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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

उपमानप्रयोजनम् ] उपमाननिरूपणम् १०७
सैव फलम् । इदन्तु प्रत्यक्षानुमानासाध्यप्रमासाधकत्वात् प्रमाणान्तर-
मुपमानमस्ति ।
इति व्याख्यातमुपमानम् ।
प्रतीति उपमिति है। वही [ उपमान प्रमाण का ] फल है। प्रत्यक्ष तथा
अनुमान से असाध्य प्रमा का साधन होने से उपमान अलग प्रमाण है।
उपमान की इस प्रकार व्याख्या हो गई है।
वैशेषिक, सांख्य तथा योग दर्शन में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना
गया है। वाचस्पतिमिश्र ने 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' में उपमान के स्वरूप के विषय
में तीन पक्ष दिखा कर उन तीनों अवस्थाओं में उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष,
अनुमान अथवा शब्द प्रमाण में कर लिया है। परन्तु उदयनाचार्य ने संज्ञा-
संज्ञि-सम्बन्ध के ग्रहण के लिए उपमान को आवश्यक माना है। हमने अपनी
दर्शनमीमांसा में उपमान का निरूपण इस प्रकार किया है।
प्रसिद्धार्थस्य साधर्म्यादप्रसिद्धप्रसाधनम् ।
उपमितिर्हेतुस्तस्या उपमानं सादृश्यधीः ॥ १ ॥
गवयं यो न जानाति गां जानाति स्वरूपतः ।
यथा गौर्गवयोऽप्येवं तं च कश्चिद् विबोधयेत् ॥ २ ॥
वनं प्राप्तो यदा पिण्डं पश्यति गोनिभं तु सः ।
संस्मरन्नतिदेशं तु गवयं निश्चिनोति तम् ॥ ३ ॥
तत्रातिदेशवाक्यार्थं उपमानं सादृश्यधीः ।
उपमितिः संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य ग्रहस्तथा ॥ ४ ॥
उपमाने विप्रतिपत्तिं दर्शयति,
उपमानं पृथङ् मानं न्याये यत्तु प्रकीर्तितम् ।
न तत् सांख्ये न वा योगे न च वैशेषिके मतम् ॥ ५ ॥
अनुमानेऽथवा शब्दे क्वचित् प्रत्यक्षके तथा ।
अन्तर्भाव्य पृथक् तस्य प्रामाण्यं खण्डितं तु तैः ॥ ६ ॥
न्यायमतेन तदुपपादयति,
सम्बन्धस्य परिच्छेदः संज्ञायाः संज्ञिना सह ।
उपमानाद् भवेदाशु न तु शब्दादिभिस्तथा ॥ ७ ॥
तस्मादुपमानं न्याये प्रमाणन्तु पृथङ् मतम् ।
नान्तर्भावो भवेदस्य न्याय्यो न्यायनये क्वचित् ॥ ८ ॥

१०८ तर्कभाषा [ वाक्यलक्षणम्
शब्दः।
आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथाभूतस्यार्थस्योपदेष्टा पुरुषः । वाक्यं
त्वाकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमतां पदानां समूहः। अतएव 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती'
इति पदानि न वाक्यम् । परस्पराकाङ्क्षाविरहात् । 'वह्निना सिञ्चेदि'ति
न वाक्यं योग्यताविरहात् । नह्यग्निसकयोः परस्परान्वययोग्यतास्ति ।
तथाहि अग्निनेति तृतीयया सेकरूपं कार्यं प्रति करणत्वमग्नेः प्रतिपादितम् ।
न चाग्निः सेके करणीभवितुं योग्यः । तेन कार्यकारणभावलक्षणसम्बन्धे-
ऽग्निसकयोरयोग्यत्वादग्निना सिञ्चेदिति न वाक्यम् ।
एवमेकैकशः प्रहरे प्रहरे असहोच्चारितानि 'गामानय' इत्यादि पदानि
न वाक्यम् । सत्यामपि परस्पराकाङ्क्षायां सत्यामपि परस्परान्वययोग्य-
तायां परस्परसन्निध्याभावात् । यानि तु साकाङ्क्षाणि योग्यतावन्ति
सन्निहितानि पदानि तान्येव वाक्यम् । यथा—ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो
शब्दनिरूपणम्
प्रत्यक्ष, अनुमान तथा उपमान के बाद चौथा प्रमाण शब्द है । शब्द
प्रमाण में संकेतग्रह के अवसर पर अनुमान की आवश्यकता पड़ती है इसलिए
अनुमान के अनन्तर शब्द को रखा गया है । आगे शब्द प्रमाण का निरूपण
प्रारम्भ करते हैं ।
आप्त [ पुरुष के ] वाक्य [ को ] शब्द [ प्रमाण कहा जाता ] है । यथाभूत
अर्थ का उपदेश करनेवाला पुरुष आप्त [ कहलाता ] है [ और उसका वाक्य शब्द
प्रमाण है] आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पदों के समूह को वाक्य कहते
हैं । इसलिए परस्पर आकांक्षा-विरहित होने से गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी आदि
पद [ का समूह ] वाक्य नहीं है । [ इसी प्रकार ] योग्यता के अभाव होने से
अग्नि से सींचता है यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है। अग्नि और सेचन में परस्पर
अन्वय की योग्यता नहीं है [ क्योंकि ] अग्नि से इस तृतीया [ विभक्ति ] से सेचन
रूप कार्य के प्रति अग्नि की करणता प्रतिपादित की है और अग्नि-सेचन का
करण होने योग्य नहीं है । इसलिए सेचन और अग्नि के कार्य-कारणभाव रूप
सम्बन्ध के अयोग्य होने से अग्नि से सींचता है। यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है।
इसी प्रकार एक एक करके प्रहर-प्रहर के बाद अलग-अलग उच्चारित 'गाय को
ले आओ' इत्यादि पद [ समूह ] वाक्य नहीं है। [ उनमें ] परस्पर अन्वय की
आकांक्षा रहते हुए भी और परस्पर अन्वय की योग्यता होते हुए भी परस्पर
सन्निधि न होने से [ वे वाक्य नहीं कहलाते हैं ] जो आकांक्षा युक्त, योग्यता
युक्त, और सन्निधि युक्त पद हैं वे ही वाक्य [ कहलाते ] हैं। जैसे स्वर्ग की इच्छा

आकाङ्क्षादयः ] शब्दनिरूपणम् १०६
यजेत्-इत्यादि । यथा च-नदीतीरे पञ्चफलानि सन्ति-इति । यथा च
तान्येव गामानय-इत्यादिपदान्यविलम्बितोच्चरितानि ।
नन्वत्रापि न पदानि साकाङ्क्षाणि किन्त्वर्थाः फलादीनामाधेयानां
तीराद्याधाराकाङ्क्षितत्वात् । न च विचार्यमाणेऽर्था अपि साकाङ्क्षाः ।
आकाङ्क्षाया इच्छात्मकत्वेन चेतनधर्मत्वात् ।
सत्यम् । अर्थास्तावत् स्वपदश्रोतर्यन्त्योन्यविषयाकाङ्क्षाजनकत्वेन
साकाङ्क्षा इत्युच्यन्ते । तद्द्वारेण तत्प्रतिपादकानि पदान्यपि साकाङ्क्षाणी-
त्युपचर्यन्ते । यद्वा पदान्येवार्थान् प्रतिपाद्यार्थान्तरविषयाकाङ्क्षाजनकानी-
त्युपचारात् साकाङ्क्षाणि । एवमर्थाः साकाङ्क्षाः परस्परान्वययोग्याः ।
तद्द्वारेण पदान्यपि परस्परान्वययोग्यानीत्युच्यन्ते ।
रखनेवाला ज्योतिष्टोम [ नामक ] याग करे, इत्यादि [ वैदिक वाक्य ] । और जैसे
नदी तीर पर पाँच फल [ के वृक्ष ] हैं, यह [ लौकिक वाक्य है ] । और जैसे
अविलम्ब से उच्चरित वही 'गाय को ले आओ' इत्यादि पद [ वाक्य हो जाते हैं ] ।
[ प्रश्न ] यहां [ वाक्य के उदाहरणों में ] भी पद आकांक्षा युक्त नहीं हैं
किन्तु फलादि आधेयों [ रूप अर्थों ] को तीरादि आधार [ रूप अर्थ ] की
आकांक्षा होने से, अर्थ ही आकांक्षा युक्त हैं । और [ वास्तव में ] विचार करने
पर आकांक्षा के इच्छात्मक, अतः चेतन [ आत्मा ] का धर्म होने से अर्थ भी
साकांक्ष नहीं है [ इसलिए आकांक्षा को पद का विशेषण कहना उचित नहीं है ।
यह पूर्वपक्ष हुआ । इसका उत्तर आगे देते हैं ]
[ उत्तर ] ठीक है [ आकांक्षा साक्षात् पदों में नहीं रहती किन्तु ] अर्थ अपने
[ वाचक ] पद को सुनने वाले [ के मन ] में एक दूसरे [ पद ] के विषय में
आकांक्षा के जनक होने से [ परम्परया ] साकांक्ष कहलाते हैं । उन [ अर्थों ]
के द्वारा उनके प्रतिपादक पद भी [ परम्परया ] उपचार से साकांक्ष कहे जाते हैं ।
अथवा पद ही अर्थों का प्रतिपादन कर के दूसरे अर्थों के विषय में आकांक्षा को
उत्पन्न करते हैं इसलिए उपचार [ गौण रूप ] से साकांक्ष कहे जाते हैं । इसी प्रकार
[ परम्परा से ] अर्थ [ भी ] साकांक्ष परस्पर अन्वययोग्य [ योग्यताविशिष्ट ]
होते हैं और उनके द्वारा पद भी परस्पर अन्वय योग्य कहलाते हैं । [ अर्थात्
योग्यता और आकांक्षा यह दोनों धर्म यद्यपि साक्षात् पदों के धर्म नहीं हैं । योग्यता
साक्षात् पदार्थ का धर्म, और आकांक्षा साक्षात् आत्मा का धर्म है फिर भी उपर्युक्त
प्रकार से उपचार से वह दोनों, पदों के धर्म हो सकते हैं । ऐसा मान कर ही वाक्य
के लक्षण में योग्यता और आकांक्षा को पद का विशेषण बनाया है ] ।

