सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

६६ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
इति व्याख्यातमनुमानम् ।
'बाधितविषय' में 'विषय' शब्द का अर्थ है 'साध्य' । जिस हेतु के साध्य
का अभाव किसी अन्य प्रमाण से पक्ष में गृहीत हो वह हेतु 'बाधितविषय'
कहा जाता है और उसका दूसरा नाम 'कालात्ययापदिष्ट' भी होता है ।
इस प्रकार अनुमान [ प्रमाण ] की व्याख्या हो गई ।
१ अनुमान की आवश्यकता,
प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता के विषय में कोई विवाद नहीं है । आस्तिक-
नास्तिक सभी प्रकार के दार्शनिक प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता स्वीकार करते हैं ।
परन्तु अनुमान के विषय में यह बात नहीं है । चार्वाक लोग अनुमान प्रमाण
का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते हैं । इसलिए अनुमान प्रमाण के विषय में
विचार करने से पूर्व उसकी आवश्यकता पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
इस दृष्टि से श्री वाचस्पति मिश्र आदि ने चार्वाक के लिए भी अनुमान की
सत्ता को स्वीकार करना अपरिहार्य बतलाया है । उनका कहना है कि जब
चार्वाक किसी से यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब उससे यह
पूछना चाहिए कि वह ऐसा उस विशेष व्यक्ति से क्यों कहता है । इसका
उत्तर वह यही दे सकता है कि यह व्यक्ति अनुमान प्रमाण को मानता है
इसलिए इस विषय में इसके भ्रम अथवा सन्देह को मिटाने के लिए मैं इसको
समझा रहा हूँ कि अनुमान प्रमाण नहीं है ।
इस पर चार्वाक से दूसरा प्रश्न यह करना चाहिए कि आपको यह कैसे
मालूम हुआ कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा भ्रम में है । दूसरे पुरुष में
रहने वाले अज्ञान सन्देह अथवा विपर्यय का ग्रहण करने का आपके पास क्या
साधन है । इसके उत्तर में वह यही कह सकता है कि इसके वचनों से यह
प्रतीत होता है कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय-भ्रम में है । तब
उससे यह कहना चाहिए कि शब्द विशेष अथवा वचन भेद से जो दूसरे व्यक्ति के
अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय का ज्ञान है वह प्रत्यक्ष तो नहीं कहा जा सकता
है । क्योंकि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह, विपर्यय आदि का किसी लौकिक पुरुष
को प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । अतएव इसके जानने का मार्ग उसके वचन भेद
रूप लिङ्ग के अतिरिक्त दूसरा नहीं है । और लिङ्ग दर्शन से होने वाला ज्ञान
ही 'लैङ्गिक' अथवा अनुमान कहलाता है । अतएव परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह

अनुमाने टिप्पणयः ] अनुमाननिरूपणम् ६७
विपर्यय का ग्रहण अनुमान से ही होता है । इसलिए जब चार्वाक दूसरे को
यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब वह उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय का अनुमान करके ही ऐसा कहता है। उस दशा में उसके लिए अनु-
मान प्रमाण मानना अपरिहार्य है। और यदि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय के जाने बिना वह यों ही किसी को पकड़ कर कहने लगता है कि भाई
अनुमान प्रमाण नहीं है तो वह उन्मत्त ही समझा जायगा। इसलिए किसी के
साथ इस विषय में बुद्धिपूर्वक बात करने के लिए उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय आदि का ज्ञान आवश्यक है। और उसके ज्ञान के अनुमान को छोड़
कर दूसरा कोई साधन नहीं है। इसलिए 'अकामेनापि अनुमानं प्रमाणमभ्यु-
पेयम्' । न चाहते हुए भी चार्वाक को अनुमान प्रमाण मानना ही होगा ।
एक बात और भी है। चार्वाक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है और
जो चीज प्रत्यक्ष नहीं उसका अस्तित्व नहीं मानना चाहता है। ऐसी दशा में घर
से बाहर आने पर चार्वाक को अपने गृहजनों का प्रत्यक्ष नहीं होता। तब क्या
उनका अभाव माना जायगा । इसलिए भी उसका कहना ठीक नहीं है।
इस विषय को हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस प्रकार सङ्कलित किया है ।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाकैः प्रमाणं यैस्तु मन्यते ।
अभ्युपेयमकामैरप्येतैरनुमानं परम् ॥ १ ॥
अदृष्टा अपि सन्त्यर्था गृहे दारा इव ध्रुवम् ।
अन्यथास्मिन् बहिर्याते किं विनष्टं नु तत्कुलम् ॥ २ ॥
पुरुषान्तरसंवादे कथं वाऽसौ प्रवर्तते ।
यदि तेषां गृहीतं स्याद् विषये नोऽज्ञानादिकम् ॥ ३ ॥
पुरुषान्तरसन्देहोऽज्ञानं वाऽथ विपर्ययः ।
प्रत्यक्षेण ग्रहीतुं तु न शक्यं लौकिकैर्जनैः ४ ॥
अधृताज्ञानसन्देहश्चेत् कथायां प्रवर्तते ।
उन्मत्तवदुपेक्ष्योऽसौ तदा सञ्जायते ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वाक्यभेदादिलिङ्गाच्चेदनुमाय प्रवर्तते ।
पराऽज्ञानादिकं तस्मात् कथाऽप्यस्य प्रकल्पते ॥ ६ ॥
तस्मादनिच्छताऽप्यत्र मानमनुमानं ध्रुवम् ।
स्वीकार्यं नान्यथा तस्य व्यवहारोऽपि कल्पते १ ॥ ७ ॥
१ दर्शनमीमांसा ४।
७ त० भा०

६८ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
२ अनुमान का लक्षण और भेद ।
अनुमान प्रमाण के विषय में दार्शनिक जगत् में तीन प्रकार की परम्पराएँ
पाई जाती हैं। एक वैदिक-परम्परा, दूसरी बौद्ध-परम्परा और तीसरी नव्य न्याय
की परम्परा । अनुमान के लक्षण और भेदों का निरूपण सबसे पहिले वैदिक-
परम्परा में ही प्रारम्भ हुआ । इस वैदिक-परम्परा की भी दो धाराएँ मिलती
हैं । एक धारा तो वैशेषिक और मीमांसा की विचारधारा है और दूसरी धारा
में न्याय, सांख्य और चरक इन शास्त्रों का समावेश किया जा सकता है । इन
दोनों में भेद यह है कि वैशेषिक और मीमांसा वाली परम्परा में अनुमान के
दो भेद किए गए हैं और न्याय, सांख्य तथा चरक वाली परम्परा में दो के
स्थान पर तीन भेद किए गए हैं। पहिली वैशेषिक और मीमांसक परम्परा का
ज्ञान हमको 'प्रशस्तपादभाष्य' तथा 'शाबरभाष्य' में होता है। उन दोनों ने
अनुमान के दो भेद करते हुए लिखा है।
तत्तु द्विविधम्। प्रत्यक्षतो दृष्टसम्बन्धं सामान्यतो दृष्टसम्बन्धं च । [ मीमांसा१ ]
तत्तु द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं च । [ वैशेषिक२ ]
अर्थात् मीमांसा और वैशेषिक दोनों दर्शनों में अनुमान के दो भेद माने
हैं एक 'दृष्ट' अथवा 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' और दूसरा 'सामान्यतो दृष्ट' । इन दोनों
दर्शनों में दूसरा भेद तो 'सामान्यतो दृष्ट' नाम से ही दोनों जगह कहा
गया है । परन्तु पहिले भेद को एक जगह 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' तथा दूसरी जगह
केवल 'दृष्ट' शब्द से कहा गया है । परन्तु वह कोई विशेष महत्त्व की बात
नहीं है। दोनों लगभग समान ही हैं।
इसके विपरीत न्याय, सांख्य तथा चरक की परम्परा में अनुमान के तीन
प्रकारों का वर्णन पाया जाता है । न्याय-सूत्र में अनुमान का लक्षण तथा भेद
प्रदर्शित करते हुए लिखा है।
अथ३ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च ।
इस सूत्र में सूत्रकार ने अनुमान के १ 'पूर्ववत्', २ 'शेषवत्' और ३ 'सामान्यतो
दृष्ट' यह तीन भेद किए हैं। सांख्यकारिका में 'त्रिविधमनुमानमाख्यातम्'४ लिख कर
और उसकी टीका, माठरवृत्ति५ तथा चरक६ के सूत्रस्थान में भी 'प्रत्यक्षपूर्वं
त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते' लिखकर न्याय-सूत्र के अनुसार बिल्कुल इसी नाम से
१ शाबरभाष्य १।१।५ २ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १०४
३ न्याय० १।१।५ ४ सांख्यकारिका ५ ।
५ माठरवृत्ति सां० का० ५ । ६ चरक सूत्रस्थान ११, २२

