तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
वर्णितानि चत्वारि प्रमाणानि । एतेभ्योऽन्यन्न प्रमाणम्, प्रमाणस्य
सतोऽत्रैवान्तर्भात् ।
दोनों के अलग अलग मत पाए जाते हैं । जिनको क्रमशः 'अभिहितान्वयवाद'
और 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं। कुमारिल भट्ट 'अभिहितान्वयवाद' के
मानने वाले हैं । उनके अनुसार वाक्य को सुनने पर पहिले 'अभिधा' शक्ति
द्वारा पदों से पदार्थों की प्रतीति होती है । और उसके बाद उन पदार्थों का
परस्पर सम्बन्ध 'तात्पर्याशक्ति' द्वारा होता है। पहिले पदार्थ 'अभिहित' अर्थात्
अभिधा शक्ति से बोधित होते हैं और पीछे उनका 'अन्वय' या परस्पर संसर्गबोध
होता है । इसीको 'अभिहितान्वयवाद' कहते हैं । कुमारिल भट्ट इसी सिद्धान्त
को माननेवाले हैं और उनके मत में 'तात्पर्याशक्ति' भी अलग मानी जाती है ।
इसके विपरीत प्रभाकर के मत में अभिधा शक्ति से 'केवल' पदार्थों की
नहीं, अपितु 'अन्वित' पदार्थों की ही उपस्थिति होती है । क्योंकि अभिधाशक्ति
के लिए आवश्यक, सङ्केत का ग्रहण 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु 'अन्वित
पदार्थ में ही होता है।' सङ्केत का ग्राहक मुख्यतः 'व्यवहार' है। और
'व्यवहार' 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु किसी दूसरे के साथ सम्बद्ध या अन्वित
पदार्थ में ही होता है । इसलिए 'सङ्केतग्रह' भी किसी 'अन्वित' पदार्थ में ही
हो सकता है । इसीलिए अभिधा शक्ति से अन्वित अर्थ ही अभिहित हो सकता
है, 'केवल' पदार्थ नहीं । इसी को 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं । इस मत
में पदार्थों का संसर्गबोध करानेवाली 'तात्पर्या' शक्ति की अलग आवश्यकता
नहीं पड़ती है ।
चारों प्रमाणों का वर्णन हो गया । इनसे अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं
है । प्रमाणभूत [ अन्य सब ] का इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाने से [ केवल चार
ही प्रमाण हैं ] ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में लिखा है—
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव तार्किकाश्च चतुष्टयम् ॥
पंच प्राभाकरा, भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणानि ब्रुवन्ति वै ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।