११० तर्कभाषा [ पदलक्षणम्
सन्निहितत्वं तु पदानामेकेनैव पुंसा अविलम्बेनोच्चरितत्वम् । तच्च
साक्षादेव पदेषु सम्भवति नार्थद्वारा ।
तेनाऽयमर्थः सम्पन्नः । अर्थप्रतिपादनद्वारा श्रोतुः पदान्तरविषया
मर्थान्तरविषयां वाकाङ्क्षां जनयतां प्रतीयमानपरस्परान्वययोग्यार्थप्रतिपाद-
कानां सन्निहितानां पदानां समूहो वाक्यम् ।
पदं च वर्णसमूहः । समूहश्चात्र एकज्ञानविषयीभावः । एवं च वर्णानां
क्रमवतामाशुतरविनाशित्वेन एकदाऽनेकवर्णानुभवासम्भवात् पूर्वपूर्ववर्णा-
ननुभूय, अन्त्यवर्णश्रवणकाले पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहकृतेन
अन्त्यवर्णसम्बन्धेन पदव्युत्पादनसमयग्रहानुगृहीतेन श्रोत्रेणैकदैव सदसद-
नेकवर्णावगाहिनी पदप्रतीतिर्जन्यते, सहकारिदाढर्यात् प्रत्यभिज्ञानवत् ।
प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षे ह्यतीतापि पूर्वावस्था स्फुरत्येव । ततः पूर्वपूर्वपदानुभव-
जनितसंस्कारसहकृतेनान्त्यपदविषयेण श्रोत्रेन्द्रियेण पदार्थप्रत्ययानुगृहीते-
नानेकपदावगाहिनी वाक्यप्रतीतिः क्रियते ।
एक ही पुरुष द्वारा पदों का अविलम्ब से उच्चरितत्व सन्निधि [कहलाती] है ।
और वह पदों में साक्षात् ही हो सकती है अर्थ द्वारा [मानने की आवश्यकता] नहीं ।
इस लिए [ वाक्य के लक्षण का ] यह अर्थ हुआ कि, अर्थ प्रतिपादन द्वारा
अन्य पदों अथवा अन्य अर्थों के विषय में श्रोता की आकांक्षा को पैदा करने वाले
और प्रतीयमान [ स्पष्ट रूप से ] परस्पर अन्वययोग्य अर्थ के प्रतिपादक सन्निधि
युक्त पदों का समूह वाक्य [ कहलाता ] है ।
और वर्णसमुदाय पद [ कहलाता ] है । समूह [ का अर्थ ] यहां [ पद के
लक्षण में] 'एक ज्ञान का विषय होना' है। इस प्रकार क्रमिक और क्षणिक [आशु-
तर विनाशी ] अनेक वर्णों का एक साथ अनुभव असम्भव होने से पूर्व पूर्व वर्णों
का अनुभव करके अन्तिम वर्ण के श्रवण काल में पूर्व पूर्व वर्णों के अनुभव से
जनित संस्कारसहकृत, पद-व्युत्पादनसमयग्रह से अनुगृहीत, अन्त्यवर्ण-सम्बद्ध
श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यभिज्ञा के समान सहकारी [ संस्कार ] के प्राबल्य से, सत्
[ अन्तिम वर्ण ] और असत् पूर्व वर्णों का अवगाहन करने वाली पद की
प्रतीत होती है । प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष [ 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि ] में अतीत
पूर्वावस्था भी [ जो 'सः' पद से सूचित होती है ] प्रतीत [ स्फुरित ] होती ही है ।
[ इसी प्रकार सदसदनेक वर्णों की प्रतीति भी एक साथ हो सकती है ] । उस
[ पदप्रतीति ] के बाद [ उसी क्रम से ] पूर्व पूर्व पदानुभव-जनित संस्कार-सह-
कृत, पदार्थबोध से अनुगृहीत अन्त्यपदविषयक श्रोत्रेन्द्रिय से [ सदसद् ] अनेक
पदों को ग्रहण करने वाली [ पदसमूहात्मक ] वाक्य की प्रतीति होती है ।

शब्दे टिप्पण्यः ] शब्दनिरूपणम् १११
तदिदं वाक्यमाप्तपुरुषेण प्रयुक्तं सच्छब्दनामकं प्रमाणम् । फलन्त्वस्य
वाक्यार्थज्ञानम् । तच्चैतच्छब्दलक्षणं प्रमाणं लोके वेदे च समानम् ।
लोके त्वयं विशेषो यः कश्चिदेवाप्तो भवति, न सर्वः । अतः किञ्चिदेव
लौकिकं वाक्यं प्रमाणं, यदाप्तवक्तृकम् । वेदे तु परमाप्तश्रीमहेश्वरेण कृतं
सर्वमेव वाक्यं प्रमाणं, सर्वस्यैवाप्तवाक्यत्वात् ।
यही वाक्य आप्त पुरुष से प्रयुक्त होने पर शब्द नामक प्रमाण [कहा जाता]
है । और इसका फल वाक्यार्थज्ञान होता है । यह शब्द प्रमाण लोक तथा वेद
में [ दोनों जगह ] समान है । लोक में इतनी विशेषता है कि कोई कोई पुरुष ही
आप्त होता है सब नहीं । इसलिए कोई कोई लौकिक वाक्य ही प्रमाण होता है
जो कि आप्त पुरुष द्वारा कहा हुआ होता है । वेद में परम आप्त परमात्मा से
कृत सब ही वाक्य प्रमाण हैं । सब ही [ वाक्यों ] के आप्त वाक्य होने से ।
१-वैशेषिक मत—
न्याय दर्शन में प्रत्यक्षादि चार प्रमाण माने हैं परन्तु न्याय के 'समानतंत्र'
कहलाने वाले वैशेषिक दर्शन ने केवल दो ही प्रमाण माने हैं । प्रत्यक्ष और
अनुमान । इनके अतिरिक्त उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और
अभाव इन छहों प्रमाणों का वैशेषिक दर्शन ने अनुमान में ही अन्तर्भाव किया
है । यों तो बौद्धों ने भी प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं और
चार्वाक ने केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण माना है । परन्तु वैशेषिक दर्शन तो आस्तिक
दर्शन है । 'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः' की प्रतिज्ञा से इस दर्शन का आरम्भ
हुआ है और 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' । यह वैशेषिक दर्शन का तृतीय
सूत्र है, जिसमें वेद के प्रामाण्य का स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है । फिर भी
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में शब्द को अलग प्रमाण न मान कर
उसका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है यह आश्चर्य की बात है । शब्द का
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हुए प्रशस्तपाद भाष्य में लिखा है—
'शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्या-
सन्दिग्धलिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादि-
१ वै० १,१,१ । २ वै० १,१,३ ।