अनुमाने टिप्पणयः] अनुमाननिरूपणम् ६१
अनुमान के तीन भेद किये हैं। इस प्रकार वैदिक दर्शनों में यह दो प्रकार की
'द्विविध' और 'त्रिविध' भेद वाली परम्पराएँ पाई जाती हैं।
परन्तु श्री वाचस्पति मिश्र, जिन्होंने सभी दर्शनों पर टीकाएँ लिखी हैं इन
दोनों परम्पराओं का समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी 'सांख्य-
तत्त्वकौमुदी' में पांचवीं कारिका की टीका में पहिले वैशेषिक तथा मीमांसक-
परम्परा के अनुसार अनुमान के दो भेद किए। एक वीत और दूसरा अवीत।
'तत्र अन्वयमुखेन प्रवर्तमानं विधायकं वीतम्' । और 'निषेधमुखेन प्रवर्तमानम्
अविधायकमवीतम्' । अर्थात् अन्वयमुख से प्रवर्तमान विधायक अनुमान को
'वीत' अनुमान कहते हैं। और निषेधमुख से प्रवर्तमान अविधायक अनुमान
को अवीत' अनुमान कहते हैं। इनमें से जो 'अवीत' अनुमान है वही न्याय-
परम्परा का 'शेषवत्' है।
तत्रावीतं शेषवत् । शिष्यते परिशिष्यते इति शेषः। स एव विषयतया
यस्यास्त्यनुमानज्ञानस्य तच्छेषवत् । यदाहुः प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्राप्रसङ्गाच्छि-
ष्यमाणे सम्प्रत्ययः परिशेषः' ।
अनुमान का दूसरा भेद 'वीत' है। सांख्यतत्त्वकौमुदी में इसके फिर दो भेद
किए गये हैं उनमें से एक को 'पूर्ववत्' तथा दूसरे को 'सामान्यतो दृष्ट' कहा है।
'वीतं च द्वेधा । पूर्ववत् सामान्यतो दृष्टं च । तत्रैकं दृष्टस्वलक्षणसामान्य-
विषयं तत्पूर्ववत्। पूर्वप्रसिद्धं दृष्टस्वलक्षणसामान्यमिति यावत् तदस्य विषयत्वेना-
स्त्यनुमानज्ञानस्येति पूर्ववत् । यथा धूमाद् वह्नित्वसामान्यविशेषः पर्वतेऽनुमीयते।
तस्य च वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निविशेषो दृष्टो रसवत्याम् ।
अपरं च वीतं सामान्यतो दृष्टम्, अदृष्टस्वलक्षणसामान्यविषयं यथेन्द्रियविषय-
मनुमानम् । अत्र हि रूपादिज्ञानानां क्रियात्वेन करणत्वमनुमीयते । यद्यपि
करणत्वसामान्यस्य छिदादौ वाश्यादि स्वलक्षणमुपलब्धं, तथापि यज्जातीयस्य
रूपादिज्ञाने करणत्वमनुमीयते तज्जातीयस्य करणस्य न दृष्टं स्वलक्षणं प्रत्यक्षेण ।
इन्द्रियजातीयं हि तत्करणं, न चेन्द्रियत्वसामान्यस्य स्वलक्षणमिन्द्रियविशेषः
प्रत्यक्षगोचरोऽर्वाग्दृशां यथा वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निः। सोऽयं पूर्ववतः
सामान्यतो दृष्टात् सत्यपि वीतत्वेन तुल्यत्वे विशेषः ।
इस प्रकार वाचस्पति मिश्र ने पहिले अनुमान के 'वीत' और 'अवीत' दो
भेद करके मीमांसा और वैशेषिक की द्विविध भेद वाली परम्परा का समन्वय
करने का प्रयत्न किया है। और उसके बाद त्रिविध भेद वाली न्याय तथा सांख्य-
परम्परा को प्रदर्शित किया है। वाचस्पति मिश्र का यह समन्वय केवल संख्या
१-२ सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५।

१०० तर्कभाषा अनुमाने टिप्पण्यः
भेद की सीमा तक ही रहता है अर्थ का समन्वय नहीं हो पाता है। क्योंकि
मीमांसा और वैशेषिक परम्परा में 'वीत' और 'अवीत' इन नामों तथा 'अवीत'
अर्थात् 'शेषवत्' इस भेद का उल्लेख नहीं मिलता है।
३-बौद्ध-परम्परा में अनुमान के भेद ।
अनुमान के विषय में दूसरी परम्परा बौद्धों की है। इस परम्परा में भी
दो प्रकार की धाराएँ पाई जाती हैं। प्रारम्भ में बौद्धों ने वैदिक-परम्परा का ही
अनुगमन किया है और न्यायसूत्र के अनुसार त्रिविध अनुमान का ही वर्णन
किया है। यह त्रिविध अनुमान का वर्णन बौद्धों के केवल एक ग्रन्थ 'उपायहृदयम्'
[ पृष्ठ १३ ] में पाया जाता है। 'उपायहृदयम्' को कुछ लोग नागार्जुनकृत
मानते हैं। यदि वह नागार्जुनकृत न हो, तो भी वह दिङ्नाग का पूर्ववर्ती अवश्य
होना चाहिए। इस प्रकार दिङ्नाग के पूर्व ईसा की चौथी शताब्दी तक बौद्ध
दार्शनिक भी न्याय की वैदिक-परम्परा का ही अनुगमन करते रहे। ईसा की
पाँचवीं शताब्दी में आचार्य दिङ्नाग ने, जो कि वस्तुतः बौद्ध न्याय के जन्म-
दाता हैं, इस विषय में भी वैदिक-परम्परा से भिन्न अपनी स्वतन्त्र नई परम्परा
स्थापित की और न्याय-परम्परा से भिन्न प्रकारसे अनुमान के लक्षण, भेद आदि
किए। आगे सभी बौद्ध दार्शनिकों ने दिङ्नाग की नवीन पद्धति को अपनाया है !
४-तर्कभाषा में अनुमान के भेद—
प्रकृत तर्कभाषा ग्रन्थ में अनुमान के पूर्ववत्, शेषवत्, सामान्यतो दृष्ट भेद
नहीं दिखलाए हैं। अपितु उनके स्थान पर स्वार्थानुमान और परार्थानुमान यह
दो भेद दिखलाए हैं। यह भेद मुख्यतः और स्पष्टतः वैशेषिक-परम्परा में प्रति-
पादित किए हैं।
पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम्। पञ्चाव-
यवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं
परार्थानुमानं विज्ञेयम्¹।
बौद्धों ने भी स्वार्थानुमान और परार्थानुमान के इस भेदको अपनाया है।
और उनके अनुमान के लक्षण पर भी वैशेषिक की छाया दिखाई देती है।
वैशेषिक दर्शन में अनुमान को 'लैङ्गिक' पद से निर्दिष्ट किया है। और
'लिङ्गदर्शनात् संजायमानं लैङ्गिकम्' यह उसका लक्षण किया है। बौद्धों के
'अनुमानं लिङ्गादर्थदर्शनम्²' इस लक्षण पर वैशेषिक के पूर्वोक्त 'लिङ्गदर्शनात्
संजायमानं लैङ्गिकम्' इस लक्षण की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। और
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० ११३ । २ न्याय प्र० पृ० ७, न्यायबिन्दु २।३, तत्त्व-
संग्रहकारिका १३६२ ।

द्वादश प्रमेय विचार: आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि व अपवर्ग

