । रात्रिभोजनस्यानुमानविषयत्वात् । तथाहि, अयं देवदत्तो
अर्थापत्तिः
नैयायिक लोग प्रत्यक्षादि चार ही प्रमाण मानते हैं । शेष प्रमाणों का
अन्तर्भाव इन्हीं चार प्रमाणों में कर लेते हैं । इन शेष प्रमाणों में 'अर्थापत्ति'
और 'अभाव' ये दोनों मुख्य प्रमाण हैं । इसलिए इन दोनों का अन्तर्भाव
दिखलाने का प्रयत्न तर्कभाषाकार ने किया है । शेष 'ऐतिह्य' और 'सम्भव' का
अन्तर्भाव बहुत स्पष्ट है और वे प्रमाण भी मुख्य नहीं हैं इसलिए उनका अन्त-
र्भाव तर्कभाषाकार ने नहीं दिखाया है । आगे 'अर्थापत्ति' का 'केवलव्यतिरेकी'
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हैं । मीमांसक और वेदान्ती आदि जो लोग
अर्थापत्ति को पृथक प्रमाण मानते हैं वे अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद नहीं
मानते हैं । और नैयायिक अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद मानते हैं
इसलिए वह 'अर्थापत्ति' को अलग प्रमाण नहीं मानते हैं । इसीलिए 'अर्था-
पत्ति' का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं ।
[ पूर्वपक्षी प्रश्न ] अच्छा, अर्थापत्ति भी तो पृथक् प्रमाण है । [ उसका
लक्षण ] अनुपद्यमान अर्थ को देखकर उसके उपपादक अर्थ की कल्पना करना
अर्थापत्ति [ कहलाती ] है । जैसे कि देवदत्त दिन में नहीं खाता है परन्तु मोटा
है ऐसा देखने या सुनने पर [ उसके ] रात्रिभोजन की कल्पना कर ली जाती है ।
[ क्योंकि ] दिन में न खाने वाले का मोटा होना रात्रिभोजन के बिना नहीं बन
सकता है । इसलिए अन्यथा [ अर्थात् रात्रि भोजन के बिना ] पीनत्व की अनुप-
पत्ति ही [ उसके ] रात्रि भोजन में प्रमाण होती है । और वह [ अर्थापत्ति ]
प्रमाण रात्रि भोजन के प्रत्यक्षादि का विषय न होने से प्रत्यक्षादि से भिन्न
[ अलग ही प्रमाण ] है ।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है । रात्रि भोजन के अनुमान का विषय [ अनुमान
गम्य ] होने से [ अर्थापत्ति को अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ]