तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
भ्योऽपीति । श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, तद्वचनादाम्ना-
यप्रामाण्यम् । लिङ्गाच्चानित्यो बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे, बुद्धिपूर्वो ददातिरि-
त्युक्तत्वात्¹ ।'
शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव समानविधि के कारण किया गया है । जैसे
अनुमान में १ व्याप्तिग्रह, २ लिङ्गज्ञान, ३ व्याप्तिस्मृति, के बाद, ४ अनुमिति
उत्पन्न होती है। इसी प्रकार शब्द प्रमाण में १ संकेतग्रह, २ वाक्यश्रवण,
३ पदार्थस्मृति के बाद, ४ शाब्दबोध होता है। इसलिए अनुमान तथा शब्द
की विधि समान होने से वैशेषिक दर्शन ने शब्द का अनुमान में ही अन्तर्भाव
मान लिया है।
वैशेषिक दर्शन ने न केवल शब्द प्रमाण का अन्तर्भाव अनुमान में
किया है अपितु श्रुति तथा स्मृति रूप आम्नाय को भी अनित्य और 'वक्तृ-
प्रामाण्याधीनप्रामाण्य' माना है। 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' और
'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे' इन सूत्रों से वेद की अनित्यता और परतः
प्रामाण्य का प्रतिपादन किया है। इस प्रकार वैशेषिक दर्शन ने वेद को '
मीमांसा के स्वतः प्रामाण्य के स्थान पर 'तद्वचनात् प्रामाण्य' मानकर परतः
प्रमाण माना है। और न्याय जो शब्द को स्वतंत्र प्रमाण मानता है उसके
स्थान पर शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया है। यह उसका मीमांसा
और न्याय दोनों से भेद है।
२-प्रभाकर-सम्मत मीमांसक-मत-
मीमांसकों में कुमारिल भट्ट तथा प्रभाकर के अनुयायी दो अलग-अलग
सम्प्रदाय हैं। इनमें से प्रभाकर-सम्प्रदाय के अनुयायी शालिकनाथ मिश्र आदि
भी वैशेषिक के समान शब्द प्रमाण का अनुमान में अन्तर्भाव करते हैं। परन्तु
उनमें भेद यह है कि वह वैदिक वाक्यों को तो अलग शब्द प्रमाण मानते हैं
परन्तु लौकिक वाक्यों को अलग शब्द प्रमाण नहीं मानते हैं। उनका अभिप्राय
यह है कि शब्द प्रमाण का फल 'पदार्थ-संसर्गबोध' रूप शाब्दबोध है। लौकिक
वाक्यों में प्रामाण्य के लिए 'आप्तोक्तत्व' का ज्ञान आवश्यक है। आप्त पुरुष
वही है जिसको कहे जानेवाले वाक्य के अर्थ का यथार्थ ज्ञान हो। इसलिए
'पदार्थ-संसर्ग' रूप 'वाक्यार्थ' वक्ता के ज्ञान के अन्तर्गत हो जाता है और उसका
ज्ञान अनुमान द्वारा हो सकता है। इसलिए लौकिक वाक्य को शब्द प्रमाण
नहीं कहा जा सकता। वह तो अनुमान द्वारा गृहीत 'पदार्थ-संसर्ग' का अनुवादक
मात्र ही हो सकता है। परन्तु वैदिक वाक्य के अपौरुषेय होने के कारण उनमें
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० १०७ । २ वै० १,१।१ ३ वै० ६, १, १ ।