अनुमाने टिप्पणयः ] अनुमाननिरूपणम् १०१
उनके स्वार्थानुमान तथा परार्थानुमान भेदों पर भी वैशेषिक की
छाया स्पष्ट है । इस प्रकार यद्यपि बौद्ध दार्शनिकों ने न्याय-परम्परा के
अनुमान, लक्षण तथा भेदों का खण्डन करने का प्रबल प्रयत्न किया है फिर
भी वह वैदिक-परम्परा के प्रभाव से अपने को बचा नहीं सके हैं। न्याय-पर-
म्परा के 'अथ तत्पूर्वकमनुमानम्' इस लक्षण और 'त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेष-
वत्सामान्यतो दृष्टं च' इन भेदोंको स्वीकार न करने पर भी वैशेषिक-प्रतिपादित
अनुमान-लक्षण और भेदोंका अनुगमन उन्होंने किया ही है ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस विषय का सङ्कलन इस प्रकार किया है ।
द्वैध¹मत्रानुमानं यत्, परार्थस्वार्थभेदतः ।
संविभक्तं तदन्यत्र चान्यथा तु द्विधा त्रिधा ॥ १ ॥
पूर्ववच्छेषवच्चैव दृष्टं सामान्यतस्तथा ।
सूत्रकारेण न्याये तु भेदस्तस्य त्रिधा कृतः ॥ २ ॥
सांख्ये वीतमवीतं च पूर्वं तावद् द्विधा कृतम् ।
वीतं पुनर्द्विधा कृत्वा तृतीयं शेषवन्मतम् ॥ ३ ॥
तत्र न्यायस्य भेदानां व्याख्या भाष्ये द्विधा कृता ।
न्याय एव तयोराद्या परा सांख्येऽपि सम्मता ॥ ४ ॥
त्रिविधभेदों की न्यायाभिमत प्रथम व्याख्या—
पूर्ववत् कारणज्ञानात् कार्य यदनुमीयते ।
भाविवृष्टेर्यथा ज्ञानं मेघैर्मेदुरितेऽम्बरे ॥ ५ ॥
कार्याद्धेतोश्च यज्ज्ञानं 'शेषवत्' तत्प्रकीर्तितम् ।
भूतवृष्टेर्यथा ज्ञानं स्रोतोभेदादिभिर्भवेत् ॥ ६ ॥
कार्यकारणभावादि सम्बन्धेतरहेतुकम् ।
ज्ञानं 'सामान्यतो दृष्टं' गतिमच्चन्द्रतारकम् ॥ ७ ॥
इतीयं प्रथमा व्याख्या प्रायो न्याये समाहृता ।
क्वचित् सांख्येऽपि संदृष्टा परा सांख्यानुगापि च ॥ ८ ॥
त्रिविध भेदों की न्यायोक्त तथा सांख्याभिमत द्वितीय व्याख्या—
'पूर्ववद्' धूमवह्न्याद्योः पूर्वं प्रत्यक्षभूतयोः ।
वह्नेरनुमानं धूमात्, सांख्ये दृष्टस्वलक्षणम् ॥ ९ ॥
इन्द्रियाद्यनुमानं च करणत्वादिहेतुकम् ।
न्याये 'सामान्यतो दृष्टं' सांख्येऽदृष्टस्वलक्षणम् ॥ १० ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

१०२ तर्कभाषा [अनुमाने टिप्पण्यः
प्रसक्तप्रतिषेधे यत् परिशेषान्नियम्यते ।
सांख्येऽवीतं तु तत्प्रोक्तं न्याये तच्छेषवन्मतम् ॥ ११ ॥
द्विविध भेदवादी मत-
जैमिनीये च काणादे शेषवन्न समीरितम् ।
दृष्टं, सामान्यतो दृष्टं, संविभक्तमिति द्विधा ॥ १२ ॥
जैनैर्बौद्धैस्तथा नव्यैरनुमाननिरूपणे ।
द्वौ तु तस्य कृतौ भेदौ नूनं स्वार्थपरार्थकौ ॥ १३ ॥
५—परार्थानुमान के पञ्चावयव—
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में जो परार्थानुमान का लक्षण किया है
उसमें पञ्चावयवों का उल्लेख किया है । ‘पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-
प्रतिपादनं परार्थानुमानम्’ । तर्कभाषा में भी इसी प्रकार परार्थानुमान का लक्षण
किया है । उन पाँच अवयवों के नाम—१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण,
४ उपनयन और ५ निगमन हैं । इन पाँच अवयवों का इन्हीं नामों से न्याय-
सूत्र में उल्लेख किया गया है ।
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ।
परन्तु वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में उनके नाम—१ प्रतिज्ञा,
२ अपदेश, ३ निदर्शन, ४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय पाए जाते हैं ।
‘अवयवाः पुनः, प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः ।
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में एक विशेष बात और है कि न्याय-
दर्शन में तो केवल हेतु को दूषित मान कर हेत्वाभासोंका उल्लेख किया गया है।
तर्कभाषा में भी न्याय के अनुसार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों का वर्णन किया
गया है । परन्तु प्रशस्तपाद भाष्य में हेत्वाभासों के अतिरिक्त प्रतिज्ञाभास तथा
निदर्शनाभासों का वर्णन भी किया है ।
‘तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ।····अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्यु-
पगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनी निरस्ता भवन्ति । १ यथानुष्णोऽग्निरिति
प्रत्यक्षविरोधी । २ घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । ३ ब्राह्मणेन सुरा पेये-
त्यागमविरोधी । ४ वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी ।
५ न शब्दोऽर्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी³ ।
१ न्याय दर्शन १, १, ३२ । २ प्रशस्त० पृ० ११४ ।
३ प्रशस्तपादभाष्य पृ० ११५ ।

अनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०३
इस प्रकार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों के समान वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य
में पाँच प्रकार के प्रतिज्ञाभासों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त
निदर्शनाभासों का भी वर्णन है।
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ।···
लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
लिङ्गानुमेयोभयव्यावृत्ताश्रयासिद्धव्यावृत्तविपरीतव्यावृत्ता वैधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
अर्थात् १ लिङ्गासिद्ध, २ अनुमेयासिद्ध, ३ उभयासिद्ध, ४ आश्रयासिद्ध, ५
अननुगत, ६ विपरीतानुगत इस प्रकार ६ तरह के साधर्म्य निदर्शनाभास और
१ लिङ्गव्यावृत्त, २ अनुमेयव्यावृत्त, ३ उभयव्यावृत्त, ४ आश्रयासिद्धव्यावृत्त,
और ५ विपरीतव्यावृत्त यह पाँच प्रकार के वैधर्म्य निदर्शनाभास भी प्रशस्तपाद ने
प्रतिपादित किए हैं। इन प्रतिज्ञाभास और निदर्शनाभासों का उल्लेख न्याय में
नहीं पाया जाता है। इसीलिए न्यायप्रधान तर्कभाषा में भी उनका वर्णन नहीं
किया गया है।
६—पञ्चावयवों के प्रयोग में भेद—
न्याय और वैशेषिक दर्शनों में अनुमान के पाँच अवयवों का उल्लेख किया
गया है। परन्तु अन्य दर्शनों में इनके प्रयोग के विषय में कई मत पाए जाते
हैं। सांख्य के तार्किक, प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टान्त इन तीन अवयवों का ही प्रयोग
मानते हैं। इसका उल्लेख सांख्यकारिका की माठरवृत्ति की पाँचवीं कारिका में
मिलता है। प्रभाकर के अनुयायी मीमांसक शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरण-
पञ्चिका' में [पृष्ठ ८३, ८५] तथा कुमारिल भट्ट के अनुयायी मीमांसक पार्थसारथिमिश्र
ने 'श्लोकवार्तिक' की व्याख्या [अनुमान, श्लोक ५४] में तीन अवयवों के प्रयोग
को प्रतिपादित किया हैं। जैनों के आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने
मीमांसकों के चार अवयव मानने वाले किसी सम्प्रदाय का भी उल्लेख [प्रमेयर०
३, ३७] भी किया है परन्तु वैसा कोई प्रसिद्ध सम्प्रदाय नहीं मिलता है। क्योंकि
मीमांसकों के कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर दोनों के अनुयायी सम्प्रदाय, तीन अवयवों
का ही प्रयोग मानते हैं। बौद्ध तथा कुछ जैन तार्किक अधिक से अधिक हेतु तथा
दृष्टान्त दो अवयवों का [प्रमाणवार्तिक १, २८ स्याद्वाद र० पृ० ५५९] प्रयोग
मानते हैं अन्यथा केवल एक हेतु से भी काम चलाने का प्रतिपादन करते हैं।
[ प्रमाणवार्तिक १, २८ ] । जैन आचार्य माणिक्य नन्दी ने प्रदेश भेद की दृष्टि
से दो तथा पाँच अवयवों के प्रयोग की व्यवस्था का भी प्रतिपादन किया है।
उनके मतानुसार 'वाद' प्रदेश में तो पाँच अवयवों के प्रयोग का नियम समझना

