तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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चाहिए । परन्तु शास्त्र प्रदेश में अधिकारी के अनुसार दो अथवा पाँच अवयवों
का प्रयोग वैकल्पिक है। वादिदेव नामक जैन आचार्य, और बौद्ध आचार्य,
विशिष्ट विद्वानों के लिए, केवल हेतु मात्र एक अवयव का प्रयोग ही पर्याप्त
मानते हैं ।
इसके विपरीत न्याय दर्शन के 'वात्स्यायन भाष्य' में दश अवयव माननेवाले
किसी प्राचीन सम्प्रदाय का भी उल्लेख किया गया है ।
'दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये संचक्षते, जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः,
प्रयोजनं, संशयव्युदास' इति ।
न्याय में प्रतिपादित प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों के अतिरिक्त यह जिज्ञासादि
पाँच और अवयव प्राचीन आचार्य मानते थे । उनका खण्डन कर, केवल पाँच
अवयवों की उपयोगिता न्याय में प्रतिपादित की गई है और वैशेषिक में भी
पाँच ही अवयव माने गए हैं ।
७-हेतु के पञ्च रूप—
अनुमान वाक्य के पाँच अवयवों के समान हेतु के १ पक्षसत्त्व, २ सपक्ष-
सत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ असत्प्रतिपक्षत्व और ५ अबाधितविषयत्व इन पाँच
रूपों का वर्णन भी तर्कभाषा में किया गया है । कोई अन्वयव्यतिरेकी सद्धेतु
इन पाँच रूपों से उपपन्न होने पर ही अपने साध्य को सिद्ध कर सकता है ।
यह न्याय का सिद्धान्त है । परन्तु हेतु के स्वरूप के विषय में भी अनेक मत हैं
जिन्हें हम मुख्यतः 'पञ्चरूपता' और 'त्रिरूपतावादी' दो वर्गों में विभक्त कर
सकते हैं । वैशेषिक, सांख्य और बौद्ध यह तीन दर्शन हेतु की त्रिरूपता को
मानते हैं । और नैयायिक पञ्चरूपतावादी हैं । वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद
भाष्य में हेतु या लिङ्ग का वर्णन करते हुए लिखा है—
२यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
जो अनुमेय अर्थात् पक्ष से सम्बद्ध पक्षसत् , और तदन्वित अर्थात् सपक्ष
में प्रसिद्ध-सपक्षसत् हो और उसके अभाव अर्थात् विपक्ष सें न हो विपक्षव्यावृत्त
हो वही लिङ्ग अनुमापक होता है । इस प्रकार पक्षसत्त्व, और विपक्षव्यावृत्तत्व
यह तीन ही हेतु के धर्म वैशेषिक दर्शन में माने गए हैं ।
३विपरीतमतो यत्स्यादेकेन द्वितयेन वा
विरुद्ध|सिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ? ॥
१ न्याय० शा० भा० १, १, ३२ । २, ३, प्रशस्तपाद पृ० ६०० ।