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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 330 में से

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पृष्ठ 185

१२० तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
‘विशेष्य विशेषण भाव’ ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ नहीं अपितु सम्बन्धिस্বরূপ है।
‘दण्डी-पुरुषः’ इस प्रतीति में दण्ड ‘विशेषण’ है और पुरुष ‘विशेष्य’ है। इन
दोनों में रहनेवाली ‘विशेषणता’ या ‘विशेष्यता’ उन दोनों के स्वरूप से अलग
कोई पदार्थ नहीं है अपितु उन दोनों का स्वरूप ही है। दण्ड में जो विशे-
षणता है वह दण्ड से अलग नहीं है बल्कि दण्ड का स्वरूपभूत है। और
पुरुष में जो ‘विशेष्यता’ है वह भी पुरुष के स्वरूप से अलग नहीं अपितु पुरुष
का स्वरूपभूत ही है। अर्थात् ‘विशेष्यता’ और विशेषणता’ को सम्बन्धियों से
अलग नहीं अपितु ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही मानना होगा। इसलिए ‘विशेष्य-
विशेषणभाव’ को ‘सम्बन्ध’ नहीं कहा जा सकता।
यदि यह पूछा जाय कि ‘विशेष्यविशेषणभाव’को ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही क्यों
माना जाय सम्बन्धियों से अलग ही क्यों न मान लिया जाय। तो इसका
उत्तर यह होगा कि ‘घटाभाववद् भूतलम्’ इस प्रतीति में घटाभाव विशेषण होता
है और भूतल विशेष्य है। इसके विपरीत ‘भूतलनिष्ठः घटाभावः’ इस प्रतीतिमें
घटाभाव विशेष्य है और भूतल विशेषण है। इससे यह सिद्ध होता है कि
अभाव भी ‘विशेष्य’ तथा ‘विशेषण’ होता है। यदि ‘विशेष्यविशेषण भाव’ को
‘सम्बन्धिस্বরূপ’ न मानकर ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ माना जाय तो घटाभाव में
रहनेवाली ‘विशेष्यता’ और ‘विशेषणता’ भी घटाभाव से भिन्न कोई अन्य पदार्थ
होगी। संसार के समस्त भाव पदार्थों का वर्गीकरण द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य,
विशेष, और समवाय इन छः पदार्थों में ही किया गया है। इसलिए यह
‘विशेष्य विशेषणभाव’ यदि अलग कोई पदार्थ होगा भी तो इन्हीं छः पदार्थों
में कहीं उसका अन्तर्भाव होगा। जैसे संयोग और समवाय को सम्बन्धियों से
अलग मानने पर भी इन्हीं छः पदार्थों में उनका अन्तर्भाव होता है। संयोग
गुण में गिना जाता है और समवाय छठा पदार्थ माना जाता है। इसी प्रकार
‘विशेष्य-विशेषणभाव’ भी यदि सम्बन्धियों से भिन्न है तो, या तो द्रव्य होगा,
या गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, या समवाय में से कोई होगा। इनसे भिन्न
कोई और पदार्थ नहीं हो सकता है।
यदि ‘विशेष्यविशेषणभाव’ को द्रव्यादि में से कोई पदार्थ मान लिया जाय
तो यह आपत्ति उपस्थित होती है कि द्रव्यादि छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ
‘अभाव’ में नहीं रहता है। द्रव्यादि छहों पदार्थ किसी भाव पदार्थ में ही रह
सकते हैं। अभाव में उनमें से कोई भी पदार्थ नहीं रह सकता है। इसलिए यदि
‘विशेष्यविशेषणभाव’ को ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ मानेंगे तो उसे इन छहों पदार्थों
में से ही कोई पदार्थ मानना होगा। और इन छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