तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० तर्कभाषा [ पदलक्षणम्
सन्निहितत्वं तु पदानामेकेनैव पुंसा अविलम्बेनोच्चरितत्वम् । तच्च
साक्षादेव पदेषु सम्भवति नार्थद्वारा ।
तेनाऽयमर्थः सम्पन्नः । अर्थप्रतिपादनद्वारा श्रोतुः पदान्तरविषया
मर्थान्तरविषयां वाकाङ्क्षां जनयतां प्रतीयमानपरस्परान्वययोग्यार्थप्रतिपाद-
कानां सन्निहितानां पदानां समूहो वाक्यम् ।
पदं च वर्णसमूहः । समूहश्चात्र एकज्ञानविषयीभावः । एवं च वर्णानां
क्रमवतामाशुतरविनाशित्वेन एकदाऽनेकवर्णानुभवासम्भवात् पूर्वपूर्ववर्णा-
ननुभूय, अन्त्यवर्णश्रवणकाले पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहकृतेन
अन्त्यवर्णसम्बन्धेन पदव्युत्पादनसमयग्रहानुगृहीतेन श्रोत्रेणैकदैव सदसद-
नेकवर्णावगाहिनी पदप्रतीतिर्जन्यते, सहकारिदाढर्यात् प्रत्यभिज्ञानवत् ।
प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षे ह्यतीतापि पूर्वावस्था स्फुरत्येव । ततः पूर्वपूर्वपदानुभव-
जनितसंस्कारसहकृतेनान्त्यपदविषयेण श्रोत्रेन्द्रियेण पदार्थप्रत्ययानुगृहीते-
नानेकपदावगाहिनी वाक्यप्रतीतिः क्रियते ।
एक ही पुरुष द्वारा पदों का अविलम्ब से उच्चरितत्व सन्निधि [कहलाती] है ।
और वह पदों में साक्षात् ही हो सकती है अर्थ द्वारा [मानने की आवश्यकता] नहीं ।
इस लिए [ वाक्य के लक्षण का ] यह अर्थ हुआ कि, अर्थ प्रतिपादन द्वारा
अन्य पदों अथवा अन्य अर्थों के विषय में श्रोता की आकांक्षा को पैदा करने वाले
और प्रतीयमान [ स्पष्ट रूप से ] परस्पर अन्वययोग्य अर्थ के प्रतिपादक सन्निधि
युक्त पदों का समूह वाक्य [ कहलाता ] है ।
और वर्णसमुदाय पद [ कहलाता ] है । समूह [ का अर्थ ] यहां [ पद के
लक्षण में] 'एक ज्ञान का विषय होना' है। इस प्रकार क्रमिक और क्षणिक [आशु-
तर विनाशी ] अनेक वर्णों का एक साथ अनुभव असम्भव होने से पूर्व पूर्व वर्णों
का अनुभव करके अन्तिम वर्ण के श्रवण काल में पूर्व पूर्व वर्णों के अनुभव से
जनित संस्कारसहकृत, पद-व्युत्पादनसमयग्रह से अनुगृहीत, अन्त्यवर्ण-सम्बद्ध
श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यभिज्ञा के समान सहकारी [ संस्कार ] के प्राबल्य से, सत्
[ अन्तिम वर्ण ] और असत् पूर्व वर्णों का अवगाहन करने वाली पद की
प्रतीत होती है । प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष [ 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि ] में अतीत
पूर्वावस्था भी [ जो 'सः' पद से सूचित होती है ] प्रतीत [ स्फुरित ] होती ही है ।
[ इसी प्रकार सदसदनेक वर्णों की प्रतीति भी एक साथ हो सकती है ] । उस
[ पदप्रतीति ] के बाद [ उसी क्रम से ] पूर्व पूर्व पदानुभव-जनित संस्कार-सह-
कृत, पदार्थबोध से अनुगृहीत अन्त्यपदविषयक श्रोत्रेन्द्रिय से [ सदसद् ] अनेक
पदों को ग्रहण करने वाली [ पदसमूहात्मक ] वाक्य की प्रतीति होती है ।