तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दे टिप्पणयः ] शब्दनिरूपणम् ११३
'आप्तोक्तत्व' ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वैदिक वाक्य प्रमाण ही
है। यह प्रभाकर सम्प्रदाय का मत है। न्यायकुसुमाञ्जलिकार श्री उदयनाचार्य
ने इस विषय में दो कारिकाएँ लिख कर इस पक्ष का खण्डन किया है।
प्राभाकरास्तु, वेदस्यापौरुषेयतया तत्र वक्तृज्ञानानुमानासम्भवात् शब्दः
प्रमाणम् । लोके त्वाप्तोक्तत्वज्ञानमपेक्षितम् । तथा च 'अयं वक्ता स्वप्रयुक्तवाक्यार्थ-
यथार्थज्ञानवान्, भ्रमाद्यजन्यवाक्यार्थज्ञानजन्यवाक्यप्रयोक्तृत्वात्' इत्यनुमानाद्
वक्तृज्ञानावच्छेदकतया, उत्तरकालं वा 'एते पदार्थाः परस्परं संसृष्टा वक्तृयथार्थ-
ज्ञानविषयत्वात्' इत्यनुमानात्साक्षाद् वाक्यार्थसिद्धेः, कॢप्तसामर्थ्यात् शब्दा-
त्पुनरन्वयधीरित्यनुवादको लौकिकः शब्दो न प्रमाणमिति प्राहुः ।
तन्नाह—
निर्णीतशक्तेर्वाक्याद्धि प्रागेवार्थस्य निर्णये ।
व्याप्तिस्मृतिविलम्बेन लिङ्गस्यैवानुवादिता ॥
व्यस्तपुंदूषणाशङ्कैः स्मारितत्वात् पदैरमी ।
अन्विता इति निर्णीते वेदस्यापि न तत्कुतः १॥
पूर्वपक्षी प्रभाकर पदार्थसंसर्ग का बोध पहिले अनुमान की प्रक्रिया से और पीछे
शब्द की प्रक्रिया से मान कर शब्द को 'अनुवादक' और अनुमान को 'प्रमाण'
कहना चाहते हैं। उत्तर पक्ष का कहना यह है कि अनुमान की प्रक्रिया में
व्याप्ति स्मृति में विलम्ब होगा और शब्द की प्रक्रिया से वैदिक वाक्यों में
'संसर्गबोध की शक्ति निर्णीत हो चुकी है। अतः निर्णीतशक्तिक वाक्य से पहिले
'संसर्ग' का बोध हो जायगा और अनुमान की प्रक्रिया से विलम्ब से संसर्ग
का बोध होगा, इसलिए अनुमान ही 'अनुवादक' है। और यदि इस पर भी
लौकिक वाक्य को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं तो फिर वैदिक वाक्यों में भी
'अमी वैदिकाः पदार्थाः परस्परं संसर्गवन्तः, व्यस्तपुन्दूषणाशङ्कैः पदैः स्मारि-
तत्वात्' इस अनुमान से पहिले संसर्ग का निर्णय हो जाने से वैदिक वाक्य
को भी 'अनुवादक' मानना होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि या तो लौकिक
और वैदिक दोनों प्रकार के वाक्यों को 'अनुवादक' मानो और या फिर दोनों
को प्रमाण मानो। प्रभाकर जो केवल वैदिक वाक्यों को 'प्रमाण' और लौकिक
वाक्यों को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं उनका यह 'अर्धजरतीय न्याय'
ठीक नहीं है।
३—अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद—
'पदार्थ-संसर्ग बोध' को 'वाक्यार्थ' कहते हैं यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है।
परन्तु इस 'संसर्गबोध' के विषय में भी मीमांसकों में कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर
१ न्यायकुसुमाञ्जलि ३, १४, १५ हरिदासीय विवृतिः ।
८ त० भा०