१०४ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
चाहिए । परन्तु शास्त्र प्रदेश में अधिकारी के अनुसार दो अथवा पाँच अवयवों
का प्रयोग वैकल्पिक है। वादिदेव नामक जैन आचार्य, और बौद्ध आचार्य,
विशिष्ट विद्वानों के लिए, केवल हेतु मात्र एक अवयव का प्रयोग ही पर्याप्त
मानते हैं ।
इसके विपरीत न्याय दर्शन के 'वात्स्यायन भाष्य' में दश अवयव माननेवाले
किसी प्राचीन सम्प्रदाय का भी उल्लेख किया गया है ।
'दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये संचक्षते, जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः,
प्रयोजनं, संशयव्युदास' इति ।
न्याय में प्रतिपादित प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों के अतिरिक्त यह जिज्ञासादि
पाँच और अवयव प्राचीन आचार्य मानते थे । उनका खण्डन कर, केवल पाँच
अवयवों की उपयोगिता न्याय में प्रतिपादित की गई है और वैशेषिक में भी
पाँच ही अवयव माने गए हैं ।
७-हेतु के पञ्च रूप—
अनुमान वाक्य के पाँच अवयवों के समान हेतु के १ पक्षसत्त्व, २ सपक्ष-
सत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ असत्प्रतिपक्षत्व और ५ अबाधितविषयत्व इन पाँच
रूपों का वर्णन भी तर्कभाषा में किया गया है । कोई अन्वयव्यतिरेकी सद्धेतु
इन पाँच रूपों से उपपन्न होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकता है ।
यह न्याय का सिद्धान्त है । परन्तु हेतु के स्वरूप के विषय में भी अनेक मत हैं
जिन्हें हम मुख्यतः 'पञ्चरूपता' और 'त्रिरूपतावादी' दो वर्गों में विभक्त कर
सकते हैं । वैशेषिक, सांख्य और बौद्ध यह तीन दर्शन हेतु की त्रिरूपता को
मानते हैं । और नैयायिक पञ्चरूपतावादी हैं । वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद
भाष्य में हेतु या लिङ्ग का वर्णन करते हुए लिखा है—
२यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
जो अनुमेय अर्थात् पक्ष से सम्बद्ध पक्षसत् , और तदन्वित अर्थात् सपक्ष
में प्रसिद्ध-सपक्षसत् हो और उसके अभाव अर्थात् विपक्ष सें न हो विपक्षव्यावृत्त
हो वही लिङ्ग अनुमापक होता है । इस प्रकार पक्षसत्त्व, और विपक्षव्यावृत्तत्व
यह तीन ही हेतु के धर्म वैशेषिक दर्शन में माने गए हैं ।
३विपरीतमतो यत्स्यादेकेन द्वितयेन वा
विरुद्ध|सिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ? ॥
१ न्याय० शा० भा० १, १, ३२ । २, ३, प्रशस्तपाद पृ० ६०० ।

अनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०५
ऊपर उद्धृत दोनों कारिकाएँ प्रशस्तपाद भाष्य में पाई जाती हैं जिससे
विदित होता है कि प्रशस्तपाद ने किसी अपने पूर्ववर्ती काश्यपाचार्य के मता-
नुसार इस त्रैरूप्य-सिद्धान्त का विवेचन किया है। प्रसिद्ध रूसी विद्वान् प्रो०
श्चेरबात्स्की ने अपनी 'बुद्धिस्ट लाजिक' नामक पुस्तक के [पृ० २४] में यह प्रति-
पादन किया है कि त्रैरूप्य-सिद्धान्त के सम्बन्ध में वैशेषिक के ऊपर बौद्धों का
प्रभाव पड़ा है। बौद्धों के अभिधर्मकोश, प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश [पृ०
१] न्यायबिन्दु [२,५] हेतुबिन्दु [पृ० ९] और तत्त्वसंग्रह [कारिका
५३६२] आदि सभी ग्रन्थों में त्रैरूप्य-सिद्धान्त का ही समर्थन किया गया है
और न्यायसम्मत पञ्चरूपता का खण्डन किया गया है। सांख्यकारिका की
माठरवृत्ति में भी पाँचवीं कारिका की व्याख्या में इसी त्रैरूप्यसिद्धान्त का सम-
र्थन किया गया है। इस प्रकार वैशेषिक, सांख्य तथा बौद्ध दर्शन हेतु के पक्ष-
सत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्तत्व इन तीन धर्मों को ही स्वीकार करते हैं।
न्याय-परम्परा में इन तीन रूपों के अतिरिक्त अबाधितविषयत्व और
असत्प्रतिपक्षत्व इन दो रूपों को और सम्मिलित कर हेतु की पञ्चरूपता का
प्रतिपादन किया गया है। इस पञ्चरूपता-सिद्धान्त के प्रथम 'प्रवर्तक' कदाचित्
श्री उद्योतकराचार्य रहे हों। उनके बाद वाचस्पतिमिश्र तथा जयन्त भट्ट आदि
ने भी इस पञ्चरूपता का समर्थन किया है। और तर्कभाषा में भी उन पाँच
रूपों का वर्णन किया गया है। परन्तु यह पञ्चरूपता का सिद्धान्त न्याय-पर-
म्परा में भी उतनी दृढ़ता से अथवा मृतकमुष्टि की भाँति स्थिर नहीं रहा है।
नव्य न्याय में गदाधर भट्टाचार्य आदि ने हेतु की गमकतोपयोगी व्याप्ति तथा
पक्षधर्मताको प्राधान्य प्रदान कर वस्तुतः हेतु की त्रिरूपता का ही पोषण किया है।
जिस प्रकार हेतु की त्रिरूपता और पञ्चरूपता के विषय में मतभेद है
उसी प्रकार हेत्वाभासों की संख्या के विषय में भी मतभेद है। वैशेषिक दर्शन
ने जब हेतु की त्रिरूपता का प्रतिपादन किया उसके साथ ही हेत्वाभासों की
भी त्रिरूपता का प्रतिपादन किया है। इसके विपरीत न्याय में हेतु की पञ्चरू-
पता स्वीकार की गई है अतएव उनके यहाँ हेत्वाभास भी पांच प्रकार के माने
गए हैं। हेत्वाभासों की संख्या हेतुरूपों के साथ सम्बद्ध है।
न्याय-दर्शन में पांच हेत्वाभासों के नाम सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम,
साध्यसम, और अतीत काल कहे गये हैं। इनमें से तर्कभाषा के असिद्ध के
स्थान पर साध्यसम को और कालात्ययापदिष्ट के स्थान पर अतीत काल को
रखा जा सकता है। परन्तु उनके स्वरूप में कुछ अन्तर रहेगा।