११२ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
भ्योऽपीति । श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, तद्वचनादाम्ना-
यप्रामाण्यम् । लिङ्गाच्चानित्यो बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे, बुद्धिपूर्वो ददातिरि-
त्युक्तत्वात्¹ ।'
शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव समानविधि के कारण किया गया है । जैसे
अनुमान में १ व्याप्तिग्रह, २ लिङ्गज्ञान, ३ व्याप्तिस्मृति, के बाद, ४ अनुमिति
उत्पन्न होती है। इसी प्रकार शब्द प्रमाण में १ संकेतग्रह, २ वाक्यश्रवण,
३ पदार्थस्मृति के बाद, ४ शाब्दबोध होता है। इसलिए अनुमान तथा शब्द
की विधि समान होने से वैशेषिक दर्शन ने शब्द का अनुमान में ही अन्तर्भाव
मान लिया है।
वैशेषिक दर्शन ने न केवल शब्द प्रमाण का अन्तर्भाव अनुमान में
किया है अपितु श्रुति तथा स्मृति रूप आम्नाय को भी अनित्य और 'वक्तृ-
प्रामाण्याधीनप्रामाण्य' माना है। 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' और
'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे' इन सूत्रों से वेद की अनित्यता और परतः
प्रामाण्य का प्रतिपादन किया है। इस प्रकार वैशेषिक दर्शन ने वेद को '
मीमांसा के स्वतः प्रामाण्य के स्थान पर 'तद्वचनात् प्रामाण्य' मानकर परतः
प्रमाण माना है। और न्याय जो शब्द को स्वतंत्र प्रमाण मानता है उसके
स्थान पर शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया है। यह उसका मीमांसा
और न्याय दोनों से भेद है।
२-प्रभाकर-सम्मत मीमांसक-मत-
मीमांसकों में कुमारिल भट्ट तथा प्रभाकर के अनुयायी दो अलग-अलग
सम्प्रदाय हैं। इनमें से प्रभाकर-सम्प्रदाय के अनुयायी शालिकनाथ मिश्र आदि
भी वैशेषिक के समान शब्द प्रमाण का अनुमान में अन्तर्भाव करते हैं। परन्तु
उनमें भेद यह है कि वह वैदिक वाक्यों को तो अलग शब्द प्रमाण मानते हैं
परन्तु लौकिक वाक्यों को अलग शब्द प्रमाण नहीं मानते हैं। उनका अभिप्राय
यह है कि शब्द प्रमाण का फल 'पदार्थ-संसर्गबोध' रूप शाब्दबोध है। लौकिक
वाक्यों में प्रामाण्य के लिए 'आप्तोक्तत्व' का ज्ञान आवश्यक है। आप्त पुरुष
वही है जिसको कहे जानेवाले वाक्य के अर्थ का यथार्थ ज्ञान हो। इसलिए
'पदार्थ-संसर्ग' रूप 'वाक्यार्थ' वक्ता के ज्ञान के अन्तर्गत हो जाता है और उसका
ज्ञान अनुमान द्वारा हो सकता है। इसलिए लौकिक वाक्य को शब्द प्रमाण
नहीं कहा जा सकता। वह तो अनुमान द्वारा गृहीत 'पदार्थ-संसर्ग' का अनुवादक
मात्र ही हो सकता है। परन्तु वैदिक वाक्य के अपौरुषेय होने के कारण उनमें
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० १०७ । २ वै० १,१।१ ३ वै० ६, १, १ ।

शब्दे टिप्पणयः ] शब्दनिरूपणम् ११३
'आप्तोक्तत्व' ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वैदिक वाक्य प्रमाण ही
है। यह प्रभाकर सम्प्रदाय का मत है। न्यायकुसुमाञ्जलिकार श्री उदयनाचार्य
ने इस विषय में दो कारिकाएँ लिख कर इस पक्ष का खण्डन किया है।
प्राभाकरास्तु, वेदस्यापौरुषेयतया तत्र वक्तृज्ञानानुमानासम्भवात् शब्दः
प्रमाणम् । लोके त्वाप्तोक्तत्वज्ञानमपेक्षितम् । तथा च 'अयं वक्ता स्वप्रयुक्तवाक्यार्थ-
यथार्थज्ञानवान्, भ्रमाद्यजन्यवाक्यार्थज्ञानजन्यवाक्यप्रयोक्तृत्वात्' इत्यनुमानाद्
वक्तृज्ञानावच्छेदकतया, उत्तरकालं वा 'एते पदार्थाः परस्परं संसृष्टा वक्तृयथार्थ-
ज्ञानविषयत्वात्' इत्यनुमानात्साक्षाद् वाक्यार्थसिद्धेः, कॢप्तसामर्थ्यात् शब्दा-
त्पुनरन्वयधीरित्यनुवादको लौकिकः शब्दो न प्रमाणमिति प्राहुः ।
तन्नाह—
निर्णीतशक्तेर्वाक्याद्धि प्रागेवार्थस्य निर्णये ।
व्याप्तिस्मृतिविलम्बेन लिङ्गस्यैवानुवादिता ॥
व्यस्तपुंदूषणाशङ्कैः स्मारितत्वात् पदैरमी ।
अन्विता इति निर्णीते वेदस्यापि न तत्कुतः १॥
पूर्वपक्षी प्रभाकर पदार्थसंसर्ग का बोध पहिले अनुमान की प्रक्रिया से और पीछे
शब्द की प्रक्रिया से मान कर शब्द को 'अनुवादक' और अनुमान को 'प्रमाण'
कहना चाहते हैं। उत्तर पक्ष का कहना यह है कि अनुमान की प्रक्रिया में
व्याप्ति स्मृति में विलम्ब होगा और शब्द की प्रक्रिया से वैदिक वाक्यों में
'संसर्गबोध की शक्ति निर्णीत हो चुकी है। अतः निर्णीतशक्तिक वाक्य से पहिले
'संसर्ग' का बोध हो जायगा और अनुमान की प्रक्रिया से विलम्ब से संसर्ग
का बोध होगा, इसलिए अनुमान ही 'अनुवादक' है। और यदि इस पर भी
लौकिक वाक्य को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं तो फिर वैदिक वाक्यों में भी
'अमी वैदिकाः पदार्थाः परस्परं संसर्गवन्तः, व्यस्तपुन्दूषणाशङ्कैः पदैः स्मारि-
तत्वात्' इस अनुमान से पहिले संसर्ग का निर्णय हो जाने से वैदिक वाक्य
को भी 'अनुवादक' मानना होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि या तो लौकिक
और वैदिक दोनों प्रकार के वाक्यों को 'अनुवादक' मानो और या फिर दोनों
को प्रमाण मानो। प्रभाकर जो केवल वैदिक वाक्यों को 'प्रमाण' और लौकिक
वाक्यों को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं उनका यह 'अर्धजरतीय न्याय'
ठीक नहीं है।
३—अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद—
'पदार्थ-संसर्ग बोध' को 'वाक्यार्थ' कहते हैं यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है।
परन्तु इस 'संसर्गबोध' के विषय में भी मीमांसकों में कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर
१ न्यायकुसुमाञ्जलि ३, १४, १५ हरिदासीय विवृतिः ।
८ त० भा०

