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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 330 में से

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पृष्ठ 174

आकाङ्क्षादयः ] शब्दनिरूपणम् १०६
यजेत्-इत्यादि । यथा च-नदीतीरे पञ्चफलानि सन्ति-इति । यथा च
तान्येव गामानय-इत्यादिपदान्यविलम्बितोच्चरितानि ।
नन्वत्रापि न पदानि साकाङ्क्षाणि किन्त्वर्थाः फलादीनामाधेयानां
तीराद्याधाराकाङ्क्षितत्वात् । न च विचार्यमाणेऽर्था अपि साकाङ्क्षाः ।
आकाङ्क्षाया इच्छात्मकत्वेन चेतनधर्मत्वात् ।
सत्यम् । अर्थास्तावत् स्वपदश्रोतर्यन्त्योन्यविषयाकाङ्क्षाजनकत्वेन
साकाङ्क्षा इत्युच्यन्ते । तद्द्वारेण तत्प्रतिपादकानि पदान्यपि साकाङ्क्षाणी-
त्युपचर्यन्ते । यद्वा पदान्येवार्थान् प्रतिपाद्यार्थान्तरविषयाकाङ्क्षाजनकानी-
त्युपचारात् साकाङ्क्षाणि । एवमर्थाः साकाङ्क्षाः परस्परान्वययोग्याः ।
तद्द्वारेण पदान्यपि परस्परान्वययोग्यानीत्युच्यन्ते ।
रखनेवाला ज्योतिष्टोम [ नामक ] याग करे, इत्यादि [ वैदिक वाक्य ] । और जैसे
नदी तीर पर पाँच फल [ के वृक्ष ] हैं, यह [ लौकिक वाक्य है ] । और जैसे
अविलम्ब से उच्चरित वही 'गाय को ले आओ' इत्यादि पद [ वाक्य हो जाते हैं ] ।
[ प्रश्न ] यहां [ वाक्य के उदाहरणों में ] भी पद आकांक्षा युक्त नहीं हैं
किन्तु फलादि आधेयों [ रूप अर्थों ] को तीरादि आधार [ रूप अर्थ ] की
आकांक्षा होने से, अर्थ ही आकांक्षा युक्त हैं । और [ वास्तव में ] विचार करने
पर आकांक्षा के इच्छात्मक, अतः चेतन [ आत्मा ] का धर्म होने से अर्थ भी
साकांक्ष नहीं है [ इसलिए आकांक्षा को पद का विशेषण कहना उचित नहीं है ।
यह पूर्वपक्ष हुआ । इसका उत्तर आगे देते हैं ]
[ उत्तर ] ठीक है [ आकांक्षा साक्षात् पदों में नहीं रहती किन्तु ] अर्थ अपने
[ वाचक ] पद को सुनने वाले [ के मन ] में एक दूसरे [ पद ] के विषय में
आकांक्षा के जनक होने से [ परम्परया ] साकांक्ष कहलाते हैं । उन [ अर्थों ]
के द्वारा उनके प्रतिपादक पद भी [ परम्परया ] उपचार से साकांक्ष कहे जाते हैं ।
अथवा पद ही अर्थों का प्रतिपादन कर के दूसरे अर्थों के विषय में आकांक्षा को
उत्पन्न करते हैं इसलिए उपचार [ गौण रूप ] से साकांक्ष कहे जाते हैं । इसी प्रकार
[ परम्परा से ] अर्थ [ भी ] साकांक्ष परस्पर अन्वययोग्य [ योग्यताविशिष्ट ]
होते हैं और उनके द्वारा पद भी परस्पर अन्वय योग्य कहलाते हैं । [ अर्थात्
योग्यता और आकांक्षा यह दोनों धर्म यद्यपि साक्षात् पदों के धर्म नहीं हैं । योग्यता
साक्षात् पदार्थ का धर्म, और आकांक्षा साक्षात् आत्मा का धर्म है फिर भी उपर्युक्त
प्रकार से उपचार से वह दोनों, पदों के धर्म हो सकते हैं । ऐसा मान कर ही वाक्य
के लक्षण में योग्यता और आकांक्षा को पद का विशेषण बनाया है ] ।