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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 330 में से

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पृष्ठ 176

शब्दे टिप्पण्यः ] शब्दनिरूपणम् १११
तदिदं वाक्यमाप्तपुरुषेण प्रयुक्तं सच्छब्दनामकं प्रमाणम् । फलन्त्वस्य
वाक्यार्थज्ञानम् । तच्चैतच्छब्दलक्षणं प्रमाणं लोके वेदे च समानम् ।
लोके त्वयं विशेषो यः कश्चिदेवाप्तो भवति, न सर्वः । अतः किञ्चिदेव
लौकिकं वाक्यं प्रमाणं, यदाप्तवक्तृकम् । वेदे तु परमाप्तश्रीमहेश्वरेण कृतं
सर्वमेव वाक्यं प्रमाणं, सर्वस्यैवाप्तवाक्यत्वात् ।
यही वाक्य आप्त पुरुष से प्रयुक्त होने पर शब्द नामक प्रमाण [कहा जाता]
है । और इसका फल वाक्यार्थज्ञान होता है । यह शब्द प्रमाण लोक तथा वेद
में [ दोनों जगह ] समान है । लोक में इतनी विशेषता है कि कोई कोई पुरुष ही
आप्त होता है सब नहीं । इसलिए कोई कोई लौकिक वाक्य ही प्रमाण होता है
जो कि आप्त पुरुष द्वारा कहा हुआ होता है । वेद में परम आप्त परमात्मा से
कृत सब ही वाक्य प्रमाण हैं । सब ही [ वाक्यों ] के आप्त वाक्य होने से ।
१-वैशेषिक मत—
न्याय दर्शन में प्रत्यक्षादि चार प्रमाण माने हैं परन्तु न्याय के 'समानतंत्र'
कहलाने वाले वैशेषिक दर्शन ने केवल दो ही प्रमाण माने हैं । प्रत्यक्ष और
अनुमान । इनके अतिरिक्त उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और
अभाव इन छहों प्रमाणों का वैशेषिक दर्शन ने अनुमान में ही अन्तर्भाव किया
है । यों तो बौद्धों ने भी प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं और
चार्वाक ने केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण माना है । परन्तु वैशेषिक दर्शन तो आस्तिक
दर्शन है । 'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः' की प्रतिज्ञा से इस दर्शन का आरम्भ
हुआ है और 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' । यह वैशेषिक दर्शन का तृतीय
सूत्र है, जिसमें वेद के प्रामाण्य का स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है । फिर भी
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में शब्द को अलग प्रमाण न मान कर
उसका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है यह आश्चर्य की बात है । शब्द का
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हुए प्रशस्तपाद भाष्य में लिखा है—
'शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्या-
सन्दिग्धलिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादि-
१ वै० १,१,१ । २ वै० १,१,३ ।