११४ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
वर्णितानि चत्वारि प्रमाणानि । एतेभ्योऽन्यन्न प्रमाणम्, प्रमाणस्य
सतोऽत्रैवान्तर्भात् ।
दोनों के अलग अलग मत पाए जाते हैं । जिनको क्रमशः 'अभिहितान्वयवाद'
और 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं। कुमारिल भट्ट 'अभिहितान्वयवाद' के
मानने वाले हैं । उनके अनुसार वाक्य को सुनने पर पहिले 'अभिधा' शक्ति
द्वारा पदों से पदार्थों की प्रतीति होती है । और उसके बाद उन पदार्थों का
परस्पर सम्बन्ध 'तात्पर्याशक्ति' द्वारा होता है। पहिले पदार्थ 'अभिहित' अर्थात्
अभिधा शक्ति से बोधित होते हैं और पीछे उनका 'अन्वय' या परस्पर संसर्गबोध
होता है । इसीको 'अभिहितान्वयवाद' कहते हैं । कुमारिल भट्ट इसी सिद्धान्त
को माननेवाले हैं और उनके मत में 'तात्पर्याशक्ति' भी अलग मानी जाती है ।
इसके विपरीत प्रभाकर के मत में अभिधा शक्ति से 'केवल' पदार्थों की
नहीं, अपितु 'अन्वित' पदार्थों की ही उपस्थिति होती है । क्योंकि अभिधाशक्ति
के लिए आवश्यक, सङ्केत का ग्रहण 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु 'अन्वित
पदार्थ में ही होता है।' सङ्केत का ग्राहक मुख्यतः 'व्यवहार' है। और
'व्यवहार' 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु किसी दूसरे के साथ सम्बद्ध या अन्वित
पदार्थ में ही होता है । इसलिए 'सङ्केतग्रह' भी किसी 'अन्वित' पदार्थ में ही
हो सकता है । इसीलिए अभिधा शक्ति से अन्वित अर्थ ही अभिहित हो सकता
है, 'केवल' पदार्थ नहीं । इसी को 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं । इस मत
में पदार्थों का संसर्गबोध करानेवाली 'तात्पर्या' शक्ति की अलग आवश्यकता
नहीं पड़ती है ।
चारों प्रमाणों का वर्णन हो गया । इनसे अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं
है । प्रमाणभूत [ अन्य सब ] का इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाने से [ केवल चार
ही प्रमाण हैं ] ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में लिखा है—
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव तार्किकाश्च चतुष्टयम् ॥
पंच प्राभाकरा, भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणानि ब्रुवन्ति वै ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अर्थापत्तिखण्डनम् ] अर्थापत्तिनिरूपणम् ११५
अर्थापत्तिः
नन्वर्थापत्तिरपि पृथक् प्रमाणमस्ति । अनुपपद्यमानार्थदर्शनात् तदु-
पपादकीभूतार्थान्तरकल्पनम् ‘अर्थापत्तिः’ । तथाहि, पीनो देवदत्तो दिवा
न भुङ्क्ते इति दृष्टे श्रुते वा रात्रिभोजनं कल्प्यते । दिवाऽभुञ्जानस्य
पीनत्वं रात्रिभोजनमन्तरेण नोपपद्यतेऽतः पीनत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता-
र्थापत्तिरेव रात्रिभोजने प्रमाणम् । तच्च प्रत्यक्षादिभ्यो भिन्नं, रात्रिभोज-
नस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वात् ।
नैतत् । रात्रिभोजनस्यानुमानविषयत्वात् । तथाहि, अयं देवदत्तो
अर्थापत्तिः
नैयायिक लोग प्रत्यक्षादि चार ही प्रमाण मानते हैं । शेष प्रमाणों का
अन्तर्भाव इन्हीं चार प्रमाणों में कर लेते हैं । इन शेष प्रमाणों में 'अर्थापत्ति'
और 'अभाव' ये दोनों मुख्य प्रमाण हैं । इसलिए इन दोनों का अन्तर्भाव
दिखलाने का प्रयत्न तर्कभाषाकार ने किया है । शेष 'ऐतिह्य' और 'सम्भव' का
अन्तर्भाव बहुत स्पष्ट है और वे प्रमाण भी मुख्य नहीं हैं इसलिए उनका अन्त-
र्भाव तर्कभाषाकार ने नहीं दिखाया है । आगे 'अर्थापत्ति' का 'केवलव्यतिरेकी'
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हैं । मीमांसक और वेदान्ती आदि जो लोग
अर्थापत्ति को पृथक प्रमाण मानते हैं वे अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद नहीं
मानते हैं । और नैयायिक अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद मानते हैं
इसलिए वह 'अर्थापत्ति' को अलग प्रमाण नहीं मानते हैं । इसीलिए 'अर्था-
पत्ति' का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं ।
[ पूर्वपक्षी प्रश्न ] अच्छा, अर्थापत्ति भी तो पृथक् प्रमाण है । [ उसका
लक्षण ] अनुपद्यमान अर्थ को देखकर उसके उपपादक अर्थ की कल्पना करना
अर्थापत्ति [ कहलाती ] है । जैसे कि देवदत्त दिन में नहीं खाता है परन्तु मोटा
है ऐसा देखने या सुनने पर [ उसके ] रात्रिभोजन की कल्पना कर ली जाती है ।
[ क्योंकि ] दिन में न खाने वाले का मोटा होना रात्रिभोजन के बिना नहीं बन
सकता है । इसलिए अन्यथा [ अर्थात् रात्रि भोजन के बिना ] पीनत्व की अनुप-
पत्ति ही [ उसके ] रात्रि भोजन में प्रमाण होती है । और वह [ अर्थापत्ति ]
प्रमाण रात्रि भोजन के प्रत्यक्षादि का विषय न होने से प्रत्यक्षादि से भिन्न
[ अलग ही प्रमाण ] है ।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है । रात्रि भोजन के अनुमान का विषय [ अनुमान
गम्य ] होने से [ अर्थापत्ति को अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ]

११६ तर्कभाषा [ अर्थपत्तिखण्डनम्
रात्रौ भुङ्क्ते दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात् । यस्तु न रात्रौ भुङ्क्ते
नासौ दिवाऽभुञ्जानत्वे सति पीनो, यथा दिवा रात्रौ चाऽभुञ्जानोऽपीनो,
न चायं तथा, तस्मान्न तथेति केवलव्यतिरेक्यनुमानेनैव रात्रिभोजनस्य
प्रतीयमानत्वात् । किमर्थमर्थापत्तिः पृथक्त्वेन कल्पनीया ।
क्योंकि [ अनुमान की प्रक्रिया में ] यह देवदत्त रात्रि में खाता है [ यह प्रतिज्ञा
हुई ] दिन में न खाने पर भी मोटा होने से [ यह हेतु हुआ ] । जो रात्रि में नहीं
खाता है वह दिन में न खाने पर मोटा नहीं होता । जैसे दिन और रात्रि में न
खानेवाला [ नवरात्रोपवासी पुरुष ] दुबला [ होता ] है। [ यह व्यतिरेक व्याप्ति
और उसका उदाहरण हुआ ] यह देवदत्त वैसा [ नवरात्रोपवासी के समान
दुर्बल ] नहीं है [ यह उपनय हुआ ] इसलिए वैसा [ दिन और रात में भोजन न
करने वाला ] नहीं है [ अर्थात् रात्रि में भोजन करता है यह निगमन हुआ ]
इस प्रकार केवल व्यतिरेकी अनुमान से ही रात्रि भोजन के प्रतीत हो जाने से
अर्थापत्ति को अलग प्रमाण क्यों माना जाय ।
हमने अपनी दर्शन मीमांसा में लिखा है—
अनुपपद्यमानार्थादुपपादककल्पना ।
अर्थापत्तिर्द्विधा प्रोक्ता श्रुतदृष्टप्रभेदतः ॥१॥
पीनोऽयं देवदत्तस्तु नैव भुङ्क्ते दिवा च सः ।
इति दृष्टे श्रुते वापि कल्प्यते रात्रिभोजनम् ॥२॥
अतो वेदान्तिनश्चैव तथा मीमांसकावुभौ ।
अर्थापत्तिं पृथक्त्वेन प्रमाणं ब्रुवते परम् ॥३॥
अनियम्यस्य नायुक्तिर्नानियन्तोपपादकः ।
इति कृत्वानुमानेन गृह्यते रात्रिभोजनम् ॥४॥
ततश्च भिद्यते नेयं केवलव्यतिरेकिणः ।
अन्तर्भूताऽनुमानेऽतो न्याये मानान्तरं न सा ॥५॥
विषयव्यवस्थार्थं च मानयोस्तु विरुद्धयोः ।
अर्थापत्तिः पृथङ् मानं मीमांसकमते मता ॥६॥
न मानयोर्विरोधोऽस्ति विरोधे वा न मानता ।
इति तस्याः प्रमाणत्वं नैवमप्युपपद्यते ॥७॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् ११७
अभावः
नन्वभावाख्यमपि पृथक् प्रमाणमस्ति । तच्चाभावग्रहणायाङ्गीकर-
णीयम् । तथाहि घटाद्यनुपलब्ध्या घटाद्यभावो निश्चीयते । अनुपलब्धि-
श्चोपलब्धेरभावः । इत्यभावप्रमाणेण घटाद्यभावो गृह्यते ।
नैतत् । यद्यत्र घटोऽभविष्यत्तर्हि भूतलमिवादृक्ष्यदित्यादितर्कसहका-
रिणाऽनुपलम्भसनाथेन प्रत्यक्षेणैवाभावग्रहणात् ।
नन्विन्द्रियाणि सम्बद्धार्थग्राहकाणि । तथाहीन्द्रियाणि वस्तुप्राप्य-
प्रकाशकारीणि ज्ञानकारणत्वादालोकवत् ।
अभाव निरूपण
[ प्रश्न ] 'अभाव' [ नामक प्रमाण ] भी अलग प्रमाण है। और अभाव के
ग्रहण करने के लिए उस [ अनुपलब्धि अथवा अभाव नामक प्रमाण ] को स्वीकार
करना चाहिए। क्योंकि घटादि की अनुपलब्धि से घटादि के अभाव का ग्रहण
होता है।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है यदि यहाँ घड़ा होता तो भूतल के समान
दिखाई देता। इस प्रकार के तर्क से सहकृत अनुपलब्धि युक्त प्रत्यक्ष प्रमाण से
ही अभाव का ग्रहण होने से [ अभाव के ग्रहण के लिए अलग अनुपलब्धि
अथवा अभाव प्रमाण के मानने की आवश्यकता नहीं है। ]
[ प्रश्न ] इन्द्रियां [ तो ] संबद्ध अर्थ की ग्राहक होती हैं। जैसा कि [ निम्नां-
कित अनुमान से सिद्ध होता है ] इन्द्रियां वस्तु को प्राप्त कर ] वस्तु से संबद्ध
होकर ही अर्थ का ] प्रकाशित करने वाली हैं ज्ञान का करण होने से
प्रकाश के समान ।
वेदान्तियों के मत में घटाभाव, पटाभाव आदि अभावों के साथ इन्द्रिय
का कोई सम्बन्ध सम्भव न होने से प्रत्यक्ष अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता
है। इसलिए वे अभाव के ग्रहण के लिए 'अभाव' या 'अनुपलब्धि' नामक
एक पृथक् प्रमाण मानते हैं। परन्तु नैयायिक अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष प्रमाण
द्वारा ही मानते हैं। अतः अभाव को पृथक् प्रमाण मानने का खण्डन करने
के लिए इस प्रकरण को प्रारम्भ करते हैं।
आलोक ज्ञान का करण है और वस्तुओं के साथ संबद्ध होकर ही उनको
प्रकाशित करता है। इसी प्रकार इन्द्रियां भी ज्ञान का करण होने से आलोक
के समान वस्तु के साथ संबद्ध होकर ही उसको प्रकाशित कर सकती हैं। अथवा
घ्राण, रसना और त्वक् इन तीन इन्द्रियों के विषय में तो सभी इस बात में एक
मत हैं कि ये इन्द्रियाँ वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही अपने अर्थ को प्रकाशित
करती हैं। विवाद केवल चक्षु और श्रोत्र के विषय में है। बौद्ध लोग चक्षु, श्रोत्र

