सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

अनुमाने टिप्पण्यः ] अनुमाननिरूपणम् १०३
इस प्रकार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों के समान वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य
में पाँच प्रकार के प्रतिज्ञाभासों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त
निदर्शनाभासों का भी वर्णन है।
अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ।···
लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीतानुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
लिङ्गानुमेयोभयव्यावृत्ताश्रयासिद्धव्यावृत्तविपरीतव्यावृत्ता वैधर्म्यनिदर्शनाभासाः।
अर्थात् १ लिङ्गासिद्ध, २ अनुमेयासिद्ध, ३ उभयासिद्ध, ४ आश्रयासिद्ध, ५
अननुगत, ६ विपरीतानुगत इस प्रकार ६ तरह के साधर्म्य निदर्शनाभास और
१ लिङ्गव्यावृत्त, २ अनुमेयव्यावृत्त, ३ उभयव्यावृत्त, ४ आश्रयासिद्धव्यावृत्त,
और ५ विपरीतव्यावृत्त यह पाँच प्रकार के वैधर्म्य निदर्शनाभास भी प्रशस्तपाद ने
प्रतिपादित किए हैं। इन प्रतिज्ञाभास और निदर्शनाभासों का उल्लेख न्याय में
नहीं पाया जाता है। इसीलिए न्यायप्रधान तर्कभाषा में भी उनका वर्णन नहीं
किया गया है।
६—पञ्चावयवों के प्रयोग में भेद—
न्याय और वैशेषिक दर्शनों में अनुमान के पाँच अवयवों का उल्लेख किया
गया है। परन्तु अन्य दर्शनों में इनके प्रयोग के विषय में कई मत पाए जाते
हैं। सांख्य के तार्किक, प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टान्त इन तीन अवयवों का ही प्रयोग
मानते हैं। इसका उल्लेख सांख्यकारिका की माठरवृत्ति की पाँचवीं कारिका में
मिलता है। प्रभाकर के अनुयायी मीमांसक शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरण-
पञ्चिका' में [पृष्ठ ८३, ८५] तथा कुमारिल भट्ट के अनुयायी मीमांसक पार्थसारथिमिश्र
ने 'श्लोकवार्तिक' की व्याख्या [अनुमान, श्लोक ५४] में तीन अवयवों के प्रयोग
को प्रतिपादित किया हैं। जैनों के आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने
मीमांसकों के चार अवयव मानने वाले किसी सम्प्रदाय का भी उल्लेख [प्रमेयर०
३, ३७] भी किया है परन्तु वैसा कोई प्रसिद्ध सम्प्रदाय नहीं मिलता है। क्योंकि
मीमांसकों के कुमारिलभट्ट तथा प्रभाकर दोनों के अनुयायी सम्प्रदाय, तीन अवयवों
का ही प्रयोग मानते हैं। बौद्ध तथा कुछ जैन तार्किक अधिक से अधिक हेतु तथा
दृष्टान्त दो अवयवों का [प्रमाणवार्तिक १, २८ स्याद्वाद र० पृ० ५५९] प्रयोग
मानते हैं अन्यथा केवल एक हेतु से भी काम चलाने का प्रतिपादन करते हैं।
[ प्रमाणवार्तिक १, २८ ] । जैन आचार्य माणिक्य नन्दी ने प्रदेश भेद की दृष्टि
से दो तथा पाँच अवयवों के प्रयोग की व्यवस्था का भी प्रतिपादन किया है।
उनके मतानुसार 'वाद' प्रदेश में तो पाँच अवयवों के प्रयोग का नियम समझना