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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 330 में से

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पृष्ठ 171

१०६ तर्कभाषा [ उपमानम्
उपमानम् ।
अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानमुपमानम् !
यथा गवयमजानन्नपि नागरिको 'यथा गौस्तथा गवय' इति वाक्यं कुत-
श्चिदारण्यकात्पुरुषाच्छ्रुत्वा वनं गतो वाक्यार्थं स्मरन् यदा गोसादृश्यवि-
शिष्टं पिण्डं पश्यति तदा तद्वाक्यार्थस्मरणसहकृतं गोसादृश्यविशिष्टपि-
ण्डज्ञानमुपमानमुपमितिकरणत्वात् । गोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानानन्तर-
मयमसौ गवयशब्दवाच्यः पिण्ड इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिरूपमितिः ।
उपमाननिरूपण
प्रत्यक्ष तथा अनुमान के बाद तीसरा प्रमाण उपमान है। किसी नागरिक
पुरुष ने गवय अर्थात् नील गाय को कभी नहीं देखा। उसको किसी आरण्यक
पुरुष ने बताया कि 'यथा गौस्तथा गवयः' जैसी गाय होती है वैसा ही गवय
होता है। गौ के धर्म को गवय में अतिदेश करनेवाला 'यथा गौस्तथा गवयः'
यह वाक्य अतिदेश वाक्य कहलाता है। इसको सुनने के बाद कभी वह नाग-
रिक पुरुष जङ्गल में जाकर गोसदृश एक प्राणी को देखता है और उसके साथ
ही 'यथा गौस्तथा गवयः' इस अतिदेश वाक्य का उसको स्मरण हो आता है।
इस प्रकार अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृत-गोसादृश्य-पिण्ड का ज्ञान उसको
होता है। इसी का नाम उपमान प्रमाण है। इस उपमान प्रमाण का फल या
उपमिति है संज्ञा-संज्ञि सम्बन्ध की प्रतीति । अर्थात् अतिदेश-वाक्यार्थ-स्मरण-
सहकृत-सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान से नागरिक पुरुष को यह ज्ञान होता है
कि इसी प्राणी का नाम गवय है। यहाँ गोसादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड, संज्ञी है,
और गवय पद उसकी संज्ञा है। इस प्रकार संज्ञा तथा संज्ञी के सम्बन्ध की
प्रतीति उपमान प्रमाण का फल है।
अतिदेश वाक्य [ यथा गौस्तथा गवयः ] के अर्थ के स्मरण के साथ गोसा-
दृश्यविशिष्ट-पिण्ड [ अर्थात् गवय प्राणी ] का ज्ञान उपमान [ प्रमाण ] है। जैसे
गवय [ नील गाय ] को न जानने वाला नागरिक [ पुरुष ] भी किसी वनवासी
[ आरण्यक ] पुरुष से 'जैसी गाय होती है वैसा ही गवय होता है' यह वाक्य
सुन कर वन में जाकर वाक्यार्थ के स्मरण करते हुए जब गोसादृश्यविशिष्ट-
पिण्ड को देखता है [ अथवा उस पिण्ड को देख कर उस अतिदेश का जब उसको
स्मरण होता है ] तब उस वाक्यार्थ के स्मरणसहित उस गोसादृश्यविशिष्ट
पिण्ड का ज्ञान उपमिति [ संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतिपत्तिरूप फल ] का कारण
होने से उपमान प्रमाण [ कहलाता ] है। गोसादृश्यविशिष्ट-पिण्ड के ज्ञान के
बाद यह पिण्ड [ ही ] गवयपदवाच्य है इस प्रकार की संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की