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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 330 में से

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पृष्ठ 164

अनुमाने टिप्पणयः] अनुमाननिरूपणम् ६१
अनुमान के तीन भेद किये हैं। इस प्रकार वैदिक दर्शनों में यह दो प्रकार की
'द्विविध' और 'त्रिविध' भेद वाली परम्पराएँ पाई जाती हैं।
परन्तु श्री वाचस्पति मिश्र, जिन्होंने सभी दर्शनों पर टीकाएँ लिखी हैं इन
दोनों परम्पराओं का समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने अपनी 'सांख्य-
तत्त्वकौमुदी' में पांचवीं कारिका की टीका में पहिले वैशेषिक तथा मीमांसक-
परम्परा के अनुसार अनुमान के दो भेद किए। एक वीत और दूसरा अवीत।
'तत्र अन्वयमुखेन प्रवर्तमानं विधायकं वीतम्' । और 'निषेधमुखेन प्रवर्तमानम्
अविधायकमवीतम्' । अर्थात् अन्वयमुख से प्रवर्तमान विधायक अनुमान को
'वीत' अनुमान कहते हैं। और निषेधमुख से प्रवर्तमान अविधायक अनुमान
को अवीत' अनुमान कहते हैं। इनमें से जो 'अवीत' अनुमान है वही न्याय-
परम्परा का 'शेषवत्' है।
तत्रावीतं शेषवत् । शिष्यते परिशिष्यते इति शेषः। स एव विषयतया
यस्यास्त्यनुमानज्ञानस्य तच्छेषवत् । यदाहुः प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्राप्रसङ्गाच्छि-
ष्यमाणे सम्प्रत्ययः परिशेषः' ।
अनुमान का दूसरा भेद 'वीत' है। सांख्यतत्त्वकौमुदी में इसके फिर दो भेद
किए गये हैं उनमें से एक को 'पूर्ववत्' तथा दूसरे को 'सामान्यतो दृष्ट' कहा है।
'वीतं च द्वेधा । पूर्ववत् सामान्यतो दृष्टं च । तत्रैकं दृष्टस्वलक्षणसामान्य-
विषयं तत्पूर्ववत्। पूर्वप्रसिद्धं दृष्टस्वलक्षणसामान्यमिति यावत् तदस्य विषयत्वेना-
स्त्यनुमानज्ञानस्येति पूर्ववत् । यथा धूमाद् वह्नित्वसामान्यविशेषः पर्वतेऽनुमीयते।
तस्य च वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निविशेषो दृष्टो रसवत्याम् ।
अपरं च वीतं सामान्यतो दृष्टम्, अदृष्टस्वलक्षणसामान्यविषयं यथेन्द्रियविषय-
मनुमानम् । अत्र हि रूपादिज्ञानानां क्रियात्वेन करणत्वमनुमीयते । यद्यपि
करणत्वसामान्यस्य छिदादौ वाश्यादि स्वलक्षणमुपलब्धं, तथापि यज्जातीयस्य
रूपादिज्ञाने करणत्वमनुमीयते तज्जातीयस्य करणस्य न दृष्टं स्वलक्षणं प्रत्यक्षेण ।
इन्द्रियजातीयं हि तत्करणं, न चेन्द्रियत्वसामान्यस्य स्वलक्षणमिन्द्रियविशेषः
प्रत्यक्षगोचरोऽर्वाग्दृशां यथा वह्नित्वसामान्यस्य स्वलक्षणं वह्निः। सोऽयं पूर्ववतः
सामान्यतो दृष्टात् सत्यपि वीतत्वेन तुल्यत्वे विशेषः ।
इस प्रकार वाचस्पति मिश्र ने पहिले अनुमान के 'वीत' और 'अवीत' दो
भेद करके मीमांसा और वैशेषिक की द्विविध भेद वाली परम्परा का समन्वय
करने का प्रयत्न किया है। और उसके बाद त्रिविध भेद वाली न्याय तथा सांख्य-
परम्परा को प्रदर्शित किया है। वाचस्पति मिश्र का यह समन्वय केवल संख्या
१-२ सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ५।