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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 330 में से

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पृष्ठ 167

१०२ तर्कभाषा [अनुमाने टिप्पण्यः
प्रसक्तप्रतिषेधे यत् परिशेषान्नियम्यते ।
सांख्येऽवीतं तु तत्प्रोक्तं न्याये तच्छेषवन्मतम् ॥ ११ ॥
द्विविध भेदवादी मत-
जैमिनीये च काणादे शेषवन्न समीरितम् ।
दृष्टं, सामान्यतो दृष्टं, संविभक्तमिति द्विधा ॥ १२ ॥
जैनैर्बौद्धैस्तथा नव्यैरनुमाननिरूपणे ।
द्वौ तु तस्य कृतौ भेदौ नूनं स्वार्थपरार्थकौ ॥ १३ ॥
५—परार्थानुमान के पञ्चावयव—
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में जो परार्थानुमान का लक्षण किया है
उसमें पञ्चावयवों का उल्लेख किया है । ‘पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-
प्रतिपादनं परार्थानुमानम्’ । तर्कभाषा में भी इसी प्रकार परार्थानुमान का लक्षण
किया है । उन पाँच अवयवों के नाम—१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण,
४ उपनयन और ५ निगमन हैं । इन पाँच अवयवों का इन्हीं नामों से न्याय-
सूत्र में उल्लेख किया गया है ।
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ।
परन्तु वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में उनके नाम—१ प्रतिज्ञा,
२ अपदेश, ३ निदर्शन, ४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय पाए जाते हैं ।
‘अवयवाः पुनः, प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः ।
वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में एक विशेष बात और है कि न्याय-
दर्शन में तो केवल हेतु को दूषित मान कर हेत्वाभासोंका उल्लेख किया गया है।
तर्कभाषा में भी न्याय के अनुसार पाँच प्रकार के हेत्वाभासों का वर्णन किया
गया है । परन्तु प्रशस्तपाद भाष्य में हेत्वाभासों के अतिरिक्त प्रतिज्ञाभास तथा
निदर्शनाभासों का वर्णन भी किया है ।
‘तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ।····अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्यु-
पगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनी निरस्ता भवन्ति । १ यथानुष्णोऽग्निरिति
प्रत्यक्षविरोधी । २ घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । ३ ब्राह्मणेन सुरा पेये-
त्यागमविरोधी । ४ वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी ।
५ न शब्दोऽर्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी³ ।
१ न्याय दर्शन १, १, ३२ । २ प्रशस्त० पृ० ११४ ।
३ प्रशस्तपादभाष्य पृ० ११५ ।