११८ तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
यद्वा चक्षुःश्रोत्रे वस्तुप्राप्यप्रकाशकारिणी बहिरिन्द्रियत्वात् त्वगादि-
वत् । त्वगादीनान्तु प्राप्यप्रकाशकारित्वमुभयवादिसिद्धमेव ।
न चेन्द्रियाभावयोः सम्बन्धोऽस्ति संयोगसमवायौ हि सम्बन्धौ, न
च तौ तयोः स्तः । द्रव्ययोरेव संयोग इति नियमात् । अभावस्य च
द्रव्यत्वाभावात् । अयुतसिद्धयभावान्न समवायोऽपि ।
तथा मन को प्राप्य प्रकाशकारी नहीं मानते हैं । '१अप्राप्तान्यक्षिमनःश्रोत्राणि
त्रयमन्यथा' । २जैन लोग केवल चक्षु को छोड़ कर शेष चार को प्राप्यकारी
मानते हैं । साँख्य, न्याय, ५वैशेषिक तथा मीमांसा६ आदि सभी वैदिक दर्शन
अपनी अपनी प्रक्रिया के अनुसार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्यकारी मानते हैं ।
अन्तरिन्द्रिय मनको केवल सांख्य, योग७, और वेदान्त ही प्राप्यकारी मानते हैं ।
शेष वैदिक दर्शन, बौद्ध तथा जैनदर्शन मनको अप्राप्यकारी ही मानते हैं ।
यहाँ बहिरिन्द्रियों की चर्चा बौद्धों के मत के खण्डन के लिए की है । चक्षु से
जिस घटादि अर्थ का प्रत्यक्ष होता है वह चक्षु से दूर होता है और श्रोत्र से
जिस शब्द का ग्रहण होता है उसकी उत्पत्ति भी दूर होती है । इसलिए सब
इन्द्रियों के बजाय इन्हीं दो इन्द्रियों को पक्ष बना कर दूसरा अनुमान करते हैं।
अथवा चक्षु और श्रोत्र [ ये दोनों इन्द्रियां ] वस्तु के साथ सम्बद्ध होकर ही
[ वस्तु ] का प्रकाश करने वाली हैं बहिरिन्द्रिय होने से त्वगादि [ अन्य बहिरि-
न्द्रियों ] के समान । त्वगादि [ अन्य तीन बहिरिन्द्रियों ] का वस्तु प्राप्य
प्रकाशकारित्व तो दोनों वादियों को स्वीकृत ही है [ इन्हीं के समान चक्षु और
श्रोत्र का भी वस्तु के साथ सम्बद्ध होना प्रत्यक्ष में आवश्यक है । ]
[ परन्तु ] इन्द्रिय और अभाव का [ कोई भी ] सम्बन्ध नहीं [ हो सकता ]
है । [ क्योंकि संसार में ] संयोग और समवाय [ दो ही ] सम्बन्ध हैं और उन
दोनों [ अर्थात् इन्द्रिय और अभाव ] के वे दोनों [ संयोग या समवाय सम्बन्ध ]
नहीं हैं । [ क्योंकि ] संयोग दो द्रव्यों का ही होता है यह नियम होने से । और
अभाव के द्रव्य नहीं होने से [ इन्द्रिय के द्रव्य होते हुए भी उसके दूसरे सम्बन्धी
अभाव के द्रव्य न होने से इन्द्रिय-चक्षु-का अभाव के साथ संयोग सम्बन्ध नहीं
हो सकता है । और समवाय सम्बन्ध अयुतसिद्धों का ही होता है । अयुतसिद्ध
भी पांच परिगणित हैं उनमें भी अभाव की गणना नहीं है इसलिए ] अयुतसिद्ध
न होने से समवाय सम्बन्ध भी नहीं है ।
१ अभिधर्म० २,४३ । २ आव० नि० श० । ३ सां० सू० १,८० ।
४ सू० २,१,३३-५२ । ५ कन्दली पृ० ३३ । ६ शा० भा० १,१,१३ ।
७ योग भा० १,७

सम्बन्धलक्षणम् ] अभावनिरूपणम् ११६
संयोग और समवाय ये ही दो सम्बन्ध हैं। इन्द्रिय का अभाव के साथ
उनमें से एक भी सम्बन्ध नहीं बनता। इसलिए इन्द्रिय का अभाव के साथ
कोई सम्बन्ध नहीं है। बिना इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है
इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता है। अतएव अभाव
के ग्रहण के लिए अभाव नामक अलग प्रमाण मानना चाहिये यह पूर्व पक्ष
का आशय है।
जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है नैयायिक के मत में 'अभावसमवायौ
च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः'के अनुसार अभाव के ग्रहण में इन्द्रिय और अभाव
का 'विशेष्यविशेषणभाव' सम्बन्ध होता है। इसलिए पूर्वपक्षी 'विशेष्यविशेषण-
भाव' के सम्बन्धत्व का ही खण्डन करता है। उसका कहना है कि 'विशेष्य-
विशेषणभाव' में सम्बन्ध का लक्षण ही नहीं घटता है इसलिए उसको सम्बन्ध
नहीं कहा जा सकता है। सम्बन्ध के लक्षण में तीन बातें आवश्यक हैं।
'सम्बन्धो हि १ सम्बन्धिभ्यां भिन्नः, २ उभयाश्रितः, ३ एकश्च'। अर्थात् सम्बंध
को १ सम्बन्धियों से भिन्न, २ उभयाश्रित और ३ एक होना चाहिये। जैसे घट
और पट का संयोग होता है। इस संयोग में घट और पट दोनों सम्बन्धी हुए और
'संयोग' उनका 'सम्बन्ध' हुआ। यह संयोग सम्बन्ध अपने सम्बन्धी घट और
पट दोनोंसे भिन्न है। घट और पट दोनों 'द्रव्य' हैं परंतु संयोग 'गुण' है। इसलिए
'संयोग' रूप 'गुण' अपने 'द्रव्य' रूप 'सम्बन्धियों'से भिन्न है। वह संयोग घट और
पट दोनोंमें रहता है इसलिए उभयाश्रित हुआ। और उभयाश्रित होनेसे ही एक
भी है। घट का पट के साथ जो संयोग है पटका घट के साथ भी वही संयोग
है। यहां दो संयोग नहीं हैं। इस प्रकार संयोग 'सम्बन्ध'में सम्बन्ध के लक्षण
के तीनों अंश घट जाते हैं। इसलिए संयोग को 'सम्बन्ध' कहना उचित है।
इसी प्रकार तन्तु और पट का 'समवाय' सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भी
'सम्बन्ध'का लक्षण घट जाता है। क्योंकि यहाँ तन्तु और पट दोनों 'सम्बन्धी'
हैं। और दोनों 'द्रव्य' रूप हैं। परन्तु इनका सम्बन्ध 'समवाय' कोई द्रव्य
नहीं है। उसे द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, और अभाव से भिन्न अलग
पदार्थ माना गया है। इसलिए 'समवाय' भी सम्बन्धियों से भिन्न है। और
उभयाश्रित तथा एक भी है। इसलिए समवाय में भी 'सम्बन्ध' का लक्षण घट
जाता है। अतः उसको भी 'सम्बन्ध' कहा जा सकता है।
परन्तु 'विशेष्यविशेषणभाव' में इस सम्बन्ध लक्षण के तीन अंशों में से
एक भी नहीं घटता है। सबसे पहिली बात है, 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः'। सो

