सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

६६ तर्कभाषा [ अनुमाने टिप्पण्यः
इति व्याख्यातमनुमानम् ।
'बाधितविषय' में 'विषय' शब्द का अर्थ है 'साध्य' । जिस हेतु के साध्य
का अभाव किसी अन्य प्रमाण से पक्ष में गृहीत हो वह हेतु 'बाधितविषय'
कहा जाता है और उसका दूसरा नाम 'कालात्ययापदिष्ट' भी होता है ।
इस प्रकार अनुमान [ प्रमाण ] की व्याख्या हो गई ।
१ अनुमान की आवश्यकता,
प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता के विषय में कोई विवाद नहीं है । आस्तिक-
नास्तिक सभी प्रकार के दार्शनिक प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता स्वीकार करते हैं ।
परन्तु अनुमान के विषय में यह बात नहीं है । चार्वाक लोग अनुमान प्रमाण
का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते हैं । इसलिए अनुमान प्रमाण के विषय में
विचार करने से पूर्व उसकी आवश्यकता पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
इस दृष्टि से श्री वाचस्पति मिश्र आदि ने चार्वाक के लिए भी अनुमान की
सत्ता को स्वीकार करना अपरिहार्य बतलाया है । उनका कहना है कि जब
चार्वाक किसी से यह कहता है कि अनुमान प्रमाण नहीं है तब उससे यह
पूछना चाहिए कि वह ऐसा उस विशेष व्यक्ति से क्यों कहता है । इसका
उत्तर वह यही दे सकता है कि यह व्यक्ति अनुमान प्रमाण को मानता है
इसलिए इस विषय में इसके भ्रम अथवा सन्देह को मिटाने के लिए मैं इसको
समझा रहा हूँ कि अनुमान प्रमाण नहीं है ।
इस पर चार्वाक से दूसरा प्रश्न यह करना चाहिए कि आपको यह कैसे
मालूम हुआ कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा भ्रम में है । दूसरे पुरुष में
रहने वाले अज्ञान सन्देह अथवा विपर्यय का ग्रहण करने का आपके पास क्या
साधन है । इसके उत्तर में वह यही कह सकता है कि इसके वचनों से यह
प्रतीत होता है कि यह व्यक्ति अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय-भ्रम में है । तब
उससे यह कहना चाहिए कि शब्द विशेष अथवा वचन भेद से जो दूसरे व्यक्ति के
अज्ञान, सन्देह अथवा विपर्यय का ज्ञान है वह प्रत्यक्ष तो नहीं कहा जा सकता
है । क्योंकि परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह, विपर्यय आदि का किसी लौकिक पुरुष
को प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । अतएव इसके जानने का मार्ग उसके वचन भेद
रूप लिङ्ग के अतिरिक्त दूसरा नहीं है । और लिङ्ग दर्शन से होने वाला ज्ञान
ही 'लैङ्गिक' अथवा अनुमान कहलाता है । अतएव परपुरुषगत अज्ञान, सन्देह