तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धलक्षणम् ] अभावनिरूपणम् ११६
संयोग और समवाय ये ही दो सम्बन्ध हैं। इन्द्रिय का अभाव के साथ
उनमें से एक भी सम्बन्ध नहीं बनता। इसलिए इन्द्रिय का अभाव के साथ
कोई सम्बन्ध नहीं है। बिना इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है
इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता है। अतएव अभाव
के ग्रहण के लिए अभाव नामक अलग प्रमाण मानना चाहिये यह पूर्व पक्ष
का आशय है।
जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है नैयायिक के मत में 'अभावसमवायौ
च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः'के अनुसार अभाव के ग्रहण में इन्द्रिय और अभाव
का 'विशेष्यविशेषणभाव' सम्बन्ध होता है। इसलिए पूर्वपक्षी 'विशेष्यविशेषण-
भाव' के सम्बन्धत्व का ही खण्डन करता है। उसका कहना है कि 'विशेष्य-
विशेषणभाव' में सम्बन्ध का लक्षण ही नहीं घटता है इसलिए उसको सम्बन्ध
नहीं कहा जा सकता है। सम्बन्ध के लक्षण में तीन बातें आवश्यक हैं।
'सम्बन्धो हि १ सम्बन्धिभ्यां भिन्नः, २ उभयाश्रितः, ३ एकश्च'। अर्थात् सम्बंध
को १ सम्बन्धियों से भिन्न, २ उभयाश्रित और ३ एक होना चाहिये। जैसे घट
और पट का संयोग होता है। इस संयोग में घट और पट दोनों सम्बन्धी हुए और
'संयोग' उनका 'सम्बन्ध' हुआ। यह संयोग सम्बन्ध अपने सम्बन्धी घट और
पट दोनोंसे भिन्न है। घट और पट दोनों 'द्रव्य' हैं परंतु संयोग 'गुण' है। इसलिए
'संयोग' रूप 'गुण' अपने 'द्रव्य' रूप 'सम्बन्धियों'से भिन्न है। वह संयोग घट और
पट दोनोंमें रहता है इसलिए उभयाश्रित हुआ। और उभयाश्रित होनेसे ही एक
भी है। घट का पट के साथ जो संयोग है पटका घट के साथ भी वही संयोग
है। यहां दो संयोग नहीं हैं। इस प्रकार संयोग 'सम्बन्ध'में सम्बन्ध के लक्षण
के तीनों अंश घट जाते हैं। इसलिए संयोग को 'सम्बन्ध' कहना उचित है।
इसी प्रकार तन्तु और पट का 'समवाय' सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भी
'सम्बन्ध'का लक्षण घट जाता है। क्योंकि यहाँ तन्तु और पट दोनों 'सम्बन्धी'
हैं। और दोनों 'द्रव्य' रूप हैं। परन्तु इनका सम्बन्ध 'समवाय' कोई द्रव्य
नहीं है। उसे द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, और अभाव से भिन्न अलग
पदार्थ माना गया है। इसलिए 'समवाय' भी सम्बन्धियों से भिन्न है। और
उभयाश्रित तथा एक भी है। इसलिए समवाय में भी 'सम्बन्ध' का लक्षण घट
जाता है। अतः उसको भी 'सम्बन्ध' कहा जा सकता है।
परन्तु 'विशेष्यविशेषणभाव' में इस सम्बन्ध लक्षण के तीन अंशों में से
एक भी नहीं घटता है। सबसे पहिली बात है, 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः'। सो