१२० तर्कभाषा [ सम्बन्धलक्षणम्
‘विशेष्य विशेषण भाव’ ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ नहीं अपितु सम्बन्धिस্বরূপ है।
‘दण्डी-पुरुषः’ इस प्रतीति में दण्ड ‘विशेषण’ है और पुरुष ‘विशेष्य’ है। इन
दोनों में रहनेवाली ‘विशेषणता’ या ‘विशेष्यता’ उन दोनों के स्वरूप से अलग
कोई पदार्थ नहीं है अपितु उन दोनों का स्वरूप ही है। दण्ड में जो विशे-
षणता है वह दण्ड से अलग नहीं है बल्कि दण्ड का स्वरूपभूत है। और
पुरुष में जो ‘विशेष्यता’ है वह भी पुरुष के स्वरूप से अलग नहीं अपितु पुरुष
का स्वरूपभूत ही है। अर्थात् ‘विशेष्यता’ और विशेषणता’ को सम्बन्धियों से
अलग नहीं अपितु ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही मानना होगा। इसलिए ‘विशेष्य-
विशेषणभाव’ को ‘सम्बन्ध’ नहीं कहा जा सकता।
यदि यह पूछा जाय कि ‘विशेष्यविशेषणभाव’को ‘सम्बन्धिस্বরূপ’ ही क्यों
माना जाय सम्बन्धियों से अलग ही क्यों न मान लिया जाय। तो इसका
उत्तर यह होगा कि ‘घटाभाववद् भूतलम्’ इस प्रतीति में घटाभाव विशेषण होता
है और भूतल विशेष्य है। इसके विपरीत ‘भूतलनिष्ठः घटाभावः’ इस प्रतीतिमें
घटाभाव विशेष्य है और भूतल विशेषण है। इससे यह सिद्ध होता है कि
अभाव भी ‘विशेष्य’ तथा ‘विशेषण’ होता है। यदि ‘विशेष्यविशेषण भाव’ को
‘सम्बन्धिस্বরূপ’ न मानकर ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ माना जाय तो घटाभाव में
रहनेवाली ‘विशेष्यता’ और ‘विशेषणता’ भी घटाभाव से भिन्न कोई अन्य पदार्थ
होगी। संसार के समस्त भाव पदार्थों का वर्गीकरण द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य,
विशेष, और समवाय इन छः पदार्थों में ही किया गया है। इसलिए यह
‘विशेष्य विशेषणभाव’ यदि अलग कोई पदार्थ होगा भी तो इन्हीं छः पदार्थों
में कहीं उसका अन्तर्भाव होगा। जैसे संयोग और समवाय को सम्बन्धियों से
अलग मानने पर भी इन्हीं छः पदार्थों में उनका अन्तर्भाव होता है। संयोग
गुण में गिना जाता है और समवाय छठा पदार्थ माना जाता है। इसी प्रकार
‘विशेष्य-विशेषणभाव’ भी यदि सम्बन्धियों से भिन्न है तो, या तो द्रव्य होगा,
या गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, या समवाय में से कोई होगा। इनसे भिन्न
कोई और पदार्थ नहीं हो सकता है।
यदि ‘विशेष्यविशेषणभाव’ को द्रव्यादि में से कोई पदार्थ मान लिया जाय
तो यह आपत्ति उपस्थित होती है कि द्रव्यादि छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ
‘अभाव’ में नहीं रहता है। द्रव्यादि छहों पदार्थ किसी भाव पदार्थ में ही रह
सकते हैं। अभाव में उनमें से कोई भी पदार्थ नहीं रह सकता है। इसलिए यदि
‘विशेष्यविशेषणभाव’ को ‘सम्बन्धिभ्यां भिन्नः’ मानेंगे तो उसे इन छहों पदार्थों
में से ही कोई पदार्थ मानना होगा। और इन छहों पदार्थों में से कोई भी पदार्थ

सम्बन्धलक्षणम् ] अभावानिरूपणम् १२१
अभाव में नहीं रहता। इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' भी अभाव में नहीं रह
सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अभाव 'विशेष्य' या विशेषण नहीं हो
सकेगा। परन्तु अभाव विशेष्य भी होता है और विशेषण भी यह बात सर्वा-
नुभव सिद्ध है। परन्तु वह कब सिद्ध हो सकती है ? जब कि 'विशेष्यविशेषण-
भाव' को 'सम्बन्धस्वरूप' माना जाय । जब 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्ब-
न्धस्वरूप' मानते हैं तब तो अभाव विशेष्य और विशेषण हो सकता है।
और यदि 'विशेष्यविशेषणभाव' को 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' मानें तो अभाव न
विशेष्य हो सकता है और न विशेषण । इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को
'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' नहीं अपि तु 'सम्बन्धस्वरूप' ही मानना होगा। और
उस दशा में सम्बन्ध के लक्षण का प्रथम अंश 'सम्बन्धिभ्यां भिन्नः' के 'विशे-
ष्यविशेषणभाव' में न घटने से उसको सम्बन्ध नहीं कहा जा सकता है।
इसी प्रकार सम्बन्ध लक्षण के अवशिष्ट दो अंश भी 'विशेष्यविशेषणभाव'
में नहीं घटते हैं। दूसरा अंश है 'उभयाश्रितः' । परन्तु 'विशेष्यभाव' अथवा
'विशेषणभाव' में से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। विशेष्यभाव केवल विशेष्य
में रहता है। और विशेषणभाव केवल विशेषण में रहता है। इसलिए उनमें
से कोई भी 'उभयाश्रित' नहीं है। और जब वह अलग अलग रहते हैं तब
उनको 'एक' भी नहीं कहा जा सकता है। विशेष्यभाव अलग है जो केवल
विशेष्य में रहता है और विशेषण भाव अलग है जो कि केवल विशेषण में
रहता है।
इस प्रकार सम्बन्ध के लक्षण के तीन अंशों में से एक भी अंश विशेष्य-
विशेषणभाव में नहीं घटता है इसलिए 'विशेष्यविशेषणभाव' को सम्बन्ध नहीं
कहा जा सकता है। इसी प्रक्रिया से कार्यकारण भाव आदि अन्य समस्त
सम्बन्धों का भी खण्डन किया जा सकता है। इसलिए 'संयोग' और 'समवाय'
को छोड़ कर अन्य कोई 'सम्बन्ध' सिद्ध नहीं हो सकता है। और चक्षु आदि
इन्द्रिय का अभाव के साथ संयोग या समवाय सम्बन्ध नहीं बनता है। क्योंकि
संयोग दो 'द्रव्यों' का ही होता है और अभाव 'द्रव्य' नहीं है। तथा 'समवाय'
सम्बन्ध 'अयुतसिद्धों' का ही होता है परन्तु अभाव 'अयुतसिद्धों' में नहीं गिना
गया है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का न 'संयोग' सम्बन्ध होता है और न
'समवाय' । इन दो के अतिरिक्त 'विशेष्यविशेषणभाव' आदि और कोई 'सम्बन्ध'
ही नहीं है। इसलिए इन्द्रिय और अभाव का कोई 'सम्बन्ध' न होने से प्रत्यक्ष
प्रमाण से इन्द्रिय द्वारा अभाव का ग्रहण नहीं हो सकता । यह पूर्व पक्ष है।

