सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

उपमानप्रयोजनम् ] उपमाननिरूपणम् १०७
सैव फलम् । इदन्तु प्रत्यक्षानुमानासाध्यप्रमासाधकत्वात् प्रमाणान्तर-
मुपमानमस्ति ।
इति व्याख्यातमुपमानम् ।
प्रतीति उपमिति है। वही [ उपमान प्रमाण का ] फल है। प्रत्यक्ष तथा
अनुमान से असाध्य प्रमा का साधन होने से उपमान अलग प्रमाण है।
उपमान की इस प्रकार व्याख्या हो गई है।
वैशेषिक, सांख्य तथा योग दर्शन में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना
गया है। वाचस्पतिमिश्र ने 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' में उपमान के स्वरूप के विषय
में तीन पक्ष दिखा कर उन तीनों अवस्थाओं में उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष,
अनुमान अथवा शब्द प्रमाण में कर लिया है। परन्तु उदयनाचार्य ने संज्ञा-
संज्ञि-सम्बन्ध के ग्रहण के लिए उपमान को आवश्यक माना है। हमने अपनी
दर्शनमीमांसा में उपमान का निरूपण इस प्रकार किया है।
प्रसिद्धार्थस्य साधर्म्यादप्रसिद्धप्रसाधनम् ।
उपमितिर्हेतुस्तस्या उपमानं सादृश्यधीः ॥ १ ॥
गवयं यो न जानाति गां जानाति स्वरूपतः ।
यथा गौर्गवयोऽप्येवं तं च कश्चिद् विबोधयेत् ॥ २ ॥
वनं प्राप्तो यदा पिण्डं पश्यति गोनिभं तु सः ।
संस्मरन्नतिदेशं तु गवयं निश्चिनोति तम् ॥ ३ ॥
तत्रातिदेशवाक्यार्थं उपमानं सादृश्यधीः ।
उपमितिः संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य ग्रहस्तथा ॥ ४ ॥
उपमाने विप्रतिपत्तिं दर्शयति,
उपमानं पृथङ् मानं न्याये यत्तु प्रकीर्तितम् ।
न तत् सांख्ये न वा योगे न च वैशेषिके मतम् ॥ ५ ॥
अनुमानेऽथवा शब्दे क्वचित् प्रत्यक्षके तथा ।
अन्तर्भाव्य पृथक् तस्य प्रामाण्यं खण्डितं तु तैः ॥ ६ ॥
न्यायमतेन तदुपपादयति,
सम्बन्धस्य परिच्छेदः संज्ञायाः संज्ञिना सह ।
उपमानाद् भवेदाशु न तु शब्दादिभिस्तथा ॥ ७ ॥
तस्मादुपमानं न्याये प्रमाणन्तु पृथङ् मतम् ।
नान्तर्भावो भवेदस्य न्याय्यो न्यायनये क्वचित् ॥ ८ ॥