१०६ तर्कभाषा [ उपमानम्
उपमानम् ।
अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानमुपमानम् !
यथा गवयमजानन्नपि नागरिको 'यथा गौस्तथा गवय' इति वाक्यं कुत-
श्चिदारण्यकात्पुरुषाच्छ्रुत्वा वनं गतो वाक्यार्थं स्मरन् यदा गोसादृश्यवि-
शिष्टं पिण्डं पश्यति तदा तद्वाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपि-
ण्डज्ञानमुपमानमुपमितिकरणत्वात् । गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानानन्तर-
मयमसौ गवयशब्दवाच्यः पिण्ड इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिरूपमितिः ।
उपमाननिरूपण
प्रत्यक्ष तथा अनुमान के बाद तीसरा प्रमाण उपमान है। किसी नागरिक
पुरुष ने गवय अर्थात् नील गाय को कभी नहीं देखा। उसको किसी आरण्यक
पुरुष ने बताया कि 'यथा गौस्तथा गवयः' जैसी गाय होती है वैसा ही गवय
होता है। गौ के धर्म को गवय में अतिदेश करनेवाला 'यथा गौस्तथा गवयः'
यह वाक्य अतिदेश वाक्य कहलाता है। इसको सुनने के बाद कभी वह नाग-
रिक पुरुष जङ्गल में जाकर गोसदृश एक प्राणी को देखता है और उसके साथ
ही 'यथा गौस्तथा गवयः' इस अतिदेश वाक्य का उसको स्मरण हो आता है।
इस प्रकार अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृत-गोसादृश्य-पिण्ड का ज्ञान उसको
होता है। इसी का नाम उपमान प्रमाण है। इस उपमान प्रमाण का फल या
उपमिति है संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध की प्रतीति । अर्थात् अतिदेश-वाक्यार्थ-स्मरण-
सहकृत-सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान से नागरिक पुरुष को यह ज्ञान होता है
कि इसी प्राणी का नाम गवय है। यहाँ गोसादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड, संज्ञी है,
और गवय पद उसकी संज्ञा है। इस प्रकार संज्ञा तथा संज्ञी के सम्बन्ध की
प्रतीति उपमान प्रमाण का फल है।
अतिदेश वाक्य [ यथा गौस्तथा गवयः ] के अर्थ के स्मरण के साथ गोसा-
दृश्यविशिष्ट-पिण्ड [ अर्थात् गवय प्राणी ] का ज्ञान उपमान [ प्रमाण ] है। जैसे
गवय [ नील गाय ] को न जानने वाला नागरिक [ पुरुष ] भी किसी वनवासी
[ आरण्यक ] पुरुष से 'जैसी गाय होती है वैसा ही गवय होता है' यह वाक्य
सुन कर वन में जाकर वाक्यार्थ के स्मरण करते हुए जब गोसादृश्यविशिष्ट-
पिण्ड को देखता है [ अथवा उस पिण्ड को देख कर उस अतिदेश का जब उसको
स्मरण होता है ] तब उस वाक्यार्थ के स्मरणसहित उस गोसादृश्यविशिष्ट
पिण्ड का ज्ञान उपमिति [ संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरूप फल ] का कारण
होने से उपमान प्रमाण [ कहलाता ] है। गोसादृश्यविशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान के
बाद यह पिण्ड [ ही ] गवयपदवाच्य है इस प्रकार की संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की

उपमानप्रयोजनम् ] उपमाननिरूपणम् १०७
सैव फलम् । इदन्तु प्रत्यक्षानुमानासाध्यप्रमासाधकत्वात् प्रमाणान्तर-
मुपमानमस्ति ।
इति व्याख्यातमुपमानम् ।
प्रतीति उपमिति है। वही [ उपमान प्रमाण का ] फल है। प्रत्यक्ष तथा
अनुमान से असाध्य प्रमा का साधन होने से उपमान अलग प्रमाण है।
उपमान की इस प्रकार व्याख्या हो गई है।
वैशेषिक, सांख्य तथा योग दर्शन में उपमान को अलग प्रमाण नहीं माना
गया है। वाचस्पतिमिश्र ने 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' में उपमान के स्वरूप के विषय
में तीन पक्ष दिखा कर उन तीनों अवस्थाओं में उसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष,
अनुमान अथवा शब्द प्रमाण में कर लिया है। परन्तु उदयनाचार्य ने संज्ञा-
संज्ञि-सम्बन्ध के ग्रहण के लिए उपमान को आवश्यक माना है। हमने अपनी
दर्शनमीमांसा में उपमान का निरूपण इस प्रकार किया है।
प्रसिद्धार्थस्य साधर्म्यादप्रसिद्धप्रसाधनम् ।
उपमितिर्हेतुस्तस्या उपमानं सादृश्यधीः ॥ १ ॥
गवयं यो न जानाति गां जानाति स्वरूपतः ।
यथा गौर्गवयोऽप्येवं तं च कश्चिद् विबोधयेत् ॥ २ ॥
वनं प्राप्तो यदा पिण्डं पश्यति गोनिभं तु सः ।
संस्मरन्नतिदेशं तु गवयं निश्चिनोति तम् ॥ ३ ॥
तत्रातिदेशवाक्यार्थं उपमानं सादृश्यधीः ।
उपमितिः संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य ग्रहस्तथा ॥ ४ ॥
उपमाने विप्रतिपत्तिं दर्शयति,
उपमानं पृथङ् मानं न्याये यत्तु प्रकीर्तितम् ।
न तत् सांख्ये न वा योगे न च वैशेषिके मतम् ॥ ५ ॥
अनुमानेऽथवा शब्दे क्वचित् प्रत्यक्षके तथा ।
अन्तर्भाव्य पृथक् तस्य प्रामाण्यं खण्डितं तु तैः ॥ ६ ॥
न्यायमतेन तदुपपादयति,
सम्बन्धस्य परिच्छेदः संज्ञायाः संज्ञिना सह ।
उपमानाद् भवेदाशु न तु शब्दादिभिस्तथा ॥ ७ ॥
तस्मादुपमानं न्याये प्रमाणन्तु पृथङ् मतम् ।
नान्तर्भावो भवेदस्य न्याय्यो न्यायनये क्वचित् ॥ ८ ॥

१०८ तर्कभाषा [ वाक्यलक्षणम्
शब्दः।
आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथाभूतस्यार्थस्योपदेष्टा पुरुषः । वाक्यं
त्वाकाङ्क्षायोग्यतासन्निधिमतां पदानां समूहः। अतएव 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती'
इति पदानि न वाक्यम् । परस्पराकाङ्क्षाविरहात् । 'वह्निना सिञ्चेदि'ति
न वाक्यं योग्यताविरहात् । नह्यग्निसकयोः परस्परान्वययोग्यतास्ति ।
तथाहि अग्निनेति तृतीयया सेकरूपं कार्यं प्रति करणत्वमग्नेः प्रतिपादितम् ।
न चाग्निः सेके करणीभवितुं योग्यः । तेन कार्यकारणभावलक्षणसम्बन्धे-
ऽग्निसकयोरयोग्यत्वादग्निना सिञ्चेदिति न वाक्यम् ।
एवमेकैकशः प्रहरे प्रहरे असहोच्चारितानि 'गामानय' इत्यादि पदानि
न वाक्यम् । सत्यामपि परस्पराकाङ्क्षायां सत्यामपि परस्परान्वययोग्य-
तायां परस्परसन्निध्याभावात् । यानि तु साकाङ्क्षाणि योग्यतावन्ति
सन्निहितानि पदानि तान्येव वाक्यम् । यथा—ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो
शब्दनिरूपणम्
प्रत्यक्ष, अनुमान तथा उपमान के बाद चौथा प्रमाण शब्द है । शब्द
प्रमाण में संकेतग्रह के अवसर पर अनुमान की आवश्यकता पड़ती है इसलिए
अनुमान के अनन्तर शब्द को रखा गया है । आगे शब्द प्रमाण का निरूपण
प्रारम्भ करते हैं ।
आप्त [ पुरुष के ] वाक्य [ को ] शब्द [ प्रमाण कहा जाता ] है । यथाभूत
अर्थ का उपदेश करनेवाला पुरुष आप्त [ कहलाता ] है [ और उसका वाक्य शब्द
प्रमाण है] आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पदों के समूह को वाक्य कहते
हैं । इसलिए परस्पर आकांक्षा-विरहित होने से गाय, घोड़ा, मनुष्य, हाथी आदि
पद [ का समूह ] वाक्य नहीं है । [ इसी प्रकार ] योग्यता के अभाव होने से
अग्नि से सींचता है यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है। अग्नि और सेचन में परस्पर
अन्वय की योग्यता नहीं है [ क्योंकि ] अग्नि से इस तृतीया [ विभक्ति ] से सेचन
रूप कार्य के प्रति अग्नि की करणता प्रतिपादित की है और अग्नि-सेचन का
करण होने योग्य नहीं है । इसलिए सेचन और अग्नि के कार्य-कारणभाव रूप
सम्बन्ध के अयोग्य होने से अग्नि से सींचता है। यह [ पदसमूह ] वाक्य नहीं है।
इसी प्रकार एक एक करके प्रहर-प्रहर के बाद अलग-अलग उच्चारित 'गाय को
ले आओ' इत्यादि पद [ समूह ] वाक्य नहीं है। [ उनमें ] परस्पर अन्वय की
आकांक्षा रहते हुए भी और परस्पर अन्वय की योग्यता होते हुए भी परस्पर
सन्निधि न होने से [ वे वाक्य नहीं कहलाते हैं ] जो आकांक्षा युक्त, योग्यता
युक्त, और सन्निधि युक्त पद हैं वे ही वाक्य [ कहलाते ] हैं। जैसे स्वर्ग की इच्छा