१२२ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
विशेषणविशेष्यभावश्च सम्बन्ध एव न सम्भवति भिन्नोभयाश्रितै-
कत्वाभावात् । सम्बन्धो हि सम्बन्धिभ्यां भिन्नो भवत्युभयसम्बन्ध्याश्रित-
श्चैकश्च । यथा भेरीदण्डयोः संयोगः । स हि भेरीदण्डाभ्यां भिन्नस्तदु-
भयाश्रितश्चैकश्च । न च विशेषणविशेष्यभावस्तथा । तथाहिं दण्डपुरुष-
योर्विशेषणविशेष्यभावो न ताभ्यां भिद्यते । न हि दण्डस्य विशेषणत्व-
मर्थान्तरं, नापि पुरुषस्य विशेष्यत्वमर्थान्तरमपि तु स्वरूपमेव । अभाव-
स्यापि विशेषणत्वाद् विशेष्यत्वाच्च । न चाभावे कस्यचित् पदार्थस्य
द्रव्याद्यन्यतमस्य सम्भवः । तस्मादभावस्य स्वोपरक्तबुद्धिजनकत्वं
यत्स्वरूपं तदेव विशेषणत्वं, न तु पदार्थान्तरम् ।
एवं व्याप्यव्यापकत्वकारणत्वादयोऽप्यूह्याः । स्वप्रतिबद्धबुद्धिजन-
इसी का उपपादन ग्रन्थकार इस प्रकार करते हैं—
और विशेषण विशेष्य भाव [ सम्बन्धियों से ] भिन्न, उभयाश्रित और एक
न होने से सम्बन्ध ही नहीं हो सकता है । क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धियों से भिन्न
उभयाश्रित और एक होता है । जैसे भेरी और दण्ड का संयोग [सम्बन्ध है, तो]
वह भेरी और दण्ड [ दोनों सम्बन्धियों ] से भिन्न [ भेरी और दण्ड दोनों द्रव्य
हैं और संयोग गुण है इसलिए वह दोनों सम्बन्धियों से भिन्न है ] उभयाश्रित और
एक है । परन्तु विशेषण विशेष्यभाव वैसा [ अर्थात् सम्बन्धिभ्यां भिन्नः उभयाश्रितः
और एकश्च ] नहीं है । क्योंकि [ दण्डी पुरुषः इस विशिष्ट प्रतीति में क्रमशः ]
दण्ड और पुरुष का विशेषण विशेष्य भाव उन [ दण्ड और पुरुष के स्वरूप ]
से भिन्न नहीं है [ किन्तु उनका स्वरूप ही है ] । दण्ड का विशेषणत्व [ उसके
स्वरूप से भिन्न ] कोई दूसरा पदार्थ नहीं है और न तो पुरुष का विशेष्यत्व
[ उसके स्वरूप से भिन्न ] ही कोई अर्थान्तर है । किन्तु [ विशेषण और विशेष्य
भाव उन दोनों का ] स्वरूपभूत ही हैं । अभाव के भी विशेषण और विशेष्य
होने से । [ यदि विशेषण विशेष्य भाव को स्वरूप से भिन्न अलग अर्थान्तर
माना जाय तो संयोगादि के समान द्रव्यादि छः पदार्थों में ही उसका अन्तर्भाव
कहीं होगा । परन्तु ] द्रव्यादि [ छः पदार्थों से ] में से किसी एक भी पदार्थ
का अभाव में [ रहना ] सम्भव नहीं है । [ क्योंकि अभाव किसी का आश्रय
नहीं हो सकता है ] इसलिए स्व [ अर्थात् घटाभाव ] से उपरत बुद्धि [ घटा-
भावद् भूतलम् ] को उत्पन्न करना जो अभाव का स्वरूप है, वही [ स्वरूप-
भूत ] विशेषणत्व है । [ उस से भिन्न ] अर्थान्तर नहीं ।
इसी प्रकार व्याप्य व्यापक भाव और कार्य कारणत्व आदि भी [ सम्बन्धियों
से भिन्न नहीं अपितु सम्बन्धि स्वरूप ही ] समझने चाहिए । अग्नि आदि का

सम्बन्धत्वखण्डनम् ] अभावानिरूपणम् १२३
कत्वं स्वरूपमेव हि व्यापकत्वमग्न्यादीनाम् । कारणत्वमपि कार्यानुकृता-
न्वयव्यतिरेकि स्वरूपमेव हि तन्त्वादीनां, नत्वर्थान्तरमभावस्यापि
व्यापकत्वात्कारणत्वाच्च । नह्यभावे सामान्यादिसम्भवः ।
तदेवं विशेषणविशेष्यभावो न विशेषणविशेष्यस्वरूपाभ्यां भिन्नः ।
नाप्युभयाश्रितो, विशेषणे विशेषणभावमात्रस्य सत्त्वाद् विशेष्यभावस्या-
भावाद्, विशेष्ये च विशेष्यभावमात्रस्य सद्भावाद्, विशेषणभावस्याभा-
वात् । नाप्येको, विशेषणं च विशेष्यं च तयोर्भाव इति द्वन्द्वात् परं श्रूय-
माणो भावशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तथा च विशेषणभावो विशेष्य-
भावश्चेत्युपपन्नम् । द्वावेतावेकश्च सम्बन्धः तस्माद् विशेषणविशेष्यभावो
स्वप्रतिबद्ध [ अपने से संबद्ध ] बुद्धि को उत्पन्न करना ही उनका व्यापकत्व है ।
[ इसी प्रकार ] कारणत्व भी तन्त्वादि का कार्यानुकृत अन्वय व्यतिरेकिस्वरूप ही
है, अर्थान्तर नहीं । अभाव के भी व्यापक तथा कारण होने से । [ यदि व्याप्य
व्यापक भाव अथवा कार्य कारण भाव को सम्बन्धियों से भिन्न मानेंगे तो जैसा
विशेष्य विशेषण भाव के विषय में दिखाया है व्याप्य व्यापक भाव तथा कारण
कार्य भाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से ही कोई पदार्थ मानना होगा । परन्तु ]
अभाव में सामान्यादि [ छहों पदार्थों में से किसी ] का सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार विशेषण विशेष्य भाव विशेषण और विशेष्य के स्वरूपों से भिन्न
नहीं है । और न उभयाश्रित ही है, विशेषण में विशेषण भाव मात्र के होने
और विशेष भाव के न होने से, और विशेष्य में विशेष्य भाव मात्र के होने से
विशेषण भाव के न होने से । [ उन दोनों में से कोई भी उभयाश्रित नहीं है ]
और न एक ही है । [ क्योंकि ] विशेषण और विशेष्य और उन दोनों का
भाव इस रूप में [ विशेषण विशेष्य भाव पद में 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं
प्रत्येकमभिसम्बध्यते,' इस नियम के अनुसार ] द्वन्द्व से परे श्रूयमाण भाव पद
[ विशेषण और विशेष्य दोनों पदों में से ] प्रत्येक के साथ सम्बद्ध होता है । इस
प्रकार विशेषणभाव और विशेष्यभाव यह [ अर्थ ] उपपन्न होता है । [ इससे
स्पष्ट है कि ] ये दो हैं और सम्बन्ध एक होता है [ इसलिए विशेषण-विशेष्य
भाव सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं ] इसी प्रकार व्याप्य-व्यापक-भावादि भी
[ सम्बन्ध नहीं हैं । इस प्रकार प्रबलतर युक्तियों से यह सिद्ध होता है कि
विशेषण विशेष्य भाव, व्याप्य व्यापक भाव, कार्य कारण भाव आदि कोई भी
सम्बन्ध नहीं कहे जा सकते हैं क्योंकि उनमें सम्बन्ध का लक्षण नहीं घटता है ।
इस प्रकार उनका सम्बन्धत्व सिद्ध न होने पर भी उनके लिए ] सम्बन्ध शब्द
का प्रयोग तो दो के द्वारा निरूपणीय होने से [ सम्बन्ध के साथ ] साधर्म्य वश

