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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 330 में से

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पृष्ठ 162

अनुमाने टिप्पणयः ] अनुमाननिरूपणम् ६७
विपर्यय का ग्रहण अनुमान से ही होता है । इसलिए जब चार्वाक दूसरे को
यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब वह उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय का अनुमान करके ही ऐसा कहता है। उस दशा में उसके लिए अनु-
मान प्रमाण मानना अपरिहार्य है। और यदि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय के जाने बिना वह यों ही किसी को पकड़ कर कहने लगता है कि भाई
अनुमान प्रमाण नहीं है तो वह उन्मत्त ही समझा जायगा। इसलिए किसी के
साथ इस विषय में बुद्धिपूर्वक बात करने के लिए उसके अज्ञान, सन्देह या
विपर्यय आदि का ज्ञान आवश्यक है। और उसके ज्ञान के अनुमान को छोड़
कर दूसरा कोई साधन नहीं है। इसलिए 'अकामेनापि अनुमानं प्रमाणमभ्यु-
पेयम्' । न चाहते हुए भी चार्वाक को अनुमान प्रमाण मानना ही होगा ।
एक बात और भी है। चार्वाक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है और
जो चीज प्रत्यक्ष नहीं उसका अस्तित्व नहीं मानना चाहता है। ऐसी दशा में घर
से बाहर आने पर चार्वाक को अपने गृहजनों का प्रत्यक्ष नहीं होता। तब क्या
उनका अभाव माना जायगा । इसलिए भी उसका कहना ठीक नहीं है।
इस विषय को हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस प्रकार सङ्कलित किया है ।
प्रत्यक्षमात्रं चार्वाकैः प्रमाणं यैस्तु मन्यते ।
अभ्युपेयमकामैरप्येतैरनुमानं परम् ॥ १ ॥
अदृष्टा अपि सन्त्यर्था गृहे दारा इव ध्रुवम् ।
अन्यथास्मिन् बहिर्याते किं विनष्टं नु तत्कुलम् ॥ २ ॥
पुरुषान्तरसंवादे कथं वाऽसौ प्रवर्तते ।
यदि तेषां गृहीतं स्याद् विषये नोऽज्ञानादिकम् ॥ ३ ॥
पुरुषान्तरसन्देहोऽज्ञानं वाऽथ विपर्ययः ।
प्रत्यक्षेण ग्रहीतुं तु न शक्यं लौकिकैर्जनैः ४ ॥
अधृताज्ञानसन्देहश्चेत् कथायां प्रवर्तते ।
उन्मत्तवदुपेक्ष्योऽसौ तदा सञ्जायते ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वाक्यभेदादिलिङ्गाच्चेदनुमाय प्रवर्तते ।
पराऽज्ञानादिकं तस्मात् कथाऽप्यस्य प्रकल्पते ॥ ६ ॥
तस्मादनिच्छताऽप्यत्र मानमनुमानं ध्रुवम् ।
स्वीकार्यं नान्यथा तस्य व्यवहारोऽपि कल्पते १ ॥ ७ ॥
१ दर्शनमीमांसा ४।
७ त० भा०