आकाङ्क्षादयः ] शब्दनिरूपणम् १०६
यजेत्-इत्यादि । यथा च-नदीतीरे पञ्चफलानि सन्ति-इति । यथा च
तान्येव गामानय-इत्यादिपदान्यविलम्बितोच्चरितानि ।
नन्वत्रापि न पदानि साकाङ्क्षाणि किन्त्वर्थाः फलादीनामाधेयानां
तीराद्याधाराकाङ्क्षितत्वात् । न च विचार्यमाणेऽर्था अपि साकाङ्क्षाः ।
आकाङ्क्षाया इच्छात्मकत्वेन चेतनधर्मत्वात् ।
सत्यम् । अर्थास्तावत् स्वपदश्रोतर्यन्त्योन्यविषयाकाङ्क्षाजनकत्वेन
साकाङ्क्षा इत्युच्यन्ते । तद्द्वारेण तत्प्रतिपादकानि पदान्यपि साकाङ्क्षाणी-
त्युपचर्यन्ते । यद्वा पदान्येवार्थान् प्रतिपाद्यार्थान्तरविषयाकाङ्क्षाजनकानी-
त्युपचारात् साकाङ्क्षाणि । एवमर्थाः साकाङ्क्षाः परस्परान्वययोग्याः ।
तद्द्वारेण पदान्यपि परस्परान्वययोग्यानीत्युच्यन्ते ।
रखनेवाला ज्योतिष्टोम [ नामक ] याग करे, इत्यादि [ वैदिक वाक्य ] । और जैसे
नदी तीर पर पाँच फल [ के वृक्ष ] हैं, यह [ लौकिक वाक्य है ] । और जैसे
अविलम्ब से उच्चरित वही 'गाय को ले आओ' इत्यादि पद [ वाक्य हो जाते हैं ] ।
[ प्रश्न ] यहां [ वाक्य के उदाहरणों में ] भी पद आकांक्षा युक्त नहीं हैं
किन्तु फलादि आधेयों [ रूप अर्थों ] को तीरादि आधार [ रूप अर्थ ] की
आकांक्षा होने से, अर्थ ही आकांक्षा युक्त हैं । और [ वास्तव में ] विचार करने
पर आकांक्षा के इच्छात्मक, अतः चेतन [ आत्मा ] का धर्म होने से अर्थ भी
साकांक्ष नहीं है [ इसलिए आकांक्षा को पद का विशेषण कहना उचित नहीं है ।
यह पूर्वपक्ष हुआ । इसका उत्तर आगे देते हैं ]
[ उत्तर ] ठीक है [ आकांक्षा साक्षात् पदों में नहीं रहती किन्तु ] अर्थ अपने
[ वाचक ] पद को सुनने वाले [ के मन ] में एक दूसरे [ पद ] के विषय में
आकांक्षा के जनक होने से [ परम्परया ] साकांक्ष कहलाते हैं । उन [ अर्थों ]
के द्वारा उनके प्रतिपादक पद भी [ परम्परया ] उपचार से साकांक्ष कहे जाते हैं ।
अथवा पद ही अर्थों का प्रतिपादन कर के दूसरे अर्थों के विषय में आकांक्षा को
उत्पन्न करते हैं इसलिए उपचार [ गौण रूप ] से साकांक्ष कहे जाते हैं । इसी प्रकार
[ परम्परा से ] अर्थ [ भी ] साकांक्ष परस्पर अन्वययोग्य [ योग्यताविशिष्ट ]
होते हैं और उनके द्वारा पद भी परस्पर अन्वय योग्य कहलाते हैं । [ अर्थात्
योग्यता और आकांक्षा यह दोनों धर्म यद्यपि साक्षात् पदों के धर्म नहीं हैं । योग्यता
साक्षात् पदार्थ का धर्म, और आकांक्षा साक्षात् आत्मा का धर्म है फिर भी उपर्युक्त
प्रकार से उपचार से वह दोनों, पदों के धर्म हो सकते हैं । ऐसा मान कर ही वाक्य
के लक्षण में योग्यता और आकांक्षा को पद का विशेषण बनाया है ] ।

११० तर्कभाषा [ पदलक्षणम्
सन्निहितत्वं तु पदानामेकेनैव पुंसा अविलम्बेनोच्चरितत्वम् । तच्च
साक्षादेव पदेषु सम्भवति नार्थद्वारा ।
तेनाऽयमर्थः सम्पन्नः । अर्थप्रतिपादनद्वारा श्रोतुः पदान्तरविषया
मर्थान्तरविषयां वाकाङ्क्षां जनयतां प्रतीयमानपरस्परान्वययोग्यार्थप्रतिपाद-
कानां सन्निहितानां पदानां समूहो वाक्यम् ।
पदं च वर्णसमूहः । समूहश्चात्र एकज्ञानविषयीभावः । एवं च वर्णानां
क्रमवतामाशुतरविनाशित्वेन एकदाऽनेकवर्णानुभवासम्भवात् पूर्वपूर्ववर्णा-
ननुभूय, अन्त्यवर्णश्रवणकाले पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहकृतेन
अन्त्यवर्णसम्बन्धेन पदव्युत्पादनसमयग्रहानुगृहीतेन श्रोत्रेणैकदैव सदसद-
नेकवर्णावगाहिनी पदप्रतीतिर्जन्यते, सहकारिदाढर्यात् प्रत्यभिज्ञानवत् ।
प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षे ह्यतीतापि पूर्वावस्था स्फुरत्येव । ततः पूर्वपूर्वपदानुभव-
जनितसंस्कारसहकृतेनान्त्यपदविषयेण श्रोत्रेन्द्रियेण पदार्थप्रत्ययानुगृहीते-
नानेकपदावगाहिनी वाक्यप्रतीतिः क्रियते ।
एक ही पुरुष द्वारा पदों का अविलम्ब से उच्चरितत्व सन्निधि [कहलाती] है ।
और वह पदों में साक्षात् ही हो सकती है अर्थ द्वारा [मानने की आवश्यकता] नहीं ।
इस लिए [ वाक्य के लक्षण का ] यह अर्थ हुआ कि, अर्थ प्रतिपादन द्वारा
अन्य पदों अथवा अन्य अर्थों के विषय में श्रोता की आकांक्षा को पैदा करने वाले
और प्रतीयमान [ स्पष्ट रूप से ] परस्पर अन्वययोग्य अर्थ के प्रतिपादक सन्निधि
युक्त पदों का समूह वाक्य [ कहलाता ] है ।
और वर्णसमुदाय पद [ कहलाता ] है । समूह [ का अर्थ ] यहां [ पद के
लक्षण में] 'एक ज्ञान का विषय होना' है। इस प्रकार क्रमिक और क्षणिक [आशु-
तर विनाशी ] अनेक वर्णों का एक साथ अनुभव असम्भव होने से पूर्व पूर्व वर्णों
का अनुभव करके अन्तिम वर्ण के श्रवण काल में पूर्व पूर्व वर्णों के अनुभव से
जनित संस्कारसहकृत, पद-व्युत्पादनसमयग्रह से अनुगृहीत, अन्त्यवर्ण-सम्बद्ध
श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यभिज्ञा के समान सहकारी [ संस्कार ] के प्राबल्य से, सत्
[ अन्तिम वर्ण ] और असत् पूर्व वर्णों का अवगाहन करने वाली पद की
प्रतीत होती है । प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष [ 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि ] में अतीत
पूर्वावस्था भी [ जो 'सः' पद से सूचित होती है ] प्रतीत [ स्फुरित ] होती ही है ।
[ इसी प्रकार सदसदनेक वर्णों की प्रतीति भी एक साथ हो सकती है ] । उस
[ पदप्रतीति ] के बाद [ उसी क्रम से ] पूर्व पूर्व पदानुभव-जनित संस्कार-सह-
कृत, पदार्थबोध से अनुगृहीत अन्त्यपदविषयक श्रोत्रेन्द्रिय से [ सदसद् ] अनेक
पदों को ग्रहण करने वाली [ पदसमूहात्मक ] वाक्य की प्रतीति होती है ।