१२४ तर्कभाषा [ सम्बन्धत्वखण्डनम्
न सम्बन्धः । एवं व्याप्यव्यापकभावादयोऽपि। सम्बन्धशब्दप्रयोगस्तूभ-
यनिरूपणीयत्वसाधर्म्येणोपचारात् ।
तथा चासम्बद्धस्याभावस्येन्द्रियेण ग्रहणं न सम्भवति ।
सत्यम् । भावावच्छिन्नत्वाद् व्याप्तेर्भावं प्रकाशयदिन्द्रियं प्राप्तमेव
प्रकाशयति, नत्वभावमपि । अभावं प्रकाशयदिन्द्रियं विशेषणविशेष्यभा-
वमुखेनैवेति सिद्धान्तः ।
गौण रूप से होता है [ यह समझना चाहिए । अर्थात् जैसे संयोग समवाय आदि
सम्बन्ध किन्हीं दो पदार्थों में होते हैं। और उन दोनों का कथन कर के ही उस
सम्बन्ध को प्रदर्शित किया जा सकता है इसी प्रकार विशेषण विशेष्य भाव में
दो पदार्थों के कथन द्वारा ही उसका निरूपण होता है। इसलिए इस उभयनिरू-
पणीयत्व साधर्म्य से विशेषण विशेष्य भाव को भी गौण रूप से सम्बन्ध कहा
जाता है । वास्तव में वह सम्बन्ध नहीं है ]
इसलिए [ फलितार्थ यह हुआ कि ] सम्बन्ध के बिना अभाव का इन्द्रिय से
[ प्रत्यक्ष ] ग्रहण नहीं हो सकता है । [ अतः अभाव के ग्रहण के लिए अलग
प्रमाण मानना चाहिए । यह पूर्वपक्ष हुआ । ]
[ इसका उत्तर यह है कि ] ठीक है। [ किन्तु इन्द्रिय संबद्ध अर्थ को ही
ग्रहण करती है इस ] व्याप्ति के भाव [ पदार्थ ] तक परिमित होने से भाव को
प्रकाशित करनेवाली इन्द्रिय, संबद्ध [ भाव ] को ही प्रकाशित करती है। परन्तु
अभाव [ के विषय में ही यह नियम नहीं ] को तो नहीं। अभाव को प्रकाशित
करनेवाली इन्द्रिय तो विशेषण विशेष्य [ भाव ] द्वारा ही प्रकाशित करती है
यह सिद्धान्त [ पक्ष ] है ।
इस पर प्रश्न हो सकता है कि विशेषण विशेष्य भाव के सम्बन्धत्व का
खण्डन किया जा चुका है। ऐसी दशा में यदि इन्द्रिय से अभाव का ग्रहण
माना जायगा तो असम्बद्ध अभाव का ग्रहण माना जायगा । और उस दशा
में अति प्रसङ्ग दोष होगा । अर्थात् जब बिना सम्बन्ध के इन्द्रिय अभाव को
ग्रहण कर सकती है तब सभी पदार्थों को बिना सम्बन्ध के ग्रहण करती है
यह भी माना जा सकता है। इस शङ्का के होने पर नैयायिक का उत्तर यह है
कि हम तो विशेषण विशेष्य भाव को 'सम्बन्ध' मानते हैं इसलिए हमारे मत
में इन्द्रिय बिना सम्बन्ध के अभाव को ग्रहण नहीं करती इसलिए अतिप्रसङ्ग
का कोई अवसर नहीं है। फिर भी यदि आप उसे असंबद्ध ग्रहण ही कहते हैं
तो यह दोष आपके मत में भी आता है। क्योंकि अभाव प्रमाण के मान लेने

अभावखण्डनम् ] अभावनिरूपणम् १२५
असम्बद्धाभावग्रहेऽतिप्रसङ्गदोषस्तु विशेषणतयैव निरस्तः । समश्च
परमते ।
यत्रोभयोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥
पर भी उस प्रमाण का अभाव के साथ संयोग का समवाय कोई सम्बन्ध
नहीं बन सकेगा । इसलिए यह असंबद्धार्थ ग्राहकत्व दोष आप पर भी आता
है । और आप उसका जो समाधान करें वही समाधान हमारे पक्ष में भी
समझ लेना चाहिए ।
असम्बद्ध अभाव के ग्रहण में [ आने वाला ] अतिप्रसङ्गदोष तो विशे-
षणतया ही खण्डित हो जाता है । और दूसरे [ प्रतिवादी ] के मत में भी
समान है । [ इसलिए ]
जहाँ दोनों [ पक्षों ] में समान दोष हो और परिहार भी समान हो । ऐसे
अर्थ के विचार करते समय किसी एक पक्ष पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए ।
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने अर्थापत्ति तथा अभाव इन दो प्रमाणों का
अन्तर्भाव दिखाया है । इनमें से अर्थापत्ति का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में
अन्तर्भाव दिखाया है । और अभाव का ग्रहण प्रत्यक्ष से ही हो जाता है यह
न्याय सिद्धान्त स्थापित किया है । इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान,
उपमान और शब्द यह चार प्रमाण सिद्ध किए गए हैं । और शेष सबका अन्त-
र्भाव इन्हीं में किया गया है । परन्तु न्याय की अपेक्षा भी कम प्रमाण मानने
वाले सांख्य, योग, वैशेषिक आदि आस्तिक दर्शन भी हैं । सांख्य तथा योग,
में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द यह तीन प्रमाण माने गए हैं । उन्होंने
उपमान को अलग प्रमाण न मान कर इन्हीं तीनों प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव
मान लिया है ।
उपमान के विषय में सांख्यमत—
सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने उपमान प्रमाण के भिन्न भिन्न
तीन लक्षणों के अनुसार क्रमशः प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द इन तीनों प्रमाणों
के भीतर उपमान का अन्तर्भाव दिखाते हुए लिखा है—
१ उपमानं तावत्, यथा गौस्तथा गवय इति वाक्यम् । तज्जनिता
धीरागम एव ।
२ योऽप्ययं गवयशब्दो गोसदृशस्य वाचक इति प्रत्ययः सोऽप्यनुमानमेव ।
यो हि शब्दः वृद्धैर्यत्र प्रयुज्यते सोऽसति वृत्त्यन्तरे तस्य वाचकः । यथा गो-
शब्दो गोत्वस्य । प्रयुज्यते चैष गवयशब्दो गोसदृशे इति तस्यैव वाचक इति
तज्ज्ञानमनुमानमेव ।
३ यत्तु गवयस्य चक्षुःसन्निकृष्टस्य गोसादृश्यज्ञानं तत्प्रत्यक्षमेव । अत एव

१२६ तर्कभाषा [ उपमाने सांख्यमतम् ]
स्मर्यमाणायां गवि गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षम् । न ह्यन्यद् गवि सादृश्यमन्यच्च
गवये । भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते ।
सामान्ययोगश्चैकः । स चेद् गवये प्रत्यक्षो गव्यपि तथेति नोपमानस्य प्रमेया-
न्तरमस्ति यत्र प्रमाणान्तरमुपमानं भवेदिति न प्रमाणान्तरमुपमानम्¹ ।
१ अर्थात् उपमान के तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं। उन तीनों के
अनुसार उपमान का इन तीन प्रमाणों में उसका अन्तर्भाव हो सकता है। यदि
न्याय दर्शन के 'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्'² इस लक्षण के
अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को उपमान प्रमाण मानें तो
उससे उत्पन्न ज्ञान अर्थात् वाक्यार्थ ज्ञान ही उसका फल होगा। और वाक्य
से वाक्यार्थ का ज्ञान शब्द प्रमाण का विषय है इसलिए इस अवस्था में
उपमान का काम शब्द प्रमाण से निकल आता है । उसके लिए अलग उपमान
प्रमाण की आवश्यकता नहीं है ।
२ इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन 'संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरुपमानार्थः'
यह लिखा है । इसके अनुसार । संज्ञा संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति को उपमान
प्रमाण का फल माना जाता है । इस पक्ष में वाचस्पति मिश्र उसका अन्तर्भाव
अनुमान में करते हैं । जो शब्द वृद्ध लोग जिस अर्थ में प्रयुक्त करते हैं यदि
लक्षणा आदि अन्य वृत्तियों का आश्रय न लिया जाय तो वह शब्द उस अर्थ
का वाचक होता है । वृद्ध लोग गवयशब्द को गोसदृश में प्रयुक्त करते हैं
इसलिए वह गोसदृश का वाचक होता है । इस प्रकार अनुमान प्रमाण से संज्ञा
संज्ञी के सम्बन्ध की प्रतीति हो सकती है । अतः इस के लिए भी उपमान को
अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ।
३ मीमांसकों ने उपमान प्रमाण का प्रतिपादन अन्य प्रकार से किया है ।
उनके अनुसार 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य को सुनने के बाद जो व्यक्ति
जङ्गल में जाकर गो सदृश प्राणी को देखता है उसे पहिले यह ज्ञान होता है
कि इसके समान ही मेरी गौ है । यहां अप्रत्यक्ष गौ में जो इस गवय का
सादृश्य प्रतीत होता है वह उपमान प्रमाण से ही प्रतीत होता है यह मीमां-
सकों का मत है । परन्तु वाचस्पति मिश्र ने इस सादृश्य ज्ञान को प्रत्यक्ष
प्रमाण का विषय माना है । यद्यपि गौ प्रत्यक्ष नहीं है, गवय प्रत्यक्ष है । परन्तु
गौ तथा गवय का सादृश्य तो एक ही है । वह सादृश्य गवय के प्रत्यक्ष होने
से गवय में प्रत्यक्ष है इसलिए उससे अभिन्नगोनिष्ठ सादृश्य भी प्रत्यक्ष है । इस
१. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५ । २. न्यायसूत्रम् १, १, ६, ।