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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 330 में से

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पृष्ठ 165

१०० तर्कभाषा अनुमाने टिप्पण्यः
भेद की सीमा तक ही रहता है अर्थ का समन्वय नहीं हो पाता है। क्योंकि
मीमांसा और वैशेषिक परम्परा में 'वीत' और 'अवीत' इन नामों तथा 'अवीत'
अर्थात् 'शेषवत्' इस भेद का उल्लेख नहीं मिलता है।
३-बौद्ध-परम्परा में अनुमान के भेद ।
अनुमान के विषय में दूसरी परम्परा बौद्धों की है। इस परम्परा में भी
दो प्रकार की धाराएँ पाई जाती हैं। प्रारम्भ में बौद्धों ने वैदिक-परम्परा का ही
अनुगमन किया है और न्यायसूत्र के अनुसार त्रिविध अनुमान का ही वर्णन
किया है। यह त्रिविध अनुमान का वर्णन बौद्धों के केवल एक ग्रन्थ 'उपायहृदयम्'
[ पृष्ठ १३ ] में पाया जाता है। 'उपायहृदयम्' को कुछ लोग नागार्जुनकृत
मानते हैं। यदि वह नागार्जुनकृत न हो, तो भी वह दिङ्नाग का पूर्ववर्ती अवश्य
होना चाहिए। इस प्रकार दिङ्नाग के पूर्व ईसा की चौथी शताब्दी तक बौद्ध
दार्शनिक भी न्याय की वैदिक-परम्परा का ही अनुगमन करते रहे। ईसा की
पाँचवीं शताब्दी में आचार्य दिङ्नाग ने, जो कि वस्तुतः बौद्ध न्याय के जन्म-
दाता हैं, इस विषय में भी वैदिक-परम्परा से भिन्न अपनी स्वतन्त्र नई परम्परा
स्थापित की और न्याय-परम्परा से भिन्न प्रकारसे अनुमान के लक्षण, भेद आदि
किए। आगे सभी बौद्ध दार्शनिकों ने दिङ्नाग की नवीन पद्धति को अपनाया है !
४-तर्कभाषा में अनुमान के भेद—
प्रकृत तर्कभाषा ग्रन्थ में अनुमान के पूर्ववत्, शेषवत्, सामान्यतो दृष्ट भेद
नहीं दिखलाए हैं। अपितु उनके स्थान पर स्वार्थानुमान और परार्थानुमान यह
दो भेद दिखलाए हैं। यह भेद मुख्यतः और स्पष्टतः वैशेषिक-परम्परा में प्रति-
पादित किए हैं।
पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम्। पञ्चाव-
यवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं
परार्थानुमानं विज्ञेयम्¹।
बौद्धों ने भी स्वार्थानुमान और परार्थानुमान के इस भेदको अपनाया है।
और उनके अनुमान के लक्षण पर भी वैशेषिक की छाया दिखाई देती है।
वैशेषिक दर्शन में अनुमान को 'लैङ्गिक' पद से निर्दिष्ट किया है। और
'लिङ्गदर्शनात् संजायमानं लैङ्गिकम्' यह उसका लक्षण किया है। बौद्धों के
'अनुमानं लिङ्गादर्थदर्शनम्²' इस लक्षण पर वैशेषिक के पूर्वोक्त 'लिङ्गदर्शनात्
संजायमानं लैङ्गिकम्' इस लक्षण की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। और
१ प्रशस्तपाद भाष्य पृ० ११३ । २ न्याय प्र० पृ० ७, न्यायबिन्दु २।३, तत्त्व-
संग्रहकारिका १३६२ ।