सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

६८ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
२ अनुमान का लक्षण और भेद ।
अनुमान प्रमाण के विषय में दार्शनिक जगत् में तीन प्रकार की परम्पराएँ
पाई जाती हैं। एक वैदिक-परम्परा, दूसरी बौद्ध-परम्परा और तीसरी नव्य न्याय
की परम्परा । अनुमान के लक्षण और भेदों का निरूपण सबसे पहिले वैदिक-
परम्परा में ही प्रारम्भ हुआ । इस वैदिक-परम्परा की भी दो धाराएँ मिलती
हैं । एक धारा तो वैशेषिक और मीमांसा की विचारधारा है और दूसरी धारा
में न्याय, सांख्य और चरक इन शास्त्रों का समावेश किया जा सकता है । इन
दोनों में भेद यह है कि वैशेषिक और मीमांसा वाली परम्परा में अनुमान के
दो भेद किए गए हैं और न्याय, सांख्य तथा चरक वाली परम्परा में दो के
स्थान पर तीन भेद किए गए हैं। पहिली वैशेषिक और मीमांसक परम्परा का
ज्ञान हमको 'प्रशस्तपादभाष्य' तथा 'शाबरभाष्य' में होता है। उन दोनों ने
अनुमान के दो भेद करते हुए लिखा है।
तत्तु द्विविधम्। प्रत्यक्षतो दृष्टसम्बन्धं सामान्यतो दृष्टसम्बन्धं च । [ मीमांसा१ ]
तत्तु द्विविधम् । दृष्टं सामान्यतो दृष्टं च । [ वैशेषिक२ ]
अर्थात् मीमांसा और वैशेषिक दोनों दर्शनों में अनुमान के दो भेद माने
हैं एक 'दृष्ट' अथवा 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' और दूसरा 'सामान्यतो दृष्ट' । इन दोनों
दर्शनों में दूसरा भेद तो 'सामान्यतो दृष्ट' नाम से ही दोनों जगह कहा
गया है । परन्तु पहिले भेद को एक जगह 'प्रत्यक्षतो दृष्ट' तथा दूसरी जगह
केवल 'दृष्ट' शब्द से कहा गया है । परन्तु वह कोई विशेष महत्त्व की बात
नहीं है। दोनों लगभग समान ही हैं।
इसके विपरीत न्याय, सांख्य तथा चरक की परम्परा में अनुमान के तीन
प्रकारों का वर्णन पाया जाता है । न्याय-सूत्र में अनुमान का लक्षण तथा भेद
प्रदर्शित करते हुए लिखा है।
अथ३ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च ।
इस सूत्र में सूत्रकार ने अनुमान के १ 'पूर्ववत्', २ 'शेषवत्' और ३ 'सामान्यतो
दृष्ट' यह तीन भेद किए हैं। सांख्यकारिका में 'त्रिविधमनुमानमाख्यातम्'४ लिख कर
और उसकी टीका, माठरवृत्ति५ तथा चरक६ के सूत्रस्थान में भी 'प्रत्यक्षपूर्वं
त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते' लिखकर न्याय-सूत्र के अनुसार बिल्कुल इसी नाम से
१ शाबरभाष्य १।१।५ २ प्रशस्तपादभाष्य पृ० १०४
३ न्याय० १।१।५ ४ सांख्यकारिका ५ ।
५ माठरवृत्ति सां० का० ५ । ६ चरक सूत्रस्थान ११, २२