तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ तर्कभाषा [ वाक्यलक्षणम्
शब्दः।
आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथाभूतस्यार्थस्योपदेष्टा पुरुषः । वाक्यं
त्वाकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमतां पदानां समूहः। अतएव 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती'
इति पदानि न वाक्यम् । परस्पराकाङ्क्षाविरहात् । 'वह्निना सिञ्चेदि'ति
न वाक्यं योग्यताविरहात् । नह्यग्निसकयोः परस्परान्वययोग्यतास्ति ।
तथाहि अग्निनेति तृतीयया सेकरूपं कार्यं प्रति करणत्वमग्नेः प्रतिपादितम् ।
न चाग्निः सेके करणीभवितुं योग्यः । तेन कार्यकारणभावलक्षणसम्बन्धे-
ऽग्निसकयोरयोग्यत्वादग्निना सिञ्चेदिति न वाक्यम् ।
एवमेकैकशः प्रहरे प्रहरे असहोच्चारितानि 'गामानय' इत्यादि पदानि
न वाक्यम् । सत्यामपि परस्पराकाङ्क्षायां सत्यामपि परस्परान्वययोग्य-
तायां परस्परसन्निध्याभावात् । यानि तु साकाङ्क्षाणि योग्यतावन्ति
सन्निहितानि पदानि तान्येव वाक्यम् । यथा—ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो
शब्दनिरूपणम्
प्रत्यक्ष, अनुमान तथा उपमान के बाद चौथा प्रमाण शब्द है । शब्द
प्रमाण में संकेतग्रह के अवसर पर अनुमान की आवश्यकता पड़ती है इसलिए
अनुमान के अनन्तर शब्द को रखा गया है । आगे शब्द प्रमाण का निरूपण
प्रारम्भ करते हैं ।
आप्त [ पुरुष के ] वाक्य [ को ] शब्द [ प्रमाण कहा जाता ] है । यथाभूत
अर्थ का उपदेश करनेवाला पुरुष आप्त [ कहलाता ] है [ और उसका वाक्य शब्द
प्रमाण है] आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पदों के समूह को वाक्य कहते
हैं । इसलिए परस्पर आकांक्षा-विरहित होने से गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी आदि
पद [ का समूह ] वाक्य नहीं है । [ इसी प्रकार ] योग्यता के अभाव होने से
अग्नि से सींचता है यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है। अग्नि और सेचन में परस्पर
अन्वय की योग्यता नहीं है [ क्योंकि ] अग्नि से इस तृतीया [ विभक्ति ] से सेचन
रूप कार्य के प्रति अग्नि की करणता प्रतिपादित की है और अग्नि-सेचन का
करण होने योग्य नहीं है । इसलिए सेचन और अग्नि के कार्य-कारणभाव रूप
सम्बन्ध के अयोग्य होने से अग्नि से सींचता है। यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है।
इसी प्रकार एक एक करके प्रहर-प्रहर के बाद अलग-अलग उच्चारित 'गाय को
ले आओ' इत्यादि पद [ समूह ] वाक्य नहीं है। [ उनमें ] परस्पर अन्वय की
आकांक्षा रहते हुए भी और परस्पर अन्वय की योग्यता होते हुए भी परस्पर
सन्निधि न होने से [ वे वाक्य नहीं कहलाते हैं ] जो आकांक्षा युक्त, योग्यता
युक्त, और सन्निधि युक्त पद हैं वे ही वाक्य [ कहलाते ] हैं। जैसे स्वर्ग की इच्छा