शब्दे टिप्पण्यः ] शब्दनिरूपणम् १११
तदिदं वाक्यमाप्तपुरुषेण प्रयुक्तं सच्छब्दनामकं प्रमाणम् । फलन्त्वस्य
वाक्यार्थज्ञानम् । तच्चैतच्छब्दलक्षणं प्रमाणं लोके वेदे च समानम् ।
लोके त्वयं विशेषो यः कश्चिदेवाप्तो भवति, न सर्वः । अतः किञ्चिदेव
लौकिकं वाक्यं प्रमाणं, यदाप्तवक्तृकम् । वेदे तु परमाप्तश्रीमहेश्वरेण कृतं
सर्वमेव वाक्यं प्रमाणं, सर्वस्यैवाप्तवाक्यत्वात् ।
यही वाक्य आप्त पुरुष से प्रयुक्त होने पर शब्द नामक प्रमाण [कहा जाता]
है । और इसका फल वाक्यार्थज्ञान होता है । यह शब्द प्रमाण लोक तथा वेद
में [ दोनों जगह ] समान है । लोक में इतनी विशेषता है कि कोई कोई पुरुष ही
आप्त होता है सब नहीं । इसलिए कोई कोई लौकिक वाक्य ही प्रमाण होता है
जो कि आप्त पुरुष द्वारा कहा हुआ होता है । वेद में परम आप्त परमात्मा से
कृत सब ही वाक्य प्रमाण हैं । सब ही [ वाक्यों ] के आप्त वाक्य होने से ।
१-वैशेषिक मत—
न्याय दर्शन में प्रत्यक्षादि चार प्रमाण माने हैं परन्तु न्याय के 'समानतंत्र'
कहलाने वाले वैशेषिक दर्शन ने केवल दो ही प्रमाण माने हैं । प्रत्यक्ष और
अनुमान । इनके अतिरिक्त उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और
अभाव इन छहों प्रमाणों का वैशेषिक दर्शन ने अनुमान में ही अन्तर्भाव किया
है । यों तो बौद्धों ने भी प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं और
चार्वाक ने केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण माना है । परन्तु वैशेषिक दर्शन तो आस्तिक
दर्शन है । 'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः' की प्रतिज्ञा से इस दर्शन का आरम्भ
हुआ है और 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' । यह वैशेषिक दर्शन का तृतीय
सूत्र है, जिसमें वेद के प्रामाण्य का स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है । फिर भी
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में शब्द को अलग प्रमाण न मान कर
उसका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है यह आश्चर्य की बात है । शब्द का
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हुए प्रशस्तपाद भाष्य में लिखा है—
'शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्या-
सन्दिग्धलिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादि-
१ वै० १,१,१ । २ वै० १,१,३ ।

११२ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
भ्योऽपीति । श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, तद्वचनादाम्ना-
यप्रामाण्यम् । लिङ्गाच्चानित्यो बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे, बुद्धिपूर्वो ददातिरि-
त्युक्तत्वात्¹ ।'
शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव समानविधि के कारण किया गया है । जैसे
अनुमान में १ व्याप्तिग्रह, २ लिङ्गज्ञान, ३ व्याप्तिस्मृति, के बाद, ४ अनुमिति
उत्पन्न होती है। इसी प्रकार शब्द प्रमाण में १ संकेतग्रह, २ वाक्यश्रवण,
३ पदार्थस्मृति के बाद, ४ शाब्दबोध होता है। इसलिए अनुमान तथा शब्द
की विधि समान होने से वैशेषिक दर्शन ने शब्द का अनुमान में ही अन्तर्भाव
मान लिया है।
वैशेषिक दर्शन ने न केवल शब्द प्रमाण का अन्तर्भाव अनुमान में
किया है अपितु श्रुति तथा स्मृति रूप आम्नाय को भी अनित्य और 'वक्तृ-
प्रामाण्याधीनप्रामाण्य' माना है। 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' और
'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे' इन सूत्रों से वेद की अनित्यता और परतः
प्रामाण्य का प्रतिपादन किया है। इस प्रकार वैशेषिक दर्शन ने वेद को '
मीमांसा के स्वतः प्रामाण्य के स्थान पर 'तद्वचनात् प्रामाण्य' मानकर परतः
प्रमाण माना है। और न्याय जो शब्द को स्वतंत्र प्रमाण मानता है उसके
स्थान पर शब्द का अनुमान में अन्तर्भाव दिखाया है। यह उसका मीमांसा
और न्याय दोनों से भेद है।
२-प्रभाकर-सम्मत मीमांसक-मत-
मीमांसकों में कुमारिल भट्ट तथा प्रभाकर के अनुयायी दो अलग-अलग
सम्प्रदाय हैं। इनमें से प्रभाकर-सम्प्रदाय के अनुयायी शालिकनाथ मिश्र आदि
भी वैशेषिक के समान शब्द प्रमाण का अनुमान में अन्तर्भाव करते हैं। परन्तु
उनमें भेद यह है कि वह वैदिक वाक्यों को तो अलग शब्द प्रमाण मानते हैं
परन्तु लौकिक वाक्यों को अलग शब्द प्रमाण नहीं मानते हैं। उनका अभिप्राय
यह है कि शब्द प्रमाण का फल 'पदार्थ-संसर्गबोध' रूप शाब्दबोध है। लौकिक
वाक्यों में प्रामाण्य के लिए 'आप्तोक्तत्व' का ज्ञान आवश्यक है। आप्त पुरुष
वही है जिसको कहे जानेवाले वाक्य के अर्थ का यथार्थ ज्ञान हो। इसलिए
'पदार्थ-संसर्ग' रूप 'वाक्यार्थ' वक्ता के ज्ञान के अन्तर्गत हो जाता है और उसका
ज्ञान अनुमान द्वारा हो सकता है। इसलिए लौकिक वाक्य को शब्द प्रमाण
नहीं कहा जा सकता। वह तो अनुमान द्वारा गृहीत 'पदार्थ-संसर्ग' का अनुवादक
मात्र ही हो सकता है। परन्तु वैदिक वाक्य के अपौरुषेय होने के कारण उनमें
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० १०७ । २ वै० १,१।१ ३ वै० ६, १, १ ।

शब्दे टिप्पणयः ] शब्दनिरूपणम् ११३
'आप्तोक्तत्व' ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वैदिक वाक्य प्रमाण ही
है। यह प्रभाकर सम्प्रदाय का मत है। न्यायकुसुमाञ्जलिकार श्री उदयनाचार्य
ने इस विषय में दो कारिकाएँ लिख कर इस पक्ष का खण्डन किया है।
प्राभाकरास्तु, वेदस्यापौरुषेयतया तत्र वक्तृज्ञानानुमानासम्भवात् शब्दः
प्रमाणम् । लोके त्वाप्तोक्तत्वज्ञानमपेक्षितम् । तथा च 'अयं वक्ता स्वप्रयुक्तवाक्यार्थ-
यथार्थज्ञानवान्, भ्रमाद्यजन्यवाक्यार्थज्ञानजन्यवाक्यप्रयोक्तृत्वात्' इत्यनुमानाद्
वक्तृज्ञानावच्छेदकतया, उत्तरकालं वा 'एते पदार्थाः परस्परं संसृष्टा वक्तृयथार्थ-
ज्ञानविषयत्वात्' इत्यनुमानात्साक्षाद् वाक्यार्थसिद्धेः, कॢप्तसामर्थ्यात् शब्दा-
त्पुनरन्वयधीरित्यनुवादको लौकिकः शब्दो न प्रमाणमिति प्राहुः ।
तन्नाह—
निर्णीतशक्तेर्वाक्याद्धि प्रागेवार्थस्य निर्णये ।
व्याप्तिस्मृतिविलम्बेन लिङ्गस्यैवानुवादिता ॥
व्यस्तपुंदूषणाशङ्कैः स्मारितत्वात् पदैरमी ।
अन्विता इति निर्णीते वेदस्यापि न तत्कुतः १॥
पूर्वपक्षी प्रभाकर पदार्थसंसर्ग का बोध पहिले अनुमान की प्रक्रिया से और पीछे
शब्द की प्रक्रिया से मान कर शब्द को 'अनुवादक' और अनुमान को 'प्रमाण'
कहना चाहते हैं। उत्तर पक्ष का कहना यह है कि अनुमान की प्रक्रिया में
व्याप्ति स्मृति में विलम्ब होगा और शब्द की प्रक्रिया से वैदिक वाक्यों में
'संसर्गबोध की शक्ति निर्णीत हो चुकी है। अतः निर्णीतशक्तिक वाक्य से पहिले
'संसर्ग' का बोध हो जायगा और अनुमान की प्रक्रिया से विलम्ब से संसर्ग
का बोध होगा, इसलिए अनुमान ही 'अनुवादक' है। और यदि इस पर भी
लौकिक वाक्य को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं तो फिर वैदिक वाक्यों में भी
'अमी वैदिकाः पदार्थाः परस्परं संसर्गवन्तः, व्यस्तपुन्दूषणाशङ्कैः पदैः स्मारि-
तत्वात्' इस अनुमान से पहिले संसर्ग का निर्णय हो जाने से वैदिक वाक्य
को भी 'अनुवादक' मानना होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि या तो लौकिक
और वैदिक दोनों प्रकार के वाक्यों को 'अनुवादक' मानो और या फिर दोनों
को प्रमाण मानो। प्रभाकर जो केवल वैदिक वाक्यों को 'प्रमाण' और लौकिक
वाक्यों को 'अनुवादक' कहना चाहते हैं उनका यह 'अर्धजरतीय न्याय'
ठीक नहीं है।
३—अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद—
'पदार्थ-संसर्ग बोध' को 'वाक्यार्थ' कहते हैं यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है।
परन्तु इस 'संसर्गबोध' के विषय में भी मीमांसकों में कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर
१ न्यायकुसुमाञ्जलि ३, १४, १५ हरिदासीय विवृतिः ।
८ त० भा०

११४ तर्कभाषा [ शब्दे टिप्पण्यः
वर्णितानि चत्वारि प्रमाणानि । एतेभ्योऽन्यन्न प्रमाणम्, प्रमाणस्य
सतोऽत्रैवान्तर्भात् ।
दोनों के अलग अलग मत पाए जाते हैं । जिनको क्रमशः 'अभिहितान्वयवाद'
और 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं। कुमारिल भट्ट 'अभिहितान्वयवाद' के
मानने वाले हैं । उनके अनुसार वाक्य को सुनने पर पहिले 'अभिधा' शक्ति
द्वारा पदों से पदार्थों की प्रतीति होती है । और उसके बाद उन पदार्थों का
परस्पर सम्बन्ध 'तात्पर्याशक्ति' द्वारा होता है। पहिले पदार्थ 'अभिहित' अर्थात्
अभिधा शक्ति से बोधित होते हैं और पीछे उनका 'अन्वय' या परस्पर संसर्गबोध
होता है । इसीको 'अभिहितान्वयवाद' कहते हैं । कुमारिल भट्ट इसी सिद्धान्त
को माननेवाले हैं और उनके मत में 'तात्पर्याशक्ति' भी अलग मानी जाती है ।
इसके विपरीत प्रभाकर के मत में अभिधा शक्ति से 'केवल' पदार्थों की
नहीं, अपितु 'अन्वित' पदार्थों की ही उपस्थिति होती है । क्योंकि अभिधाशक्ति
के लिए आवश्यक, सङ्केत का ग्रहण 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु 'अन्वित
पदार्थ में ही होता है।' सङ्केत का ग्राहक मुख्यतः 'व्यवहार' है। और
'व्यवहार' 'केवल' पदार्थ में नहीं अपितु किसी दूसरे के साथ सम्बद्ध या अन्वित
पदार्थ में ही होता है । इसलिए 'सङ्केतग्रह' भी किसी 'अन्वित' पदार्थ में ही
हो सकता है । इसीलिए अभिधा शक्ति से अन्वित अर्थ ही अभिहित हो सकता
है, 'केवल' पदार्थ नहीं । इसी को 'अन्विताभिधानवाद' कहते हैं । इस मत
में पदार्थों का संसर्गबोध करानेवाली 'तात्पर्या' शक्ति की अलग आवश्यकता
नहीं पड़ती है ।
चारों प्रमाणों का वर्णन हो गया । इनसे अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं
है । प्रमाणभूत [ अन्य सब ] का इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाने से [ केवल चार
ही प्रमाण हैं ] ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में लिखा है—
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाका बौद्धा वैशेषिका द्वयम् ।
सांख्या योगास्त्रयं चैव तार्किकाश्च चतुष्टयम् ॥
पंच प्राभाकरा, भाट्टास्तथा वेदान्तिनश्च षट् ।
पौराणिकास्तथा चाष्टौ प्रमाणानि ब्रुवन्ति वै ॥
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अर्थापत्तिखण्डनम् ] अर्थापत्तिनिरूपणम् ११५
अर्थापत्तिः
नन्वर्थापत्तिरपि पृथक् प्रमाणमस्ति । अनुपपद्यमानार्थदर्शनात् तदु-
पपादकीभूतार्थान्तरकल्पनम् ‘अर्थापत्तिः’ । तथाहि, पीनो देवदत्तो दिवा
न भुङ्क्ते इति दृष्टे श्रुते वा रात्रिभोजनं कल्प्यते । दिवाऽभुञ्जानस्य
पीनत्वं रात्रिभोजनमन्तरेण नोपपद्यतेऽतः पीनत्वान्यथानुपपत्तिप्रसूता-
र्थापत्तिरेव रात्रिभोजने प्रमाणम् । तच्च प्रत्यक्षादिभ्यो भिन्नं, रात्रिभोज-
नस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वात् ।
नैतत् । रात्रिभोजनस्यानुमानविषयत्वात् । तथाहि, अयं देवदत्तो
अर्थापत्तिः
नैयायिक लोग प्रत्यक्षादि चार ही प्रमाण मानते हैं । शेष प्रमाणों का
अन्तर्भाव इन्हीं चार प्रमाणों में कर लेते हैं । इन शेष प्रमाणों में 'अर्थापत्ति'
और 'अभाव' ये दोनों मुख्य प्रमाण हैं । इसलिए इन दोनों का अन्तर्भाव
दिखलाने का प्रयत्न तर्कभाषाकार ने किया है । शेष 'ऐतिह्य' और 'सम्भव' का
अन्तर्भाव बहुत स्पष्ट है और वे प्रमाण भी मुख्य नहीं हैं इसलिए उनका अन्त-
र्भाव तर्कभाषाकार ने नहीं दिखाया है । आगे 'अर्थापत्ति' का 'केवलव्यतिरेकी'
अनुमान में अन्तर्भाव दिखाते हैं । मीमांसक और वेदान्ती आदि जो लोग
अर्थापत्ति को पृथक प्रमाण मानते हैं वे अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद नहीं
मानते हैं । और नैयायिक अनुमान का केवल व्यतिरेकी भेद मानते हैं
इसलिए वह 'अर्थापत्ति' को अलग प्रमाण नहीं मानते हैं । इसीलिए 'अर्था-
पत्ति' का 'केवल व्यतिरेकी' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं ।
[ पूर्वपक्षी प्रश्न ] अच्छा, अर्थापत्ति भी तो पृथक् प्रमाण है । [ उसका
लक्षण ] अनुपद्यमान अर्थ को देखकर उसके उपपादक अर्थ की कल्पना करना
अर्थापत्ति [ कहलाती ] है । जैसे कि देवदत्त दिन में नहीं खाता है परन्तु मोटा
है ऐसा देखने या सुनने पर [ उसके ] रात्रिभोजन की कल्पना कर ली जाती है ।
[ क्योंकि ] दिन में न खाने वाले का मोटा होना रात्रिभोजन के बिना नहीं बन
सकता है । इसलिए अन्यथा [ अर्थात् रात्रि भोजन के बिना ] पीनत्व की अनुप-
पत्ति ही [ उसके ] रात्रि भोजन में प्रमाण होती है । और वह [ अर्थापत्ति ]
प्रमाण रात्रि भोजन के प्रत्यक्षादि का विषय न होने से प्रत्यक्षादि से भिन्न
[ अलग ही प्रमाण ] है ।
[ उत्तर ] यह बात नहीं है । रात्रि भोजन के अनुमान का विषय [ अनुमान
गम्य ] होने से [ अर्थापत्ति को अलग प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है ]